‘लहर’ को मात देकर रुख बदलती दिख रही है देश की सियासी हवा-राजनीतिक विमर्श पर भारी आर्थिक चर्चा

जमीनी हकीकत में कुछ तो बदलाव नजर आ ही रहा है। लोगों के रुझान में साफ परिवर्तन दिख रहा है। और, आर्थिक मंदी का प्रभाव मोदी की लोकप्रियता में दाग लगा रहा है। दिल्ली में अगर आप ओला या उबर टैक्सी में घूमें तो आपको अंदाज़ा हो जाएगा कि इन दिनों लोगों को दिमाग में सिवाय आर्थिक मंदी के और कुछ नहीं है।

फोटो : Getty Images
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नवजीवन डेस्क

हालांकि यह कहना थोड़ी जल्दबाज़ी होगी, लेकिन देश में राजनीतिक हवा शायद अपनी दिशा बदलने लगी है। सबसे पहले बात करें वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी चिदंबरम की, तो उन्हें मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दे दी। उन पर कथित भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर सीबीआई ने गिरफ्तार किया था। इसी बीच शाम होते-होते विधानसभा चुनावों को एक्जिट पोल के अनुमान सामने आ गए कि हरियाणा में त्रिशंकू विधानसभा के आसार हैं। इसके अगले ही दिन यानी बुधवार (23 अक्टूबर) को दिल्ली हाईकोर्ट ने कर्नाटक कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डी के शिवकुमार को जमानत दे दी।

इन घटनाओं के बाद मोदी के आलोचक आंखें मलते दिख रहे हैं कि क्या बीजेपी के पक्ष में बहने वाली हवा थमने लगी है। निश्चित तौर पर इसका किसी को कोई खास अंदाज़ा तो नहीं है। महाराष्ट्र और हरियाणा के नतीजे जब आएंगे तो तस्वीर कुछ साफ होगी कि राजनीतिक हवा का रुख क्या है।

फिर भी, जमीनी हकीकत में कुछ तो बदलाव नजर आ ही रहा है। लोगों के रुझान में साफ परिवर्तन दिख रहा है। और, आर्थिक मंदी का प्रभाव मोदी की लोकप्रियता में दाग लगा रहा है। दिल्ली में अगर आप ओला या उबर टैक्सी में घूमें तो आपको अंदाज़ा हो जाएगा कि इन दिनों लोगों को दिमाग में सिवाय आर्थिक मंदी के और कुछ नहीं है।

प्याज की बढ़ी कीमतें, कम होती नौकरियां, कारों की कम होती बिक्री, पीएमसी बैंक के घोटाले के बाद बैंक ग्राहकों की बढ़ती बेचैनी, विकास दर का गोता खाना आदि मुद्दे ही आम बातचीत का विषय हैं। ये वे मुद्दे हैं जो मध्यवर्ग और निचले तबके को सबसे ज्यादा परेशान कर रहे हैं।

नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुवाई वाली बीजेपी कश्मीर विजय का तड़का लगाकर अपना पाकिस्तान कार्ड खेल रही थी। साथ ही मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जा रहे थे। हरियाणा और महाराष्ट्र में बीजेपी ने अपने इसी कार्ड पर दांव खेला था। इस दौरान अमित शाह लगातार एनआरसी और मुस्लिम चुनौती का मुद्दा भी उठाते रहे।

कुल मिलाकर बीजेपी नई बोतल में पुरानी शराब पेश करने के फार्मूले पर ही भरोसा करती रही। चुनाव प्रचार के दौरान अनुच्छेद 370 ने बालाकोट की जगह ले ली, पाकिस्तान को भारत का दुश्मन नंबर एक बताया गया जिसे मोदी ने सबक सिखा दिया। लेकिन वह कहते हैं न कि आप कुछ लोगों को कभी-कभी मूर्ख बना सकते हैं, लेकिन सभी लोगों को हर बार मूर्ख नहीं बना सकते। इस साल हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने बालाकोट के बहाने पाकिस्तान का मुद्दा उठाकर लोगों का समर्थन हासिल किया। और इसमें कोई शक भी नहीं कि मोदी ने खुद को एक सुपर राष्ट्रवादी के तौर पर स्थापित भी किया और अपने राजनीतिक विरोधियों को संभलने का मौका नहीं दिया।

लेकिन सिर्फ 4 महीने में ही लोगों की राय बदलने लगी है। देश की अर्थव्यवस्था की हालत अब आम लोगों को अखरने लगी है। नई नौकरियां पैदा होना तो दूर, जिन लोगों के पास नौकरियां थीं, उनके जाने का सिलसिला शुरु हो चुका है। युवा अपने घरों को लौटकर मनरेगा में काम तलाश रहे हैं। किसानों की हालत पहले ही खराब थी और अनियमित मॉनसून ने उनके लिए संकट को और गहरा कर दिया है।

त्योहारी मौसम होने के बावजूद दुकानदार खाली बैठे हैं। छोटे काम-धंदे बंद हो रहे हैं। धीरे-धीरे मंदी ने अपना असर दिखाना शुरु कर दिया है। ऐसे में सिर्फ पाकिस्तान का हौवा दिखाकर कब तक मोदी लहर को बरकरार रखा जा सकता था। फिर भी कल तक तो इंतजार करना ही होगा, जब हरियाणा और महाराष्ट्र में वोटों की गिनती होगी और नतीजों का ऐलान होगा।

लेकिन एक बात तो तय है कि आम विमर्श में राजनीतिक जगह अब अर्थव्यवस्था की चर्चा हो रही है, जो कि राजनीतिक स्टंट कर तरह-तरह के हौवे खड़े करने वाले मोदी के लिए तो अच्छी खबर नहीं है।

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