विष्णु नागर का व्यंग्यः मोदी जी के लिए पटेल वोट देने वाली दुधारू गाय, गुजरात चुनाव के लिए जल्द मिलेगा भक्तों को डोज

मोदी जी ने सरदार पटेल की असली पहचान अपने भक्तों को इसलिए नहीं बताई क्योंकि आज वे अंग्रेज सरकार के रोल में हैं और किसान उनके तीन काले कानूनों से लगभग साल भर से लड़ रहे हैं। ऐसे में सरदार पटेल को किसानों का नेता बता देना, मुसीबत मोल लेना है।

फोटोः सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

दुनिया में किसी के साथ भी धोखा हो जाए, बर्दाश्त किया जा सकता है पर भक्तों के साथ भी हो रहा है, यह असहनीय है। यह धोखा कोई और दे तो भी सहनीय है मगर उनका अपना देवता दे, यह काबिले-बर्दाश्त नहीं है।

भक्तों, तुम्हें आज तक बताया गया कि सरदार पटेल लौहपुरुष थे। आजादी के बाद राजे-रजवाड़ों का भारत में विलय उन्होंने ही करवाया था। ऐसे पटेल की भी कांग्रेस ने घोर उपेक्षा की, वगैरह, वगैरह। इस महीने की आखिर में यह डोज तुम्हें फिर से पिलाया जाएगा। इस बार का डोज काफी तगड़ा होगा। सरदार पटेल का जन्मदिन तो हर साल 31 अक्टूबर को आता है मगर हर जन्मदिन के आसपास चुनाव नहीं आते। इस बार गुजरात विधानसभा के चुनाव आ रहे हैं।सरदार पटेल, पटेल वोटों की बेहद दुधारू गाय हैं। गाय दूध देती है, मगर कभी-कभी लात भी मारती है। दुधारू गाय की लात भी खानी पड़ती है। लात खाकर भी उसे पुचकारना पड़ता है। उसे सड़क पर यूं ही छोड़ नहीं दिया जाता।

तो मोदी जी ने यूं ही सरदार पटेल की 398 फीट ऊंची प्रतिमा नहीं बनवाई है। गांधी का पल्ला छोड़ सरदार पटेल का दामन यूं ही नहीं संभाला है। मोदी जी अठन्नी भी यूं ही नहीं खर्च करते।उस अठन्नी से सौ रुपये की आमद होती है, तभी उसे वोट के धंधे में लगाते हैं। जो आदमी मां के पैर तक हमें दिखाने के लिए छूता हो, वह अठन्नी यूं ही नहीं गंवा सकता। यह अलग बात है कि कभी-कभी अठन्नी हाथ से फिसलकर नाली में गिर जाती है। उनका हिन्दू-हृदय नाली से उसे निकालने के लिए अपने हाथ गंदे करने से डर जाता है!

ऐसे परम उपयोगी सरदार पटेल की असली पहचान मोदी जी इस जन्म में कभी नहीं बताएंगे, क्योंकि यह उन्हें 'सूट' नहीं करता। सरदार पटेल, लौहपुरुष तो बहुत बाद में बने। इससे बहुत पहले 1918 में ही वह किसानों के नेता बन चुके थे। उन्होंने खेड़ा में सूखे से जूझ रहे किसानों के लिए सफल संघर्ष का नेतृत्व किया था। फिर 1928 में उन्होंने बारदोली का सफल किसान सत्याग्रह भी चलाया था। उनकी यह कामयाबी इतनी बड़ी थी कि तीन साल बाद ही कांग्रेस ने उन्हें अपना अध्यक्ष पद नवाजा था। वह पहले किसान नेता थे, जो इस पद पर पहुंचे थे। वह कांग्रेस आजादी के संघर्ष की कांग्रेस थी। उसके अध्यक्ष होने का मतलब आज के मोदियों को समझ में नहीं आ सकता!


मोदी जी ने यह बात अपने भक्तों को इसलिए नहीं बताई क्योंकि आज वे अंग्रेज सरकार के रोल में हैं और किसान उनके तीन काले कानूनों से लगभग साल भर से लड़ रहे हैं। ऐसे में सरदार पटेल को किसानों का नेता बता देना, मुसीबत मोल लेना है। वैसे अंग्रेजों से लड़ना आसान नहीं था। वे भी आज की सरकार की तरह किसानों का दमन करना जानते थे। वे भी आज की तरह किसान नेताओं को बदनाम करना जानते थे। सरदार पटेल को उन्होंने शराबी और औरतों का रसिया रासपुटिन तक बताया था। गांधी जी और उनके बीच दरार पैदा करने की हरचंद कोशिश की थी। मोदी जी का दिशा निर्देशन किया था!

तब टीवी नहींं था, अर्णब, सुधीर, नाविका भी नहीं थे, मगर अखबार थे। उनका तो किसी को बदनाम करने के लिए भरपूर इस्तेमाल किया़ ही जा सकता था। साम, दाम, दंड, भेद की नीति वे भी जानते थे। भारत में इसके असली व्यवहारकर्ता वही थे। मोदी जी ने उनकी पाठशाला से हिंदू-मुसलमान की शिक्षा ली है, लेकिन अंग्रेज इतने मूरख भी थे कि उन्होंने तीन महीने में ही किसानों की मांगें मान लीं। लगान तीस से घटाकर मात्र छह प्रतिशत कर दिया। हमारे सफेद लंबी दाढ़ी वाले बाबा से वे अक्ल में मीलों पीछे थे।आगे होते तो कम से कम साल भर तो अड़कर दिखाते। कहते जरूर कि मैं बस किसानों से एक टेलीफोन काल की दूरी पर हूं पर किसान उनके एक मंत्री के पुत्र की जीप के टायरों की सड़क से जितनी दूरी होती है, बस उतनी दूर होते।
अंग्रेजों ने गलती की। वल्लभ भाई पटेल, सरदार पटेल बन गए। कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए। ये वाले बाबा गलती करके किसानों के बीच ऐसे अनेक सरदार पटेल पैदा होने देने का खतरा मोल नहीं ले सकते!


मोदी जी अपनी यह खलनीति कम से कम अपने भक्तों को तो बता देते। शायद इस डर के कारण नहीं बताया होगा कि तब शायद भक्त, भक्त न रह जाते। भक्त इनसे कहते कि जब एक जिले के आंदोलन के आगे अंग्रेज इतना झुक सकते थे तो आप देश के हमारे अन्नदाताओं के आगे अकड़े हुए क्यों खड़े हैं। झुक जाइए। अंग्रेजों का दुनिया में इतना बड़ा साम्राज्य था कि उनके राज में सूरज कभी नहीं डूबता था, फिर भी उन्हें झुकना पड़ा। उन्हें अंततः वापस लंदन जाना पड़ा, मगर आप कहां जाओगे?आपकी तो मातृभूमि-पितृभूमि सब यहीं है। सेठभूमि-संघभूमि यहीं है। हांं अमेरिका आप जा सकते हो, मगर आप अमेरिका से यहां आए तो नहीं थे।वहां तो आपकी बनाई चाय भी कोई नहीं पियेगा। वहां के गुजराती आपकी जय बोल सकते हैं मगर तथाकथित रेलवे स्टेशन पर तथाकथित चाय बनाने वाले की बनाई तथाकथित चाय मुफ्त में भी नहीं पीएंगे!

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