हिंदी-उर्दू से बढ़ता परहेज़: भारत में ‘हिंग्लिश’ और पाकिस्तान में ‘उर्दिश’ में पढ़ने लगे हैं बच्चे

पाकिस्तान उर्दू की जगह उर्दिश और भारत हिन्दी की जगह हिंग्लिश के बीच में खड़े देश बन चुके हैं। ये दो देश भले ही हैं लेकिन भाषा के विकास और विवाद के लिहाज से एक जैसे देश लगते हैं।

फोटो : सोशल मीडिया
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अनिल चमड़िया

भाषा का इस्तेमाल दो स्तरों पर हो सकता है। एक भाषा को केवल राजनीतिक हथियार के रुप में इस्तेमाल किया जा सकता है और दूसरा वास्तविक अर्थों में किसी भाषा को सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक विकास का आधार बनाया जा सकता है। इस मायने में भारत में हिन्दी का राजनीतिक अर्थों में ही इस्तेमाल किया जाता रहा है और दूसरी तरफ पाकिस्तान में भी उर्दू के साथ वैसी ही स्थिति देखने को मिलती है।

एक देश का भारत और पाकिस्तान के रुप में बंटवारे की वजह धर्म को बताया जाता है। 1947 में दो देश बनने के बाद उर्दू को पाकिस्तान की और हिन्दी को भारत की राष्ट्र भाषा बनाने की राजनीति सक्रिय रही है। हालांकि बंटवारे से पहले ही भारत और पाकिस्तान के समर्थक हिन्दी और उर्दू को राष्ट्र भाषा बनाने के अभियान में सक्रिय हो चुके थे क्योंकि भाषाओं को धर्म के साथ जोड़ दिया गया था। लेकिन हम यह देख सकते हैं कि उर्दू व्यवहारिक स्तर पर न तो पाकिस्तान की राष्ट्र भाषा बन सकी है और न ही हिन्दी को भारत में राष्ट्र भाषा का दर्जा देना संभव हुआ है।

ये दोनों देश प्रांतों के संघ माने जाते हैं और दोनों ही देशों में कई कई भाषाएं बोलने , लिखने व पढ़ने वाले लोगों की आबादी अच्छी खासी है। इस वजह से एक खास स्थिति यह देखने को मिलती है कि पाकिस्तान में उर्दू को राष्ट्र भाषा बनाने के इरादे की वजह से दूसरी राष्ट्रीय भाषाओं की बेतरह उपेक्षा महसूस की गई और भाषायी समुदायों के बीच नाराजगी बढ़ी। यह नाराजगी बांग्ला भाषियों में इस स्तर पर पहुंची कि पाकिस्तान में भाषा के आधार पर एक और बंटवारा हो गया। पाकिस्तान के भीतर नये देश के रुप में बांग्लादेश सामने आया।

भारत में भी 1960 के दशक में भाषायी आधार पर प्रदेशों का पुनर्गठन करना पड़ा। भारत में भी हिन्दी को दक्षिण के प्रदेशों में थोपे जाने के आरोप लगे और वहां के लोगों ने एक बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया। ऐसी स्थिति में पाकिस्तान में उर्दू और भारत में हिन्दी की जैसी तस्वीर उभर कर सामने आई है, यह अध्ययन बेहद दिलचस्प हैं।

भारत में हिन्दी के बारे में कहा जाता है कि 1947 में बंटवारे और अंग्रेजों के शासन से मुक्ति के पहले ही हिन्दी को संस्कृतनिष्ठ भाषा के रुप में विकसित करने की कोशिश होती रही है। हिन्दी का विकास कैसा हो, इसे लेकर तब से विवाद चलता रहा है। हिन्दी के विकास को लेकर दो तरह की धाराएं रही हैं जिसे शिव प्रसाद सितारे हिन्द बनाम भारतेन्दु के रुप में जाना जाता है। इस विवाद को लेकर हिन्दी के एक विद्वान प्रोफेसर वीर भारत तलवार ने एक शोध परक पुस्तक “रस्साकशी” भी लिखी है।

ठीक इसी तरह से पाकिस्तान में आठ प्रतिशत की आबादी की भाषा उर्दू का अशराफीकरण करने की कोशिश की गई। उर्दू में अशराफ उच्च वर्ण व समाज पर सांस्कृतिक स्तर पर वर्चस्व रखने वाले वर्ग को कहते हैं। जैसे संस्कृतनिष्ठ हिन्दी समाज में विशिष्ट और सामाजिक स्तर पर वर्चस्व रखने वाले वर्ग की संस्कृति के अनुकूल मानी जाती है।

