सड़कों पर चलने वाले आंदोलन ही होते हैं सफल, लेकिन कई आंदोलनों का हुआ उल्टा असर

सामाजिक बदलाव की संभावना वाले आंदोलन अधिक सफल होते हैं। भले ही ऐसे आंदोलन को समाज का कोई भी एक पीड़ित वर्ग शुरू करे पर धीरे धीरे सामाजिक बदलाव की संभावना का आकलन कर समाज का हरेक वर्ग ऐसे आंदोलन से जुड़ जाता है।

फोटो: Getty Images
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महेन्द्र पांडे

ऐसे अहिंसक आंदोलन जो सामान्य जनता की रोजमर्रा की जिन्दगी को प्रभावित करते हैं – जैसे सड़कों को अवरुद्ध करना, सरकारी कार्यालयों में प्रवेश को रोकना, सांस्कृतिक या खेल समारोहों में बाधा पहुँचना, बाजारों का मार्ग अवरुद्ध करना– जनता, सत्ता और मीडिया की नजर में भले ही बेकार के हों, पर आंदोलन विशेषज्ञों की नजर में ऐसे तरीके ही आंदोलनों को सफल बनाते हैं। अधिकतर विशेषज्ञों के अनुसार किसी आंदोलन को सफल बनाने का यही सबसे प्रभावी तरीका है। आंदोलन विशेषज्ञों का यह सर्वेक्षण यूनाइटेड किंगडम स्थित आंदोलनों पर अध्ययन करने वाली संस्था सोशल चेंज लैब ने करवाया है। इसने यूरोप के 120 आंदोलन विशेषज्ञों से सर्वेक्षण में सवाल पूछा था- किसी आंदोलन को सफल बनाने का सबसे प्रभावी तरीका क्या है?

हमारे देश के लोगों को आंदोलनों के बारे में समझना कठिन है, क्योंकि यहां सामाजिक या आर्थिक विषयों पर आंदोलन ही नहीं होते। हमारे देश में पिछले 50 वर्षों के दौरान तीन बड़े और राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन हुए हैं– जयप्रकाश नारायण का आंदोलन, अन्ना हजारे का आंदोलन और किसानों का आंदोलन। जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के बाद हिन्दू राष्ट्र और सामाजिक ध्रुवीकरण वाली बीजेपी सत्ता का एक हिस्सा बनी और अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद तो पूरी तरह सत्ता पर काबिज ही हो गई। इन दोनों आंदोलनों के जो उद्देश्य थे, और जनता जिन समस्याओं से छुटकारा पाना चाहती थी– वही समस्याएं अब पहले से भी व्यापक बनकर जनता के सामने खड़ी हैं। कुल मिलाकर आंदोलनों का नाटक करने वाले और सड़कों पर संघर्ष का दिखावा करने वाले सभी सत्ता का सुख भोग रहे हैं और एक जीवंत प्रजातंत्र को निरंकुश सत्ता में बदल दिया। जाहिर है, ऐसी निरंकुश सत्ता के काबिज होने के बाद आंदोलनों को कुचला गया, झूठे आश्वासन देकर उन्हें ख़त्म कराया गया और अब तो जनता आंदोलन करना ही भूल गई है।


जाहिर है हमारे देश में तो जिन आंदोलनों को सफल कहा जा सकता है, उन आंदोलनों का असर ही उल्टा हो गया। एक साल से भी अधिक चले किसान आंदोलन के बाद भी किसानों को कोई फायदा नहीं हुआ, उलटा सरकारी तौर पर सामाजिक तौर पर भी किसान पहले से अधिक उपेक्षित हो गए। पहले कभी-कभी किसानों की समस्याओं से संबंधित कुछ समाचार प्रकाशित भी होते थे, पर आंदोलन ख़त्म होने के बाद तो मीडिया ने भी उनको भुला दिया।

फ्रांस में 17 वर्ष के बच्चे की मृत्यु पुलिस वालों की गोली से हो जाती है तो पूरा फ्रांस सड़कों पर उतर जाता है। दूसरी तरफ हमारे देश में किसी को पुलिस वाले मार डालते हैं, तब सत्ता-समर्थक जश्न मनाते है, मीडिया उसे आतंकवादी और देशद्रोही करार देती है, सोशल मीडिया पर एक धर्म विशेष के बारे में हिंसा भड़काई जाती है। सत्ता पुलिसवालों को अगली हत्या के लिए बढ़ावा देती है और इन सबके बीच देश की बेरोजगार और भूखी जनता अगले शाम पेट भरने के इंतजाम में व्यस्त रहती है। हमारे देश में हरेक आंदोलनकारी, भले ही वह देश का नाम बढ़ा रहा हो, सत्ता और पुलिस की नजर में देशद्रोही ही है।

यूनाइटेड किंगडम में पिछले कुछ वर्षों से लगातार जलवायु परिवर्तन को रोकने में सरकार की नाकामी को लेकर जनता के रोजमर्रा की जिन्दगी को बाधित करने वाले शांतिपूर्ण आंदोलन किये जा रहे हैं। इनमें से अनेक आंदोलनकारी संगठनों ने स्पष्ट तौर पर बताया कि उनकी प्रेरणा महात्मा गांधी का असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन है। आंदोलनकारियों द्वारा सड़कों और पुलों के अवरुद्ध करने, सरकारे कार्यालयों में प्रवेश करने में बाधा पहुंचाने, बड़े खेल समारोहों में बाधा पहुंचाने से जनता प्रभावित हो रही है और आंदोलनकारियों को पुलिस, मीडिया और सत्ता के साथ मिलकर कोस भी रही है। फरवरी में यूनाइटेड किंगडम में कराये गए एक सर्वेक्षण के अनुसार 78 प्रतिशत जनता मानती है कि जनता को परेशान करने वाली गतिविधियों से आंदोलन को जनता का सहयोग नहीं मिलता और आंदोलन का उद्देश्य पूरा नहीं होता।

