वक्त-बेवक्त: जियो इंस्टीट्यूट को प्रतिष्ठित का दर्जा देने वालों की अकादमिक प्रतिष्ठा भी देखनी होगी

यह भी देखा जाना चाहिए था कि श्रेष्ठता तय करने वाली समिति की ख़ुद की भारत या विश्व के शिक्षा जगत में क्या पहचान है। क्या उनमें से कोई भी अकादमिक जगत में प्रतिष्ठित हैं? अगर ऐसा नहीं तो फिर उनके निर्णय की अकादमी जगत में क्या प्रतिष्ठा होगी?

जियो विश्वविद्यालय को जन्म के पहले ही प्रतिष्ठित संस्थान का दर्जा दिए जाने से शिक्षा जगत में और देश में काफ़ी आश्चर्य और सदमे का माहौल है। लेकिन सरकार इससे तनिक भी विचलित नहीं है। सामान्य बुद्धि के लोग पूछ रहे हैं कि जो अस्तित्व में नहीं, उसके सुनहरे भविष्य के प्रति सरकार मुतमइन कैसे है। सरकार का कहना है कि एक प्रतिष्ठित संस्थान बनाने के लिए जिन जिन चीज़ों की दरकार है, वह सब रिलायंस समूह के पास है, इसलिए उसके इस इरादे पर शक की कोई वजह नहीं कि वह एक विश्वस्तरीय शिक्षा संस्थान का निर्माण करने जा रहा है। सरकारी तर्क है कि अभी तो हमने भी सिर्फ़ इरादे का ख़त दिया है, प्रतिष्ठित संस्थान का प्रमाण पत्र नहीं दिया।

इस पूरी बहस में असल मुद्दे पीछे रह गए हैं। सरकार का कहना है कि निजी निवेश वाले संस्थानों को वह पैसा तो देगी नहीं, फिर इतना शोर क्यों! वह सिर्फ़ इस तरह के संस्थानों को बाक़ियों से अलग कर रही है, ताकि उन पर वे नियंत्रण न हों जो शेष पर हैं। दावा यह है कि जो संस्थान विश्वस्तरीय होने की क्षमता रखते हैं उन्हें स्वायत्तता मिलनी चाहिए। यह स्वायत्तता उन्हें पाठ्यक्रम बनाने, अध्यापकों का चयन करने, विदेशी संस्थानों से मिलकर काम करने, अपना प्रशासन अपने ढंग से चलाने जैसे मामलों में होगी।

इसका अर्थ यह है कि आज़ादी एक विशेषाधिकार है, वह सर्वसामान्य का अधिकार नहीं। क्या इस सिद्धांत को माना जाता सकता है ? इसके पीछे की समझ यह है कि हर कोई आज़ादी का सही इस्तेमाल करने की लियाक़त नहीं रखता।

बहुत सारे लोग इस तर्क से सहमत हो जाएंगे कि स्वायत्तता का दुरुपयोग हो सकता है या फिर कुछ को मालूम ही न होगा कि उसका क्या करें! कुछ का कहना यह भी है कि बिना जवाबदेही के स्वायत्तता का कोई अर्थ नहीं।

यानी स्वायत्तता सशर्त होगी। जियो के प्रसंग में यह कहा जाता रहा है कि रिलायंस के पास काफ़ी ज़मीन और पैसा है और आगे वह पर्याप्त निवेश करने का संकल्प रखता है, इसलिए उसके श्रेष्ठ होने के इरादे पर भरोसा किया जाता सकता है। प्रश्न यह है कि क्या मेरे यह कह देने से कि मैं श्रेष्ठ हूँ, अन्य भी मुझे श्रेष्ठ या उत्कृष्ट मान लेंगे। या मेरे कुछ करने के बाद, उस किए के आधार पर मुझे श्रेष्ठ माना जाएगा। क्या हॉर्वर्ड या येल या ऑक्स्फ़र्ड को ख़ुद अपने माथे पर उत्कृष्ट का बिल्ला चिपकाना पड़ा था? या, उनके अध्यापकों के काम, उनके ज्ञान के संसार में मौलिक योगदान और उनकी शिक्षण की विशेषता ने उन्हें श्रेष्ठ बनाया और दुनिया ने उन्हें विशेष माना? आख़िर कोई संस्थान यह कह ही कैसे सकता है कि वह विश्वस्तरीय वैज्ञानिक, खिलाड़ी और दार्शनिक पैदा करने जा रहा है। वह भी तब जब वह वजूद में न हो!

