ग्लासगो में ऐसा वादा कर आए प्रधानमंत्री मोदी जिसकी भनक देश के पर्यावरण मंत्री तक को नहीं थी

पीएम मोदी ने ग्लासगो में अचानक ऐलान कर दिया कि भारत 2070 तक कार्बन न्यूट्रल बन जाएगा। इससे जितना आश्चर्य दुनिया भर के विशेषज्ञों और राजनेताओं को हुआ, उतना ही देश के पर्यावरण परिवर्तन मंत्री को भी हुआ होगा, क्योंकि उन्हें इसकी पहले से कोई भनक तक नहीं थी।

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महेन्द्र पांडे

जलवायु परिवर्तन के पेरिस समझौते से सम्बंधित कांफ्रेंस ऑफ़ पार्टीज के 26वें अधिवेशन का आयोजन स्कॉटलैंड के ग्लासगो शहर में किया गया था, और इसमें भारत समेत अधिकतर देशों के मुखिया इसमें मौजूद थे| इस अधिवेशन के ठीक पहले तक भारत सरकार का आधिकारिक वक्तव्य था कि अमीर देश जलवायु परिवर्तन की ऐतिहासिक जिम्मेदारी स्वीकार करें और गरीब देशों की पर्याप्त आर्थिक मदद करें। कार्बन न्यूट्रल या बिना कार्बन वाली अर्थव्यवस्था के लक्ष्य के बारे में भारत ने कभी बात नहीं की थी और अक्टूबर के अंत में भारत के पर्यावरण मंत्री भूपेन्द्र यादव ने फिर से दुहराया था कि बिना कार्बन वाली अर्थव्यवस्था जलवायु परिवर्तन का हल नहीं है। पर, 1 नवम्बर को प्रधानमंत्री मोदी ने ग्लासगो अधिवेशन में अचानक ऐलान कर दिया कि भारत वर्ष 2070 तक कार्बन न्यूट्रल बन जाएगा। इस ऐलान से जितना आश्चर्य दुनिया भर के विशेषज्ञों और राजनेताओं को हुआ, जाहिर है उतना ही आश्चर्य हमारे देश के पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्री को भी हुआ होगा।

जाहिर है, पर्यावरण मंत्री को प्रधानमंत्री के ऐलान से पहले इस बारे में कुछ पता ही नहीं होगा, पर यही मोदी जी की विशेषता है – कोविड 19 के फैसलों के बारे में स्वास्थ्य मंत्री को पता नहीं होता, नोटबंदी के बारे में रिज़र्व बैंक को पता नहीं होता, जम्मू-कश्मीर के फैसलों के बारे में वहां के राजनेताओं को पता नहीं होता, और कृषि कानूनों के बारे में किसानों को पता नहीं होता। दूसरी तरफ गृहमंत्री अमित शाह कहते हैं कि मोदी जी देश के इतिहास में सबसे अधिक लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री हैं और वे हरेक फैसला सबसे विचार-विमर्श के बाद ही करते हैं।

जलवायु परिवर्तन और तापमान वृद्धि के लिए मुख्य तौर पर वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड गैस के वायुमंडल में उत्सर्जन को जिम्मेदार माना जाता है। इसीलिए हमेशा कहा जाता है कि वायुमंडल में इस गैस को उत्सर्जित करने को रोक देने से ही इस समस्या का हल निकलेगा| कार्बन न्यूट्रल का मतलब है, वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड का शून्य उत्सर्जन, किसी देश से जितना भी कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होगा, उसे वायुमंडल में नहीं मिलने दिया जाएगा। अब तक भारत को छोड़कर दुनिया के सभी प्रमुख देश कार्बन न्यूट्रल के लक्ष्य को सुनिश्चित कर चुके थे – अमेरिका और यूरोपीय देशों की योजना वर्ष 2050 की है जबकि चीन और सऊदी अरब के लिए यह वर्ष 2060 है। तमाम अंतर्राष्ट्रीय दबावों के बाद भी भारत यह लक्ष्य निर्धारित नहीं कर रहा था।

