वर्षा से पहले जल-संरक्षण की तैयारी, गांवो वालों की मेहनत से सूखी नदी में बह निकली पानी की धारा

भारत में वर्षा कुछ महीनों में ही अधिक केन्द्रित रहती है, अतः मानसून के आगमन से पहले एक महत्त्वपूर्ण सवाल यह रहता है कि क्या वर्षा के जल के संरक्षण की ऐसी समुचित तैयारी हो गई है कि ताकि बाद के सूखे महीनों में कठिनाई न आए।

फोटो: सोशल मीडिया
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भारत डोगरा

भारत में वर्षा कुछ महीनों में ही अधिक केन्द्रित रहती है, अतः मानसून के आगमन से पहले एक महत्त्वपूर्ण सवाल यह रहता है कि क्या वर्षा के जल के संरक्षण की ऐसी समुचित तैयारी हो गई है कि ताकि बाद के सूखे महीनों में कठिनाई न आए। नए जल-संरक्षण कार्यों के अतिरिक्त पहले से चले आ रहे जल-स्रोतों की सफाई करना और उनकी जल-संग्रहण क्षमता को बढ़ाना भी इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। इस तरह के प्रयासों से अनेक गांवों को सूखे और बाढ़ दोनों के संकट को कम करने में मदद मिलती है।

बांदा जिले में भंवरपुर ऐसा ही एक गांव है। यहां गरीबी का प्रकोप बहुत है। अन्य कारणों के अतिरिक्त एक वजह यह भी रही कि गांव के पास बह रही घरार नदी सूख गई। उसके बहाव क्षेत्र खरपतवार से पट गए। इस कारण जल-संकट उत्पन्न हो गया, सिंचाई बहुत कम हो गई, पशु प्यासे रह गए। वर्षा के दिनों में वर्षा का जल नदी के बहाव क्षेत्र की ओर जाने की जगह गांव की आबादी की ओर आकर विनाश करने लगा।

हाल ही में प्रवासी मजदूर लौट कर आए तो उनके लिए रोजगार का अभाव था। उन्होंने इस संकट के बीच एक रचनात्मक राह निकालते हुए इस नदी के बहाव क्षेत्र को साफ करने के लिए श्रमदान का निर्णय किया। कुछ दिनों तक लगभग 50 लोगों ने मिलकर मेहनत की तो खरपतवार हट गई। कुछ और खुदाई के बाद पानी की धारा भी बह निकली। नदी को नया जीवन देने के लिए अभी आसपास के अनेक गांवों में प्रयास करने पड़ेंगे पर इस गांव के जल-संकट को दूर करने में और बाढ़ की समस्या दूर करने दोनों में मदद मिली।

सृजन नाम की एक संस्था ने बुंदेलखंड की अनेक संस्थाओं से तालाबों मे जमा गाद मिट्टी हटाने के लिए संपर्क किया। इस तरह अनेक सप्ताह के सघन प्रयास से अनेक तालाबों में वर्षों से जमा गाद-मिट्टी निकाल कर सफाई की गई। यह गाद-मिट्टी बहुत महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक खाद भी है। बहुत से किसानों को अमूल्य खाद मिल गई। उधर तालाबों की जल-ग्रहण क्षमता बढ़ गई। जल-संकट भी कम हुआ और बाढ़ की संभावना भी कम हुई।

इस तरह के अनेक उपयोगी और उत्साहवर्धक प्रयास देश में बिखरे हुए हैं जिन्होेंने सूखे और बाढ़ दोनों का संकट कम करने में बहुत मदद की है। पर यदि हम पूरे देश की जरूरत की दृष्टि से देखे तो इस समय यह प्रयास बहुत कम हैं। अब मनरेगा का विस्तार होने से इन कार्यों को और तेजी से आगे बढ़ाने की संभावना बढ़ गई है जिसका भरपूर उपयोग करनी चाहिए।

