राजनीति तो खूब पूर्वाग्रह फैलाती है, पर क्या कोरोना से आई महामारी को भी उसी तरह देखेंगे?

ज्यादातर संक्रामक महामारियां दूसरे जानवरों से मनुष्य में आई हैं। मानव सभ्यता के विकास से वन्य प्राणियों का बड़ी संख्या में संहार हुआ है, उनकी कई सौ प्रजातियां ही मिट गई हैं। वनों की कटाई से आज भी मिट रही हैं। महामारियों का उद्गम खेती और सभ्यता से जुड़ा है।

फोटोः सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ‘सारसकोव-2’ को चीनी वायरस कहा। पूर्वाग्रह ऐसे ही काम करता है। हम किसी नई घटना को जानने के लिए अपनी समझ के दायरे को बड़ा करने के प्रयास नहीं करते हैं, बल्कि हर नई घटना को अपने पूर्वाग्रह के हिसाब से छोटा बना लतेे हैं। यह सुविधाजनक है। इसमें कुछ नया समझने की मेहनत नहीं करनी पड़ती।

कुछ नया समझने के लिए पहले यह मानना जरूरी है कि कुछ ऐसा है जो हम नहीं जानते। यानी अपने अज्ञान को विनम्रता से स्वीकार करना पड़ता है। हमारे पूर्वाग्रह हमें यह बताते हैं कि हम पहले से ही सब-कुछ जान चुके हैं, सभी विश्लेषण कर चुके हैं। अब तो बस, कर्म करना भर है। जैसे ही उस हिसाब से कर्म करना शुरू होगा, आदर्श दुनिया बन जाएगी। हर पूर्वाग्रह इसी आधार पर अपनी आदर्श दुनिया बनाना चाहता है। ट्रंप की आदर्श दुनिया मुनाफाखोरी और उपभोक्तावाद की है।

अगर ट्रंप इतिहास को ठीक से टटोलते, तो पाते कि अमेरिका के जिन मूल निवासियों का नरसंहार कर के यूरोप के लोग अमेरिका में बसे, उनके मरने का सबसे बड़ा कारण वे रोग थे, जिन्हें यूरोपीय लोग अपने साथ अमेरिका लाए थे। चेचक, प्लेग, माता, हैजा, जुकाम-खांसी, डिप्थीरिया, मलेरिया, टी.बी., टायफाएड जैसे अनेक नए रोगों का अमेरिका में हजारों साल से रह रहे लोगों को सामना करना पड़ा जिनसे जूझने का उन्हें कोई अभ्यास नहीं था।

ऐसे भी उदाहरण हैं कि यूरोप के लोगों ने जान-बूझ कर छूत की बीमारियां वहां के मूल निवासियों को दीं। जो लोग महामारियों से बच सके, उन्हें यूरोपीय गुलामी और साम्राज्यवाद की हिंसा ने मारा। कुछ सालों में कई आबादियों के नब्बे प्रतिशत घट जाने के उदाहरण मिलते हैं। यह इतिहास के सबसे बड़े नरसंहारों में गिना जाता है। लगभग 100 साल में 5.5 करोड़ लोगों के मारे जाने का अनुमान है।


यूरोपीय साम्राज्यवाद के जहाजों पर दुनिया से दूसरी महामारियां भी यूरोप पहुंचीं। ‘सिफिलिस’ या उपदंश का रोग अमेरिका से यूरोप लाने वाले यूरोपीय लोग ही थे। भारत के बंगाल से हैजे की महामारी यूरोप के बहुत से बड़े नगरों तक पहुंची। लाखों लोग मारे गए। जब तक यूरोप के शहरों में आधुनिक सीवर तंत्र नहीं बने, तब तक हैजा लाखों को मारता रहा, क्योंकि मल-मूत्र उन्हीं जल स्रोतों में जाते थे, जिनसे पीने का पानी आता था।

साम्राज्यवाद और महामारियों का संबंध और पुराना है। प्लेग की महामारी मंगोलिया और उत्तर चीन से होते हुए मंगोल साम्राज्य की सड़कों के सहारे यूरोप पहुंची। जिस ‘सिल्क रोड’ के सहारे पहली बार यूरोप का सीधा संबंध एशिया से हुआ, उसी के सहारे प्लेग यूरोप पहुंचा। एक उदाहरण तो ऐसा है कि मंगोल सेना ने प्लेग से मरे हुए लोगों की लाशों को उछाल कर क्राइमीया के एक किलेबंद नगर के भीतर फेंका जहां से भागते हुए लोग इसे इटली ले गए। फिर इटली से प्लेग पूरे यूरोप में फैला।