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पाकिस्तान और भारत में राष्ट्र भाषाओं के विकास के क्रम में एक सामान विशिष्टता यह भी देखी जाती है कि हिन्दी में हिंग्लिश का प्रयोग बेतहाशा बढ़ा है। हिन्दी के बजाय हिंग्लिश पर जोर दिया जाता है । हिन्दी में हिंग्लिश का विस्तार इस हद तक देखने को मिलता है कि देश के लोकप्रिय समाचार पत्रों ने हिन्दी की जगह हिंग्लिश को अपनी भाषा के रुप में स्वीकार कर लिया। हिंग्लिश को एक भाषा के रुप में मान्यता दी। हिन्दी के समाचार पत्रों में छपने वाले कुछ शीर्षकों को उदाहरण के रुप में हम यहां देख सकते हैं। जैसे-‘डिफेंस मिनिस्टर की चेतावनी’ ‘रोड पर लेडी ने सुसाइड किया, 'सेंचुरी मारकर ही मिलेगी प्रमोशन' तथा 'नेवी चीफ ने मुंबई में विज़िट

मीडिया स्टडीज ग्रुप ने एक शोघ के दौरान नवभारत टाइम्स अखबार के 23 जून 2010 और 27 नवंबर 2018 के अंकों का अध्ययन कर यह जानने की कोशिश की गई है कि नवभारत टाइम्स अखबार 2010 में किस तरह हिन्दी में हिंग्लिश या देवनागरी लिपि में अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल करता था और आज इस अखबार में किस तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है।

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जून 2010 के अखबार के उपलब्ध 8 पेजों में रोमन लिपि में अंग्रेजी शब्दों के संक्षिप्तीकरण IIIT (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इन्फोरमेशन टेक्नोलॉजी), IMPOSSIBLE, EGM (आसाधारण आम बैठक) का इस्तेमाल किया गया। जबकि 2018 के अखबार में रोमन लिपि में अंग्रेजी शब्दों के संक्षिप्तीकरण का इस्तेमाल काफी तेजी से बढ़ा है। उपर्युक्त तालिका को देखा जा सकता है। 2018 में एमसीडी को MCD, सुप्रीम कोर्ट को SC को, डीटीसी को DTC, जीपीएस को GPS, करोड़ को Cr., जी-20 को G-20, एचआरडी को HRD, आरएसएस को RSS लिखा जाने लगा। 2010 में इन्हीं शब्दों को देवनागरी लिपि में लिखा जाता था। आज भी रोल, असेंबली, रिलैक्स, चीफ जस्टिस, ड्राइवर, सीएम, हॉस्पिटल आदि शब्दों का खूब इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन 2018 में हिंग्लिश, देवनागरी लिपि में अंग्रेजी शब्दों के बजाये अंग्रेजी शब्दों के संक्षिप्तीकरण का इस्तेमाल तेजी से किया जा रहा है।

हिन्दी की जगह हिंग्लिश जैसे ही पाकिस्तान में उर्दू की जगह उर्दिश को लोकप्रिय करने में सरकारों की भी भूमिका रही है। 14 अगस्त 2015 को पाकिस्तान के केन्द्रीय मंत्री एहसान इकबाल ने यह ऐलान किया कि अब उर्दू और अंग्रेजी माध्यम के विवाद से छुटकारा पाने के लिए स्कूलों में उर्दिश भाषा में पढ़ाई होगी। उर्दू और अंग्रेजी से मिली जुली भाषा को उर्दिश का नाम दिया गया। उर्दिश की तरफदारी करते हुए उनका कहना था कि उर्दू और अंग्रेजी के विवाद की वजह से देश के शिक्षा के स्तर को धक्का लगा है। पाकिस्तान में पंजाब प्रांत और खैबर पख्तुनख्वा की सरकारों ने उर्दू से पल्ला झाड़ते हुए कहा कि वे अपने प्रांतों में अंग्रेजी माध्यम से स्कूलों में पढ़ाई की व्यवस्था करेंगे।

पाकिस्तान और भारत में उर्दू और हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाने की राजनीति भले ही चमकी हो लेकिन व्यवहारिक स्तर पर इसके विपरीत स्थितियां विकसित होती गई है। जिस तरह से भारत में निजी क्षेत्र में खुलने वाले शिक्षण संस्थानों की भाषा अंग्रेजी होती है और हिन्दी केवल सरकारी स्कूलों तक सीमित होती गई है। ठीक उसी तरह से पाकिस्तान में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों का तेजी से विस्तार हुआ है। एक अध्ययन बताता है कि सन 2000 के बाद से पाकिस्तान में अंग्रेजी माध्यम के निजी स्कूलों की तादाद 105 प्रतिशत की दर से बढ़ी है।

पाकिस्तान उर्दू की जगह उर्दिश और भारत हिन्दी की जगह हिंग्लिश के बीच में खड़े देश बन चुके हैं। ये दो देश भले ही हैं लेकिन भाषा के विकास और विवाद के लिहाज से एक जैसे देश लगते हैं।

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