पीएम मोदी का विकसित भारत और स्मार्ट शहरों के मैनहोल में डूबते लोग
प्रधानमंत्री मोदी के विकसित भारत में सत्ता और पूंजीपति अट्टाहास कर रहे हैं, लाभार्थी जनता अफीम के नशे में है, मीडिया अपराधियों को भगवान बना रही है और इन सबके बीच विकास की बारिश हो रही है, विकास नदियों में बहने लगा है, अब तो विकास से लोग मरने भी लगे हैं।

प्रधानमंत्री मोदी पिछले कुछ वर्षों से लगातार विकसित भारत की बात करते रहे हैं, और अब तो देश में विकास की बाढ़ आ गई है। भारतीय संविधान की शपथ लेने वाले वाले सारे माननीय सत्ता और मोदी जी को ही संविधान मान बैठे हैं। संवैधानिक संस्थाएं केवल हुकूमत को खुश करने का काम कर रही हैं, चुनाव आयोग बेशर्मों की तरह सत्ता की नौकरी में मशगूल है, पूंजीवाद फल-फूल रहा है और न्यायालय भी अधिकतर फैसलों से सत्ता को खुश करने का काम कर रही है। इससे अधिक देश में और क्या विकास हो सकता है?
अब तो विकास का आलम यह है कि यह नदियों, नालों में बहने लगा है, खेतों के बीच की पगडंडियों पर भागने लगा है, प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र की तरह लीक होने लगा है और अयोध्या में ट्रस्ट की तरह घपले भी करने लगा है। यही प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, मंत्रियों-संतरियों, नौकरशाहों और संवैधानिक संस्थाओं में योग्यता से नहीं बल्कि सत्ता की कृपा से बैठे अधिकारियों, जनता के अधिकारों को कुचलते न्याय व्यवस्था और सत्ता-चालीसा का जाप करती मीडिया के सपनों का भारत है।
दरअसल मोदी जी के विकास की परिभाषा इतनी व्यापक है कि बाढ़ में डूबते लोग, गर्मी से मरते लोग, मैनहोल में गिरकर जान गंवाते लोग, पानी की किल्लत से जूझते लोग या बोरवेल में गिरकर मरते बच्चे इसे समझ ही नहीं पा रहे हैं। मुंबई में एक व्यक्ति बारिश के बीच मैनहोल में गिरकर मर गया। यह भी एक विकास है, जिसे सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर विकास बताती है। दिल्ली में तमाम फ्लाइओवर, अन्डरपास, एक्स्प्रेसवे और मेट्रो वाले विकास के बीच थोड़ी बारिश भी सड़कों को दरिया में तब्दील कर जाती है– सत्ता को यह भी एक विकास नजर आता है।
स्वच्छ शहर इंदौर में तो विकास ने पानी को ही जहर बना दिया है। सरकार विकास कर रही है और लोग जहर पी रहे हैं। राजकोट में और देश के दूसरे अनेक शहरों में बारिश आते ही सड़कें गड्ढों से भर जाती हैं, देश के अधिकतर हाइवे और एक्स्प्रेससवे का भी यही हाल है। विकास के दौर में जितने पुल गिरे होंगें उस पर महाभारत जैसा महाकाव्य लिखा जा सकता है- मोदी जी के राज में विकास दरअसल विनाश का महाकाव्य है। पिछले 5 वर्षों से लगातार मुफ्त 5 किलो अनाज के सहारे जिंदा रखे गए 81 करोड़ लोग विकास की पराकाष्ठा हैं– इस जनता के सामने जब भी वर्ष 2047 तक विकसित भारत, 30 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था, प्रति व्यक्ति 18000 डॉलर की आय और सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की बात की जाती है तब विकास भी आत्महत्या कर लेता है।
प्रधानमंत्री मोदी गावों के और कस्बों के विकास की और अंतिम आदमी के विकास की बातें करते हैं और उनका नीति आयोग केवल महानगरों के ढांचे और प्रशासन को दुरुस्त करने की बात करता है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश के विकास की धूरी 10 लाख से अधिक आबादी वाले महानगर हैं, यही विकास के इंजन हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार देश में कुल 46 महानगर थे। मोदी राज में कितने महानगर हैं इसके आंकड़े उपलब्द्ध नहीं हैं। अब तो स्मार्ट सिटी पर बात होती है और हमारे बेहतरीन शहर भी विकास की बाढ़ में डूबने लगे हैं। इन 46 महानगरों का सम्मिलित क्षेत्रफल 10926 वर्ग किलोमीटर है और सम्मिलित आबादी 11.56 करोड़ है। सारे आंकड़े वर्ष 2011 की जनगणना के हैं। देश के कुल शहरी क्षेत्रों में जितनी आबादी रहती है उसमें से 31 प्रतिशत महानगरों में रहती है।