सन 1918 से 1920 के बीच इनफ्लूएन्जा की महामारी ने दुनिया भर में 5-10 करोड़ लोगों को मारा। एक अनुमान यह है कि दुनिया की आबादी का 5 फीसदी हिस्सा इसकी बलि चढ़ गया था और लगभग आधी आबादी को यह रोग हुआ था। इसका नाम ‘स्पैनिश फ्लू’ इसलिए पड़ा क्योंकि इसकी चर्चा सबसे पहले स्पेन में शुरू हुई थी, जहां दूसरे विश्व युद्ध का असर नहीं था। वहां इसे ‘फ्रेंच फ्लू’ कहते थे। दूसरे देशों में पहले विश्व युद्ध की वजह से इसकी जानकारी को दबाया गया। धीरे-धीरे इसे स्पेन के नाम से जाना गया, हालांकि यह पता नहीं कि इसका उद्गम कहां हुआ था।

ज्यादातर संक्रामक महामारियां दूसरे जानवरों से मनुष्य में आई हैं। मनुष्य सभ्यता के विकास से वन्य प्राणियों का बड़ी संख्या में संहार हुआ है, उनकी कई सौ प्रजातियां ही मिट गई हैं। वनों की कटाई से आज भी मिट रही हैं। महामारियों का उद्गम खेती और सभ्यता से जुड़ा है। मनुष्य मूलतः आरण्यक प्राणी है और अपने कुल इतिहास के ज्यादातर हिस्से में उसने आरण्यक जीवन ही जिया है, जैसे आज भी आदिवासी समाज जीते हैं। खेती और सभ्यता की वजह से इसमें दो बड़े बदलाव आए। एक, बड़ी संख्या में लोग छोटी जगहों पर रहने लगे, जैसा पहले नहीं होता था। दो, खेती और मांस के लिए वन्य प्राणियों को पालतू बनाया।


इन प्राणियों में ऐसे कई जीवाणु थे जो इनके लिए रोग का कारण नहीं थे, पर जिनसे संक्रमण के बाद मनुष्य को रोग हो गया। खेती की पैदावर को गोदामों में रखने से चूहों जैसे प्राणी बस्तियों के पास रहने लगे, जिनसे रोग और फैलते गए। संक्रामक रोगों का फैलना हमारे विकास से जुड़ा है। यह बताता है कि जिस औद्योगिक-आर्थिक विकास को हमने असीम मान लिया है, उसकी सीमाएं क्या हैं।

विकास की ओछी राजनीति में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप पारंगत हैं। वे पूंजीवाद-मुनाफाखोरी-उपभोक्तावाद के पक्के पैरोकार हैं। इस तरह के विकास से उपजा जलवायु परिवर्तन आज सारी पृथ्वी के लिए खतरा बन चुका है। इसका ऐतिहासिक जिम्मा सबसे ज्यादा अमेरिका पर है। पर ट्रंप हमेशा ही जलवायु परिवर्तन का जिम्मा चीन और फिर भारत पर मढ़़ते हैं।

यह राजनीति करने का कामयाब नुस्खा है। हमारे यहां भी जब राजनीतिक तंत्र से कठिन सवाल पूछ जाते हैं, तब सवालों का सामना करने के बजाय पाकिस्तान का नाम लिया जाता है। जो पत्रकार सरकार और सत्ता की सेवा को अपना धर्म समझते हैं, वे अपने देश-समाज पर जानकारी जुटाने की बजाय पाकिस्तान को ले कर चीखते-चिल्लाते रहते हैं। आतंकवाद बढ़ाने जैसे मामलों में पाकिस्तान की भूमिका तो सर्वविदित रही है। लेकिेन हमारी बदहाली के बड़े कारण पाकिस्तान में नहीं, हमारे अपने समाज और राजनीति में हैं।

किसी दूसरे देश पर इस महामारी का जिम्मा डालना उदाहरण है कि ट्रंप इस बीमारी को कैसे देखते हैं। यह संकेत है कि वे इस चुनौती से निपटने के लिए विवेक का इस्तेमाल नहीं करेंगे। राजनीति में वे सफल ऐसे ही नहीं हैं। राजनीति में पूर्वाग्रह खूब फलते-फूलते हैं क्योंकि वहां इन्हें सत्ता पालती-पोसती है।

लेकिन आप क्या करेंगे? क्या आप कोरोना वायरस से फैली इस महामारी को अपने-अपने पूर्वाग्रहों की आंख से ही देखेंगे? अपनी राजनीतिक विचारधारा? आपका अपना धार्मिक आग्रह?

(पत्रकार, गांधीवादी और पर्यावरणविद सोपान जोशी ने 22 मार्च को यह टिप्पणी फेसबुक पर पोस्ट की है। ताजा माहौल में इसे पढ़ना जरूरी है)

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