मोदी के लिए खतरे की घंटी: सत्ता पक्ष को कटघरे में खड़े करने वाले मुद्दों पर विपक्षी एकजुटता से निकलते संकेत

पेगासस, पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें और बढ़ती महंगाई के मुद्दों पर विपक्षी एकता स्पष्ट नजर आई। ये ऐसे मुद्दे हैं जो सत्तापक्ष के लिए मुंह चुराने वाले हैं जबकि विपक्ष इन्हें लेकर आंदोलित है। सोनिया गांधी द्वारा बुलाई गई बैठकों में विपक्षी नेताओं का जुटना संकेत है कि मुद्दा आधारित एका बड़ी संभावना है।

सोशल मीडिया
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जिन लोगों को लगता है कि भिन्न-भिन्न मत वाले और अपने राज्य में कांग्रेस का विरोध करने वाली पार्टियां कांग्रेस के साथ कैसे खड़ी होंगी, उन्हें कुछ बातें समझनी होंगी।

पश्चिम बंगाल चुनाव परिणामों पर ध्यान दें। वहां मुख्य मुकाबला तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच था। कांग्रेस और वाम पार्टियों ने यहां चुनाव लड़ा लेकिन जिन क्षेत्रों में उनके वोट बंटवारे से बीजेपी के जीत के अवसर का उन्हें जरा भी संदेह हुआ, वहां उन्होंने जमीनी स्तर पर अपने समर्थकों से तृणमूल का साथ देने के संकेत दिए- मकसद यही था कि बीजेपी को नहीं जीतने देना है।

सांसद राहुल गांधी ने पेगासस मामले की जांच, पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों और बढ़ती महंगाई के मुद्दों पर अभी मानसून सत्र के दौरान संसद तथा संसद से बाहर जिस तरह आगे बढ़कर प्रदर्शनों में हिस्सा लिया, उसने विपक्ष को मजबूती दी। लगभग पूरा विपक्ष उनके साथ आया। ये ऐसे मुद्दे हैं जो सत्तापक्ष के लिए मुंह चुराने वाले हैं जबकि विपक्ष इन्हें लेकर आंदोलित है। पहले राहुल गांधी और बाद में, सोनिया गांधी द्वारा बुलाई गई बैठकों में विपक्षी नेताओं का जुटना संकेत है कि मुद्दा आधारित एका बड़ी संभावना है। आने वाले महीनों में इस दिशा में कई प्रभावी कदम उठाए जा सकते हैं।

इन बैठकों में भागीदारी के खयाल से कई टिप्प्णीकार विपक्ष को तीन खेमों में विभाजित मान रहे हैं: एक, जो कांग्रेस के साथ हैं; दो, जो किसी गठबंधन में शामिल तो होना चाहते हैं लेकिन कांग्रेस के साथ नहीं जाना चाहते; और तीन, वे जो अभी हालात पर निगाह रखना चाहते हैं। सोनिया गांधी वही रणनीति अपनाती लग रही हैं जिस कारण कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए के हाथ में 2004 में सत्ता आई। 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में 22 पार्टियां थीं। लेकिन 2004 लोकसभा चुनावों में एनडीए में सिर्फ पांच दल थे।

इस वक्त भी लगभग उसी किस्म का हाल होता जा रहा है। बीजेपी के सबसे पुराने सहयोगी दलों में से एक- शिरोमणि अकाली दल ने उसका साथ छोड़ दिया है जबकि दूसरे- शिवसेना ने न सिर्फ बीजेपी को छोड़ दिया है बल्कि वह कांग्रेस के साथ मिलकर महाराष्ट्र में सरकार चला रही है। जातीय जनगणना समेत कई मुद्दों पर जनता दल (यूनाइटेड) के तेवर बीजेपी को डरा रहे हैं। वैसे भी, एनडीए में शामिल छोटे दलों के नेता बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के व्यवहार से आहत नजर आते हैं और उन्हें बेहतर विकल्प मिले, तो उन्हें एनडीए से अलग होने में प्रसन्नता ही होगी।


लगता नहीं कि अगले साल के शुरू में होने वाले यूपी, उत्तराखंड और पंजाब समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में विपक्ष किसी गठबंधन की आस कर रहा है क्योंकि यहां वोट पाने में अपेक्षित सफलता न मिलने पर आगे के चुनावों में बीजेपी को इसे मुद्दा बनाने का अवसर मिल जाएगा।

कांग्रेस के लिए अच्छी स्थिति यह है कि वह देश की लगभग 200 लोकसभा सीटों पर बीजेपी के साथ सीधे मुकाबले में रहती रही है। इसलिए शेष विपक्ष को भी अंदाजा है कि विपक्षी एकता में कांग्रेस की भूमिका महत्वपूर्ण है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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