खरी-खरीः बड़ी कठिन है डगर पनघट की, मोदीजी!

षडयंत्र को मैदान में ललकार दो, तो वह दुम दबाकर भागता है। पुराने संघ प्रचारक होने के नाते मोदीजी षडयंत्र और सांप्रदायिक राजनीति के गुरु हैं, लेकिन वह मैदानी राजनीति में अब भी कच्चे हैं। ममता ने जब उनको मैदान में घसीटा, तो मोदीजी कोलकाता से दुम दबाकर भाग गए।

फोटोः सोशल मीडिया
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ज़फ़र आग़ा

बुरे फंसे बंगाल में नरेंद्र मोदी। सोचा कुछ और, कोलकाता में हुआ कुछ और। दरअसल, बंगाल में पिछले सप्ताह जो कुछ हुआ, वह मोदी और ममता का झगड़ा था। सीबीआई तो केवल एक साइड एक्टर की भूमि का निभा रही थी। मोदीजी की निगाहें 2019 लोकसभा चुनाव पर थीं। मंशा सारदा घोटाले के बहाने बंगाल में बीजेपी की सीटें बढ़ाने की थी। यह तो बीजेपी के रणनीतिकारों को भी भली भांति समझ में आ रहा है कि हिंदी पट्टी में पार्टी को वोटों की जो फसल काटनी थी, वह 2014 में मोदीजी ने काट ली। यही कारण था कि स्वयं बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने घोषणा की थी कि इस क्षति की पूर्ति बीजेपी बंगाल, असम और पूर्वोत्तर राज्यों से करेगी।

जाहिर है, इस रणनीति के तहत बंगाल सबसे मुख्य राज्य होता है, क्योंकि वहां 42 लोकसभा सीटें हैं। स्पष्ट है कि अगर बंगाल जीतना है, तो पहले बंगाल की शेरनी ममता बनर्जी को पटखनी देना जरूरी होगा। अब ममता को पटका जाए, तो कैसे पटका जाए? उसके लिए सारदा घोटाले की फाइल खंगाली गई। सीबीआई में अपनी मंशा के डायरेक्टर ऋषि कुमार शुक्ला की नियुक्ति हो ही चुकी थी। उन्हें पीएमओ से हुक्म हुआ और बस, वह सीबीआई का लश्कर लेकर बंगाल पर चढ़ दौड़े।

परंतु नरेंद्र मोदी और उनके रणनीतिकार अमित शाह से एक गलती हो गई। दोनों ममता बनर्जी को ठीक से समझ नहीं सके। अगर मोदी और शाह षडयंत्र के माहिर हैं, तो ममता जनता का मन जीतने में। जैसे ही सीबीआई ने बंगाल पर धावा बोला, ममता ने लड़ाई का रुख बंगाल बनाम मोदी या केंद्र कर दिया। यह जा, वह जा, ममता कोलकाता में धरने पर बैठ गईं और शोर मचा दिया कि यह तो बंगाल सरकार को उलटने की साजिश है।

सीबीआई पर तो पहले से ही सवाल उठ रहे थे। वह सुप्रीम कोर्ट के कठघरे में खड़ी थी। सीबीआई के नवनियुक्त प्रमुख पर मोदी की कठपुतली होने का लांछन लग चुका था। इन परिस्थितियों में जब सीबीआई ने कोलकाता में बंगाल पुलिस के मुखिया के घर धावा बोला और ममता ने बंगाल सरकार पर हमले का शोर मचा दिया, तो बंगाली वोटर का माथा ठनका। लोगों को लगा, दाल में कुछ काला तो है। बस, ममता का मामला बन गया।

उधर, ममता ने कोई दो सप्ताह पूर्व कोलकाता में मोदी विरोधी लगभग 25 पार्टियों का एक महाकुंभ किया ही था। इसमें मोदी विरोधी मोर्चे की रूपरेखा बन ही गई थी। ममता ने जैसे ही मोदी विरोधी स्वर छेड़े, वैसे ही कोलकाता से लौटे विपक्षी नेताओं ने ममता की ताल में ताल मिला दी। राहुल गांधी से लेकर अखिलेश यादव तक छोटे-बड़े सभी विपक्षी नेता ममता के समर्थन में खड़े हो गए। बस, देखते ही देखते मामला बंगाल बनाम दिल्ली के बजाय संपूर्ण विपक्ष बनाम मोदी बन गया। इस मोड़ पर ममता फिर से बंगाल की हीरोइन बन गईं।

अब घबराई मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची। वहां भी सरकार को मुंह की खानी पड़ी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपकी जो गुहार है, उसके पक्ष में सरकार कुछ सबूत पेश करे तो हम बंगाल पुलिस प्रमुख के कान मरोड़ देंगे। दूसरे दिन सुप्रीम कोर्ट में सबूत के बजाय सरकार की तरफ से भाषण ही हुए। कोर्ट ने कह दिया कि सीबीआई पुलिस प्रमुख को गिरफ्तार नहीं कर सकती है। हां, उनसे पूछताछ करे, परंतु वह भी शिलांग में। बस, बचा क्या था। ममता ने तुरंत कोलकाता में विजय पताका लहरा दी।