पर, ग्लासगो के मंच से वर्ष 2070 की घोषणा कर प्रधानमंत्री ने सबको चौंका दिया। सवाल यह है कि क्या इस घोषणा से पहले प्रधानमंत्री ने भारतीय वैज्ञानिकों के साथ कोई गहन विचार-विमर्श किया था? पर्यावरण मंत्रालय ने ऐसा कुछ लक्ष्य निर्धारित किया था? या फिर मंच पर खड़े होकर भाषण देते हुए जो भी वर्ष याद आया, उसकी घोषणा कर दी? इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत वर्ष 2030 तक उर्जा की कुल मांग में से आधे का उत्पादन नवीनीकृत उर्जा स्त्रोतों से करेगा और यह उत्पादन 500 गिगावाट के समतुल्य होगा। प्रधानमंत्री के अनुसार देश की अर्थव्यवस्था को भी कार्बन मुक्त करने के प्रयास किये जा रहे हैं।


भारत इस समय कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन के सन्दर्भ में दुनिया में चीन और अमेरिका के बाद तीसरे स्थान पर है। देश में ना तो पेट्रोलियम पदार्थों की मांग कम हो रही है और ना ही कोयले पर निर्भरता कम होने का नाम ले रही है। सरकार लगातार कोयले के नए ब्लॉक्स आबंटित कर रही है, कोयले का उत्पादन बढ़ा रही है, कोयले का आयात भी बढ़ा रही है। अडानी तो ऑस्ट्रेलिया से कोयला लाकर देश में खपा रहे है। बड़े देशों में भारत ही अकेला देश है जहां कोयले की खपत बढ़ती जा रही है। जंगल कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं और इसे वायुमंडल में मिलने से रोकते हैं, पर देश के अधिकतर जंगल संकट में हैं और इनका क्षेत्र लगातार कम हो रहा है। मोदी सरकार के दौर में पूरे देश के जंगलों में खनन और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं का जाल बिछाया जा रहा है। जलवायु परिवर्तन के मूल में वायु प्रदूषण है, जबतक वायु प्रदूषण कम नहीं होगा, जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित नहीं किया जा सकता।

प्रधानमंत्री मोदी ने कोयला उत्पादन को आत्मनिर्भर भारत के नारे से जोड़ दिया है। पिछले वर्ष 41 नए कोयला ब्लॉक्स की नीलामी के समय प्रधानमंत्री ने कहा था कि भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा कोयला उत्पादक है तो फिर यह सबसे बड़ा निर्यातक क्यों नहीं बन सकता – यानी मोदी जी केवल भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में कोयले का उपयोग बढ़ाना चाहते हैं। इन ब्लॉक्स में से अधिकतर ब्लॉक्स घने जंगलों और वन्यजीवों के इलाके में हैं और इनसे वनवासियों का बड़े पैमाने पर विस्थापन होगा। इसी कारण से कांग्रेस शासन के दौरान इन कोयला भंडारों की नीलामी नहीं की गयी थी। पिछले वर्ष संयुक्त राष्ट्र के अधिवेशन में भारत के प्रतिनिधि ने बताया था कि देश में कोयले की खपत बढ़ रही है और इसका उपयोग आने वाले कई दशकों तक चलता रहेगा।

देश में कोयले की निर्भरता का नमूना पिछले महीने ही देखने को मिला था, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोयले के दाम बढ़ गए थे और दूसरी तरफ देश में कोयले में अचानक कमी आ गयी थी। तब पूरे देश के ताप-बिजली घरों में कोयले के भण्डार लगभग ख़त्म हो गए थे और विद्युत उत्पादन ठप्प होने के कगार पर पहुँच गया था।

ग्लासगो में यूनाइटेड किंगडम की पहल पर दुनिया भर से कोयले के उपयोग को ख़त्म करने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया है। इसके अनुसार अमीर देशों को वर्ष 2030 तक और गरीब देशों को 2040 तक कोयले के उपयोग को पूरी तरह बंद करना है, और इस प्रस्ताव पर कनाडा, पोलैंड, साउथ कोरिया, यूक्रेन और चिली जैसे 40 देश स्वीकृति के लिए हस्ताक्षर कर चुके हैं। और, साउथ अफ्रीका, इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे देश सहमति दे चुके हैं। दूसरी तरफ जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए अपने को चैम्पियन साबित करते ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत और अमेरिका जैसे देशों ने न तो इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किये हैं और ना ही सैद्धांतिक तौर पर स्वीकार करने की सहमती जताई है।

इन सबके बाद भी प्रधानमंत्री जी के अनुसार अर्थव्यवस्था से कार्बन उत्सर्जन में कमी आ रही है – यह निश्चित तौर पर एक कौतूहल का विषय है।

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Published: 07 Nov 2021, 7:00 AM