सामाजिक बदलाव की संभावना वाले आंदोलन अधिक सफल होते हैं। भले ही ऐसे आंदोलन को समाज का कोई भी एक पीड़ित वर्ग शुरू करे पर धीरे धीरे सामाजिक बदलाव की संभावना का आकलन कर समाज का हरेक वर्ग ऐसे आंदोलन से जुड़ जाता है। दरअसल अब तक आंदोलनों पर सारे अध्ययन यह मान कर किए गए हैं कि लोग केवल भावनात्मक तौर या फिर आवेश में आंदोलनों से जुड़ते हैं, पर हाल में ही स्टेनफोर्ड पब्लिक स्कूल ऑफ़ बिज़नस के समाजशास्त्रियों द्वारा किए गए अध्ययन से यह स्पष्ट है कि जब सामान्य लोगों को महसूस होता है कि किसी आंदोलन का व्यापक असर समाज पर पड़ेगा, तब ऐसे आंदोलनों से अधिक लोग जुड़ते हैं और ऐसे आंदोलन लम्बे समय तक चलते हैं। इस अध्ययन को पर्सनालिटी एंड सोशल साइकोलॉजी बुलेटिन नामक जर्नल में प्रकाशित किया गया है।


आंदोलनों की सफलता में भागीदारियों की सामरिक सोच, प्रतिस्पर्धा और इसका व्यापक असर बहुत महत्व रखता है। आंदोलनों में सार्थक भागीदारी निभाने वाले लोगों या समूहों में चार मौलिक प्रश्नों के उत्तर ढूंढे जाते हैं – इस आंदोलन से हमें क्या लाभ होगा, हमसे समाज को क्या लाभ होगा, समाज से हमें क्या लाभ होगा और आंदोलन से समाज को क्या लाभ होगा। इन प्रश्नों के उत्तर के लिए मस्तिष्क में एक सामरिक और प्रभावकारी विचारधारा पनपती है। केवल आत्मकेंद्रित आंदोलन कभी सफल नहीं होते। सामरिक और प्रभावकारी विचारधारा के सन्दर्भ में यदि ब्लैक लाइव्ज मैटर आंदोलन का आकलन करें तो अश्वेतों के लिए यह अपने अधिकार और समाज में बराबरी का मसला था। एशियाई और लैटिना आबादी का समर्थन इसलिए था कि जब अश्वेतों को समाज में बराबरी का दर्जा मिलेगा तब इन लोगों को अपने आप ही बराबरी का दर्जा मिल जाएगा। श्वेत आबादी, जो समाज में सबसे सशक्त तबका है, उन्हें आंदोलन से उम्मीद थी कि जब समाज से भेदभाव ख़त्म हो जाएगा तब जाहिर है समाज में अमन-चैन कायम होगा और समाज में स्थिरता बढ़ेगी। इस आंदोलन में शामिल लोगों से बातचीत में अधिकतर प्रतिभागियों ने व्यापक सामाजिक बदलाव की आशा जताई थी।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर एरिका चेनोवेथ और जोए मार्क्स ने 2010 से 2014 के बीच दुनियाभर में किए गए बड़े आंदोलनों का विस्तृत अध्ययन किया है। इनके अनुसार 70 प्रतिशत से अधिक अहिंसक आंदोलनों की अगुवाई महिलाओं ने की है और महिलाओं की अगुवाई वाले आंदोलन अपेक्षाकृत अधिक बड़े और अधिकतर मामलों में सफल रहे हैं। महिलाओं के आंदोलन अधिक सार्थक और समाज के हरेक तबके को जोड़ने वाले रहते हैं, इनकी मांगें भी स्पष्ट होती हैं। महिलाएं आंदोलनों के नए तरीके अपनाने से भी नहीं हिचकतीं।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर एरिका चेनोवेथ और जोए मार्क्स के अनुसार पुलिस या सरकारें महिला आंदोलनों का दमन केवल महिलाओं के कारण नहीं करतीं बल्कि महिलाओं के आंदोलन के नए तरीके और अहिंसा से वे भी अचंभित रहते हैं। आंदोलनों के इतिहास में 1980 के दशक तक हिंसक आंदोलनों का जोर रहा, पर इसके बाद एकाएक आंदोलनों में महात्मा गांधी के अहिंसक, सविनय अवज्ञा और असहयोग आंदोलनों के तरीके शामिल हो गए। ऐसा दुनिया भर में किया जा रहा है, और भारत में भले ही महात्मा गांधी को भुला दिया गया हो पर वैश्विक स्तर पर आज के आंदोलन उन्हीं की राह पर किए जा रहे हैं। अहिंसा का समावेश होते ही महिलाओं की संख्या आंदोलनों में बढ़ने लगी और अब तो वे दुनिया भर में आंदोलनों का नेतृत्व कर रही हैं।

सोशल चेज लैब के निदेशक जेम्स ओज्दें ने कहा है कि सामान्य जनता को कुछ हद तक परेशान करने वाले आंदोलन सफल होते हैं, यह चौंकाने वाला तथ्य है, क्योंकि ये नतीजे जनता और मीडिया के विचारों के बिलकुल विपरीत हैं। पर, 70 प्रतिशत से अधिक आंदोलन विशेषज्ञों ने इसी तरीके को किसी आंदोलन की सफलता का सबसे बड़ा करण बताया है। इससे इतना तो स्पष्ट है कि सामाजिक आंदोलनों के बारे में हमारी जानकारी बहुत सीमित है और इसका विश्लेषण कभी व्यापक तरीके से नहीं किया जाता।

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