रामचंद्र गुहा ने ठीक याद दिलाया कि यह संस्थान , जो अभी भ्रूण भी नहीं है, कैसा होगा यह उसके जनक रिलायंस के पहले से चल रहे शिक्षा संस्थान को देखकर जाना जाता सकता है। गांधीनगर, गुजरात में कई सालों से इस समूह का एक संस्थान चल रहा है। क्या उसने कोई विश्वस्तरीय कारनामा अंजाम दिया है? वहाँ कितने अध्यापक ऐसे हैं जिनका शोध या लेखन उनके क्षेत्र में इस्तेमाल किया जाता है? बल्कि इस संस्थान ने उन दो तीन लोगों को, जो प्रतिष्ठित थे, अपने यहां से इस वजह से चलता कर दिया कि वे सरकार के आलोचक थे और असुविधजनक थे। यानी, इस संस्थान में स्वतंत्र विचार के लिए कोई जगह नहीं है। फिर यही समूह किस दम पर एक विश्वस्तरीय संस्थान के निर्माण का दावा कर रहा है?

दूसरी बात यह कि सिर्फ़ ज़मीन से संस्थान नहीं बनता। दुनिया के कुछ श्रेष्ठ संस्थान ऐसे हैं जिनके पास कोई लम्बा चौड़ा रक़बा नहीं है। जो ज़रूरी हुआ वह है मौलिक प्रतिभसंपन्न अध्यापक और विचार की स्वतंत्रता। इसका अर्थ होगा सत्ता का सामना करने की क्षमता। लेकिन जो अपना पूरा कारोबार सत्ता के साथ मिलीभगत करके , उसकी मदद से, नियमों को तोड़ मरोड़ कर चलाते रहे हैं, वे कैसे और क्योंकर अपने किसी भी संस्थान को इसकी इजाज़त देंगे कि वह सत्ता की आलोचना कर सके। और दुनिया या ज्ञान के इतिहास में ऐसा उदाहरण नहीं कि सत्ता के सहयोग से नया ज्ञान सृजित हुआ हो।

हमारा ध्यान लेकिन सिर्फ़ जीयो पर केंद्रित नहीं रहना चाहिए। भारत के छात्रों की बहुसंख्या राज्यों के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में है। उनके लिए सरकार क्या करने जाता रही है? क्या सिर्फ़ जिनके पास पैसा होगा वही श्रेष्ठ शिक्षा लेने के अधिकारी होंगे? यू जी सी क्यों कुछ संस्थानों पर अपने क़ायदे लागू करेगी और बाक़ी पर नहीं। इसका अर्थ तो यही है कि वे क़ायदे श्रेष्ठता के रास्ते में बाधक हैं! तो उन्हें होना ही क्यों चाहिए?

यह भी देखा जाना चाहिए था कि श्रेष्ठता तय करने वाली समिति की ख़ुद की भारत या विश्व के शिक्षा जगत में क्या पहचान है। क्या उनमें से कोई भी अकादमिक जगत में प्रतिष्ठित हैं? अगर ऐसा नहीं तो फिर उनके निर्णय की अकादमी जगत में क्या प्रतिष्ठा होगी?

यह प्रश्न कोई कर सके, इसकी उम्मीद करना आज की अकादमिक दुनिया की हालत देखते हुए कुछ ज़्यादती है। और इसी वजह से जियो “विश्वविद्यालय” को लेकर किए गए समिति के निर्णय पर बहुत गंभीरता से चर्चा की ज़रूरत नहीं।

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