विष्णु नागर का व्यंग्यः हमारा देश बहुत खराब है, यहां मरने के बाद किसी की महानता का पता चलता है!

शायद विवेकानंद या ऋषि-मुनियों या वेद-पुराण में कहा गया है कि यहां जीते जी आदमी की कद्र नहीं होती। कई महान, सहृदय आत्माएं बीते दिनों दुनिया छोड़ गईं। लेकिन दुर्भाग्य देखिये कि उनके चले जाने के बाद पता चला कि स्वर्गीय आत्मा कितनी महान हुआ करती थी!

फोटोः सोशल मीडिया
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विष्णु नागर

पहली बार कह रहा हूं, माफ करना कि अपना यह महान देश भारत, है बहुत बेकार। मुझे देशद्रोही घोषित करने में अगर आप कुछ विलंब करने की कृपा करें तो आगे बढ़ूं! चलिए इसके बगैर बढ़ जाता हूं। तो किसी ने- शायद विवेकानंद ने या ऋषि-मुनियों ने कहा है या वेद-पुराण में लिखा है कि यहां जीते जी आदमी की कद्र नहीं होती। आप मेरा हाल देख ही रहे हैं। खैर इस अवसर पर अपनी बात नहीं करूंगा, अपन तो अभी इस दुनिया में डटे हैं और डटे रहेंगे मगर इस बीच कई महान, सहृदय आत्माए, प्यारे-सच्चे इनसान, आकाश और जमीन दोनों से बराबर का तालमेल रखने वाले नेता-अफसर, पूंजीपति और न जाने कौन-कौन इस असार संसार को छोड़ पता नहीं क्यों और कहां चले गए, जबकि आज उनकी आवश्यकता सबसे अधिक महसूस की जा रही थी! उन्हें नया पदभार देने की पूरी तैयारी हो चुकी थी।

मेरा दुर्भाग्य कि उनके चले जाने- बल्कि उनके अंतिम संस्कार के बाद पता चला कि अरे स्वर्गीय आत्मा तो कितनी महान हुआ करती थी! वह आत्मा जीते जी इसी शहर में या उस शहर में, जहां मैं कम से कम बीस बार जा चुका हूं, निवास किया करती थी। मुझ अज्ञानी को किसी ने कभी यह नहीं बताया, किसी ने उनका नाम तक नहीं लिया। कभी जिक्र आया भी तो सबने पहले तो उस महान आत्मा को बहुत मोटी सी, अछपनीय- सी गाली दी। फिर कहा कि अच्छा हुआ, तुम आज तक उससे बचे हुए हो, किस्मत वाले हो। हम तो यहां उसे चालीस साल से रोज सुबह-शाम भुगत रहे हैं, मरे तो पाप कटे, बहुत चाटू है, सिर खा जाता है। दारू तो छोड़ो, चाय तक नहीं पिलाता, पानी भी मांगने पर पिलाता है, महानतम घटिया है। परले दर्जे का उल्लू है और गधा भी। सच कहता हूं, दोनों है और एक साथ है। ऐसा होता नहीं मगर यह यूनिक केस है। आता-जाता कुछ है नहीं मगर बनता महात्मा गांधी की औलाद है। कुछ तो यह भी कहते पाए गए कि यह अकल से पैदल है, मगर बनता नरेंद्र दामोदरदास मोदी है! खैर यह दुनिया है, सबको अपनी राय रखने का हक है।