इसके बाद सीबीआई का लश्कर वहां से दुम दबाकर भाग आया और इस तरह मोदी को इस मामले में मुंह की खानी पड़ी। बात यह है कि षडयंत्र की राजनीति की अपनी सीमा होती है। अगर षडयंत्र को मैदान में ललकार दो, तो वह दुम दबाकर भागता है। पुराने संघ प्रचारक होने के नाते मोदीजी षडयंत्र एवं सांप्रदायिक राजनीति के गुरु तो हैं, परंतु वह मैदानी राजनीति में अब भी कच्चे हैं। ममता ठहरीं मैदान की पुरानी खिलाड़ी। उन्होंने जब मोदी को मैदान में घसीटा, तो मोदीजी को पसीने आ गए और वह कोलकाता से दुम दबाकर भाग गए।

परंतु मोदीजी का तो खेल ही बिगड़ गया, उनकी निगाहें तो बंगाल की लोकसभा सीटों पर थीं। लेकिन ऐसी दशा में तो जितनी सीटें मिलने की उन्हें आशा रही होगी, वह भी जाती रही। इसीलिए तो कहा कि बुरे फंसे कोलकाता में मोदी!

समस्या यह है कि केवल बंगाल ही नहीं, बीजेपी की तो संपूर्ण उत्तर एवं पूर्वोत्तर की रणनीति ही बिगड़ती जा रही है। बंगाल गया। असम में सहयोगी असम गण परिषद ने नागरिकता विधेयक पर साथ छोड़ दिया। उधर, पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में केंद्र से डरकर जो सहयोगी मिले थे, वे भी धीरे-धीरे दामन छुड़ाकर भाग लिए। अब बताइए, हिंदी भाषी राज्यों की क्षतिपूर्ति करने की उत्तर एवं पूर्वोत्तर से जो रणनीति थी, जब वही बिगड़ गई, तो लोकसभा चुनाव में होगा क्या?

होना क्या है? बात यह है कि जैसे-जैसे चुनाव सिर पर आते जा रहे हैं, वैसे-वैसे मैदान बीजेपी के हाथों से निकलता जा रहा है। मोदी अब स्वयं खोटे सिक्के हो गए हैं। गुजरात विधानसभा चुनाव जीतने के बाद से अब तक नरेंद्र मोदी एक भी राज्य में बीजेपी को चुनाव नहीं जितवा पाए। तो फिर बीजेपी अगली सरकार बनाए तो कैसे?

देश आर्थिक संकट की दहलीज पर खड़ा है। पिछले 45 साल में ऐसी बेरोजगारी नहीं हुई जैसी देश इस वक्त झेल रहा है। किसान तो यूं ही बदहाल है। धंधे एवं दुकानदारी नोटबंदी खा गई। ऐसे में बीजेपी चुनाव कैसे जीतेगी! इस लेख के लिखे जाने तक भगवान राम ने भी बीजेपी से मुंह मोड़ लिया था। हुआ यह कि विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने घोषणा कर दी है कि विहिप लोकसभा चुनाव तक राममंदिर पर कोई जन कार्यक्रम नहीं करेगी।

मंदिर मुद्दे पर संघ जनता के बीच जाए तो जाए कैसे? विहिप ने अयोध्या और प्रयाग कुंभ में दो बड़े कार्यक्रम किए। मीडिया के अनुसार, अयोध्या शो फ्लॉप हो गया। प्रयाग में स्वयं साधु-संतों ने आरएसएस मुखिया मोहन भागवत को ही घेर लिया। अब न संत आपके साथ रहे, न ही राम भक्तों का राम मंदिर निर्माण मुद्दे पर बीजेपी पर भरोसा बचा।

साल 2019 में बीजेपी की समस्या ही भरोसा है। मोदीजी ने 2014 में पेट भरकर चुनावी झूठ बोले और रंगीन सपने दिखाए। अब वे झूठ खुल गए और सपने टूट गए। जाहिर है, अब मोदी 2019 में कोई भी वादा करें, तो कौन भरोसा करेगा। इसी प्रकार, 1992 से अब तक बीजेपी हर चुनाव के मौके पर राम मंदिर निर्माण करवाती रही है। अब पांच साल सत्ता भोग ली और राम मंदिर की ईंट भी नहीं रखी गई, तो ऐसे में विहिप पर इस मुद्दे पर कौन भरोसा करेगा?

और जब भरोसा, अर्थात् विश्वा स, खत्म हो गया हो, तो फिर षडयंत्र और झूठ भी नहीं चलता। इसीलिए तो बंगाल में बाजी पलट गई। चुनाव आते-आते देखिए, अभी और कितने खेल बिगड़ते हैं। जनता को मोदी जी पर भरोसा ही नहीं रहा, तो फिर बीजेपी बाजी जीते तो जीते कैसे? कुल मिलाकर बात ये है कि मोदीजी के लिए 2019 में बड़ी कठिन है डगर!

Published: 7 Feb 2019, 10:10 PM
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