दूसरी ओर ऐसे भी बहुत उदाहरण हैं जिनमें भ्रष्टाचार के कारण पैसा बहुत खर्च हो गया पर वांछित परिणाम नहीं मिले। अतः जल संरक्षण कार्यों से भ्रष्टाचार भी दूर करना भी बहुत जरूरी है।

भारत में वर्षा और जल संरक्षण का विशेष अध्ययन करने वाले मौसम विज्ञानी पी.आर. पिशारोटी ने बताया है कि यूरोप और भारत में वर्षा के लक्षणों में बहुत महत्वपूर्ण अंतर है। यूरोप में वर्षा धीरे-धीरे पूरे साल होती रहती है। इसके विपरीत भारत के अधिकतर भागों में वर्ष के 8760 घंटों में से मात्र लगभग 100 घंटे ही वर्षा होती है। इसमें से कुछ समय मूसलाधार वर्षा होती है। इस कारण आधी वर्षा मात्र 20 घंटों में ही हो जाती है। अतः स्पष्ट है कि जल संग्रहण और संरक्षण यूरोप के देशों की अपेक्षा भारत जैसे देशों में कहीं अधिक आवश्यक है। भारत की वर्षा की तुलना में यूरोप में वर्षा की सामान्य बूंद काफी छोटी होती है। इस कारण उसकी मिट्टी काटने की क्षमता भी कम होती है। यूरोप में बहुत सी वर्षा बर्फ के रूप में गिरती है जो धीरे-धीरे धरती में समाती रहती है। भारत में बहुत सी वर्षा मूसलाधार वर्षा के रूप में गिरती है जिसमें मिट्टी को काटने और बहाने की बहुत क्षमता होती है।

दूसरे शब्दों में हमारे यहां की वर्षा की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि यदि उसके जल के संग्रहण और संरक्षण की उचित व्यवस्था नहीं की गई तो यह जल बहुत सी मिट्टी बहाकर निकट की नदी की ओर वेग से दौड़ेगा और नदी में बाढ़ आ जाएगी। चूंकि अधिकतर जल न एकत्र होगा न धरती में रिसेगा, अतः कुछ समय बाद जल संकट उत्पन्न होना भी स्वाभाविक ही है। इन दोनों विपदाओं को कम करने के लिए या दूर करने के लिए जीवनदायी जल का अधिकतम संरक्षण और संग्रहण आवश्यक है। इसके लिए पहली आवश्यकता है वन, वृक्ष और हर तरह की हरियाली जो वर्षा के पहले वेग को अपने ऊपर झेलकर उसे धरती पर धीरे से उतारे ताकि यह वर्षा मिट्टी को काटे नहीं अपितु काफी हद तक स्वयं मिट्टी में ही समा जाए या रिस जाए और पृथ्वी के नीचे जल के भंडार को बढ़ाने का अति महत्त्वपूर्ण कार्य करे।

दूसरा महत्वपूर्ण कदम यह है कि वर्षा का जो शेष पानी नदी की ओर बह रहा है उसके अधिकतम संभव हिस्से को तालाबों या पोखरों में एकत्र कर लिया जाए। वैसे इस पानी को मोड़कर सीधे खेतों में भी लाया जा सकता है। खेतों में पड़ने वाली वर्षा का अधिकतर जल खेतों में ही रहे, इसकी व्यवस्था भू-संरक्षण के विभिन्न उपायों जैसे मेंड़बंदी, पहाड़ों में सीढ़ीदार खेत आदि से की जा सकती है। तालाबों में जो पानी एकत्र किया गया है वह उसमें अधिक समय तक बना रहे इसके लिए तालाबों के आस-पास वृक्षारोपण हो सकता है और वाष्पीकरण कम करने वाला तालाब का विशेष डिजाईन बनाया जा सकता है। तालाब से होने वाले सीपेज का भी उपयोग हो सके, इसकी व्यवस्था हो सकती है। एक तालाब का अतिरिक्त पानी स्वयं दूसरे में पंहुच सकें और इस तरह तालाबों की एक सीरीज बन जाए, यह भी कुशलतापूर्वक करना संभव है।

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