एक ने भी कभी नहीं कहा कि इनसे मिल लेना वरना बाद मेंं बहुत पछताओगे, जब तुम्हारे पास श्रद्धांजलि देते वक्त कहने के लिए एक भी मौलिक बात नहीं होगी। झूठन से काम चलाना पड़ेगा। वही कहोगे-लिखोगे, जो कोई टीवी चैनल पर पहले ही कह चुका है, अखबार में लिख चुका है। तुम्हारे पास एक सड़ा- सा संस्मरण भी नहीं होगा। यह भी नहीं कि एक बार मेरी तरफ देख वह मंद -मंद मुस्कुराए थे और पूछा था कि बेटा कैसे हो तुम, तुम्हारे पप्पा-अम्मा कैसे हैं? उनसे मेरा प्रमाण कहना, जबकि मैंने तो टीवी पर एक बार उनको सिर्फ एक बार- वह भी बाई चांस देख लिया था। एक ही बार अखबार में उनका फोटू देखा था मगर उन्होंने पहचान लिया कि मैं ही सुरेश चंद्र वल्द गिरधारी लाल बंबेवाला का बेटा हूं, जबकि मेरा तो आधार कार्ड के अलावा कभी कहीं फोटू छपा नहीं, इतनी महान आत्मा थे वे!

उनकी महानता की जानकारी के अभाव में मैं उनके संपर्कों का लाभ नहीं उठा सका, उनकी महानता का संस्पर्श नहीं पा सका। यही धोखेबाज, बेशर्म लोग बाद में उन्हें महान कहते हुए, टीवी कवरेज बटोरते हुए पाए गए और मेरी तरफ किसी ने झांका तक नहीं, जबकि मैं इन धोखेबाजोंं से अधिक कुछ कहने की तैयारी के साथ एकदम कड़क कुर्ता-पायजामा पहनकर शोक मुद्रा में खड़ा था। हंसी की बात पर भी हंसने से खुद को रोककर रो-सा रहा था। बहुत बेरहम और बहुत धोखेबाज है यह दुनिया। नई पीढ़ी अभी से मेरी बात गांठ बांध ले वरना मेरी तरह वह भी टीवी कवरेज से वंचित हो जाएगी और पछताएगी। लोकल टीवी चैनल वाला तक नहीं पूछेगा !

अरे मान लो ये बेईमान उसके जीते जी यह बता देते कि यह व्यक्ति महान शख्सियत का मालिक है तो देश का या उनका कुछ बिगड़ जाता? अरे मुझसे ज्यादा पब्लिसिटी बटोर लेते मगर मेरे हाथ भी तो थोड़ी-सी लग जाती! शहर में कुछ तो मेरी भी इज्ज़त में इजाफा हो जाता! नहीं होता तो मैं इस आधार पर करवा लेता! खैर बेईमानों, ऊपर वाला तुम्हें भी देख रहा है, तुम्हें रौरव नरक नहीं मिला तो मैं भी अपने बाप की असली औलाद नहीं। मैं जीवनभर इस अपमान को नहीं भूलूंगा।

और कान खोलकर सुन लो, अब से मैं हर उस इनसान से संपर्क बढ़ाऊंगा, जिसे तुम आज नीच और घटिया बता रहे हो। तुमसे अधिक उसके नजदीक होकर बताऊंगा और मरनेवाले को कम, तुम्हें ज्यादा श्रद्धांजलि दूंगा और तुम्हारे बाद मरा तो तुम्हें मन ही मन जूते मारते हुए तुम्हें भी महान बताकर टीवी कवरेज बटोरूंगा। मैं आज से रोने-सिसकने की ऐसी शानदार प्रैक्टिस करना शुरू कर रहा हूं कि कोई माई का लाल मेरी उपेक्षा नहीं कर पाएगा। सारे टीवी चैनल वाले मेरे पास यानी इस श्रद्धांजलि- एक्सपर्ट के पास दौड़े-दौड़े आएंगे। अपने पास समय ही समय है, तुम्हारी दूकान पर जल्दी ही मैंने ताला नहीं लगवाया तो मेरा नाम भी सुरेश चंद्र वल्द गिरधारीलाल बंबेवाला नहीं! कुछ लोग बंबेवाला को खंबेवाला समझते हैं, मगर आप ऐसी गलती मत करना, खंभे से बंबे बहुत बड़ा है!

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