हाल में ही भारत सरकार के सांख्यिकी विभाग ने बताया है कि छोटे शहरों और गावों से लोगों का पलायन अन्य शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा महानगरों में अधिक है क्योंकि वहां रोजगार के अवसर अधिक हैं। दूसरी तरफ कस्बों, छोटे शहरों और गावों के विकास पर ध्यान नहीं देने से महानगरों में साधारण श्रमिकों और माध्यम वर्ग का जीवन कठिन होता जा रहा है। महानगरों में पानी, हरियाली, प्रदूषण, अत्यधिक तापमान के खतरे और स्वास्थ्य की समस्याएं विकराल होती जा रही हैं। केंद्र और राज्य सरकारें विकास के नाम पर इंफ्रास्ट्रक्चर विकास की रंगीन तस्वीरें प्रस्तुत करती हैं, पर दिन-पर-दिन आम आबादी का जीवन कठिन और असुरक्षित होता जा रहा है। ध्रुवीकरण की राजनीति ने जीवन को और कठिन कर दिया है– अब बुलडोजर न्याय का प्रतीक बन गया है और कोई भी कभी भी घुसपैठिया करार दिया जा सकता है।
प्रधानमंत्री बार-बार “ईज़ ऑफ लिविंग” की बात करते हैं, पर उनके विकसित भारत में तो जिंदा रहने का अधिकार ही केवल सवर्ण हिंदुओं को है। सत्ता-संरक्षित पूंजीवाद ने आदिवासियों की जमीनों और संपदा को लूट लिया, पिछड़ी जाति के हिंदुओं की हत्या कभी भी की जा सकती है। सत्ता और कानून ऐसे हत्यारों और बलात्कारियों की सुरक्षा में तत्पर रहते हैं और सत्ता-समर्थक फूल-माला पहनाने को आतुर।
मुस्लिम और क्रिश्चियन अधिकार-विहीन नागरिक घोषित कर दिए गए हैं– कहीं भी इनकी संपत्तियों पर कब्जा किया जा सकता है, इनके घरों और पूजा स्थलों को बुल्डोजर से ढहाया जा सकता है, गौ-तस्करी के नाम पर या बिना कारण भी इनकी हत्या की जा सकती है। सत्ता में बैठे शीर्ष नेतृत्व से लेकर हरेक छुटभैये नेता तक सवर्ण हिंदुओं को छोड़कर शेष सभी वर्गों और धर्मों के लिए अनर्गल प्रलाप से लेकर हिंसक बयानों के लिए आजाद हैं। हिंसक बयानों वाले नेताओं को सत्ता में बड़े आदर-भाव से देखा जाता है और राजनीति में उनका उत्थान भी जल्दी होता है।
प्रधानमंत्री मोदी के विकास में ईज़ ऑफ लिविंग के नारे के बाद भी आप वायु प्रदूषण से मर रहे हैं, गंदा पानी पी कर मर रहे हैं या फिर अत्यधिक तापमान से मर रहे हैं– मरने के लिए आप स्वतंत्र हैं। दुनिया में भूख और कुपोषण से ग्रस्त व्यक्तियों की संख्या भारत में है, पर “नॉन-बायोलाजीकल” के प्रताप से यहां कोई भूख से नहीं मरता, प्रदूषण से नहीं मरता। विकास का आलम यह है कि पूरा देश खुशहाल हो गया है, सभी अपनी पूरी जिंदगी संतुष्टि में बिताते हैं– खुशहाली इंडेक्स में सबसे नीचे भारत को रखने वाले हमारी खुशहाली से जलते हैं।
देश के प्रधानमंत्री जी के विकास की परिभाषा में जनता कहीं नहीं रहती- देश की अर्थव्यवस्था का आकार, धार्मिक आयोजन, सड़कों जैसा इंफ्रास्ट्रक्चर और अरबपतियों के बड़े उद्योग ही उनके लिए विकास के पैमाने हैं, गुजरात मॉडल है। इस विकास को ही मीडिया दिनरात प्रचारित करता है। इस विकास से ही आर्थिक असमानता भयावह स्थिति में पहुंच गई है। देश के अरबपति लगातार और अमीर होते जा रहे हैं तो दूसरी तरफ गरीब पाताल तक पहुंच चुका है।
वर्ष 2014 से लगातार विकास के गुजरात मॉडल की चर्चा मोदी सरकार करती रही है, जबकि तथ्य यह है कि आर्थिक और सामाजिक विकास के अनेक पैमानों पर यह सबसे पिछड़े राज्यों में से एक है। भूख और कुपोषण के मामले में गुजरात राज्यों की सूची में अंतिम स्थान से चार स्थान ऊपर है। गुजरात में महिलाओं में खून की कमी सबसे अधिक है और यहां ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति प्रति माह खर्च देश के औसत से भी नीचे है।
विकसित भारत की तथाकथित मीडिया अब गोदी मीडिया नहीं रही बल्कि अब तो पूरी तरह से रक्त-पिपासु दानव में तब्दील हो चुकी है– समाज में ध्रुवीकरण और हिंसा फैलाना ही इसका उद्देश्य है और इसीलिए इन्हें सत्ता से संरक्षण प्राप्त है। दिनभर चलने वाले समाचार चैनलों में हिंसा, घृणा और झूठ परोसा जाता है।
प्रधानमंत्री मोदी के विकसित भारत में सत्ता और पूंजीपति अट्टाहास कर रहे हैं, लाभार्थी जनता अफीम के नशे में है, मध्यम वर्ग सरकारी 5 किलो अनाज पर जिंदा है, मीडिया अपराधियों को भगवान बना रही है और इन सबके बीच विकास की बारिश हो रही है, विकास नदियों में बहने लगा है, विकास तो अब कोहरे के पार भी दिखने लगा है। साल-दर-साल विकास की पराकाष्ठा नजर आने लगी है, अब तो विकास से लोग मरने भी लगे हैं। इस विकास की आंधी ने देश में लाभार्थियों का एक नया तबका खड़ा कर दिया है और यही लाभार्थी खैरात वाले विकास की नई परिभाषा लिख रहे हैं।
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