प्रियंका गांधी की एंट्री ने बदल दिया है उत्तर प्रदेश में चुनावी और सियासी नैरेटिव

लखीमपुर में किसानों के साथ मजबूती से खड़ी दिखी प्रियंका लौटीं तो बहुत कुछ बदला हुआ था। यह नए तरह का उत्साह था जो यूपी कांग्रेस के बीते तमाम वर्षों में बहुत कम अवसरों पर दिखा। इसके चलते यूपी के विपक्षी दल समाजवादी पार्टी और बीजेपी के माथे पर शिकन बढ़ा दी है।

सोशल मीडिया
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नागेंद्र

जब कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी बाराबंकी के हरख बाजार से यूपी कांग्रेस की ‘प्रतिज्ञा यात्रा’ की शुरुआत कर रही थीं, तो उत्तर प्रदेश में चुनाव पूर्व चर्चाओं का एक नया नैरेटिव गढ़ा जा रहा था। यह नैरेटिव ‘लखीमपुर 4 अक्टूबर’ से आगे का था जिसमें सूबे में चुनाव की आहट के बीच बीते दिनों चली चर्चाओं की दिशा बदली दिखी कि यूपी में लड़ाई तो बस समाजवादी पार्टी और भाजपा के बीच है। लखीमपुर खीरी कांड के प्रभावित परिवारों से मिलने जाते हुए प्रियंका गांधी को जिस तरह सीतापुर में रोककर गेस्ट हाउस में रखा गया और वहां उन्होंने साफ-सफाई के बहाने झाड़ू लगाकर जो नया प्रतीक गढ़ा, वह अब बहुतों के मंसूबों पर झाड़ू फेरने लगा है।

लखीमपुर में किसानों के साथ मजबूती से खड़ी दिखी प्रियंका लौटीं तो बहुत कुछ बदला हुआ था। यह नए तरह का उत्साह था जो यूपी कांग्रेस के बीते तमाम वर्षों में बहुत कम अवसरों पर दिखा। लखीमपुर यूपी कांग्रेस के लिए एक ऐसा प्रस्थान बिंदु बन चुका है, जहां से न कांग्रेस पीछे मुड़कर देखना चाहेगी, न प्रियंका गांधी। हां, इसने सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित अब तक जमीन पर दिख रहे सबसे बड़े विपक्षी दल समाजवादी पार्टी और उसके मुखिया अखिलेश यादव के माथे पर भी कुछ शिकन तो बढ़ा ही दी है।

जब प्रियंका बाराबंकी से प्रतिज्ञा यात्रा रवाना कर रही थीं, उसी वक्त आई आजमगढ़ के राम शोभित की टिप्पणी सूबे के बदलते सियासी आकाश का पूरा सच भले न हो लेकिन बड़ा सच तो है ही। शोभित उन कुछ लोगों में से हैं जो दिल से भाजपा के साथ भले हों लेकिन दिमाग खुला रखते हैं और बात मन की करते हैं। शोभित बाराबंकी की सभा को सम्बोधित कर निकली प्रियंका गांधी के टीवी पर दिखे उस भाव को लेकर हैरान दिखे जब भीड़ में रुककर वह कुछ लड़कियों से मुखातिब हो पूछती हैं, “मेरा नारा जानती हो!” और लड़कियां जवाब देती हैं- “हां, जानते हैं- मैं लड़की हूं, लड़ सकती हूं।” प्रियंका उनके जवाब पर हैरान हैं, तो शोभित की हैरानी भी समझ में आने वाली है। यह हैरानी अब पूरी भाजपा और शेष विपक्ष की भी हो चुकी है जो इसे तेजी से बदलते नैरेटिव के रूप में देख रहा है। यह नैरेटिव चुनाव में महिलाओं को 40 फीसदी हिस्सेदारी, इंटर पास को स्मार्टफोन और ग्रेजुएट लड़कियों को स्कूटी के वादे का उपसंहार-जैसा है।

एक तस्वीर लखनऊ से बाराबंकी के रास्ते में तमरसेरपुर गांव के खेतों में काम कर रही महिलाओं के बीच जाकर बैठी और उनके हाथों से जलेबी खाती प्रियंका की भी है जो उनसे मुस्कुरा कर न सिर्फ बतिया रही हैं बल्कि पराठा खाने के आग्रह पर यह कहकर लंबी उपस्थिति दर्ज करा देती हैं कि ‘भाई ने कहा है कम खाया करो, मोटी हो रही हो।’ ठहाका मारकर हंसी उन महिलाओं की स्मृतियों में टंगी यह तस्वीर कितनी दूर और देर तक उनके साथ रहेगी, अंदाजा लगाया जा सकता है।


यात्रा को रवाना करती प्रियंका गांधी को एकटक निहार रही कुछ महिलाओं के चेहरे पर दिखे भाव में भी यही नैरेटिव दिखता है, तो पूर्वांचल से आने वाले भाजपा के एक विधायक मित्र की उस बातचीत में भी कि बात अब पहले जैसी नहीं रही। वह कहते हैं- ‘कोई माने न माने, प्रियंका गांधी ने जैसी तेजी और आक्रामकता दिखाई है, अगर यह सब इसी रफ्तार चला तो सूबे की राजनीति में उलटफेर से इनकार नहीं किया जा सकता।’ इस सवाल के जवाब में कि कांग्रेस के आगे बढ़ने का असल नुकसान किसे होगा, बड़ी सफाई से कहते हैं- ‘नुकसान तो भाजपा को सबसे बड़ा होगा लेकिन एक खास वोट बैंक कन्फ्यूज हुआ तो कुछ गड्ड-मड्ड भी हो सकती है और भाजपा इसे लपकने से चूकेगी नहीं।’ वैसे, स्वाभाविक है कि वह भाजपा नेतृत्व की ‘चमत्कार शैली’ के प्रति आश्वस्त भी हैं।

समाज विज्ञान शोधार्थी अखिलेश अनंत इसे प्रियंका गांधी का कोई नया अवतार नहीं मानते। वह कहते हैं कि प्रियंका जिस तेजी से रिएक्ट कर रही हैं, गौर करने की जरूरत है। देखना चाहिए कि वह हाथरस भी सबसे पहले पहुंचती हैं और उम्भा (सोनभद्र) भी। लेकिन शेष विपक्ष या तो इन मुद्दों पर मुखर नहीं होता, घर से नहीं निकलता या घर से निकलते ही घर के बाहर हुई ‘गिरफ्तारी’ से संतुष्ट हो जाता है। पूछने पर कि क्या प्रियंका महिलाओं के प्रति अचानक प्रेम दिखाकर उन्हें अपने साथ लाने की जुगत में हैं? अनंत कहते हैं, ‘तो इसमें गलत क्या है! वैसे यह अचानक भी नहीं है कि प्रियंका महिलाओं के साथ खड़ी दिखी हैं। वह हर उस मामले पर मुखर रही हैं जहां सत्ता का महिला विरोधी चरित्र सामने आया है।’

हालांकि इस सवाल के जवाब में कि इस तरह कांग्रेस के आगे बढ़ने का लाभ तो आखिर वोट के बंटवारे के रास्ते भाजपा के ही काम आएगा, दिनेश तिवारी कहते हैं कि ‘राजनीति में सब अपना नफा- नुकसान देखते हैं। अगर नेतृत्व ने यूपी में लगभग खत्म हो चुकी कांग्रेस को सक्रिय करने के लिए अपना सबसे कीमती मोहरा दांव पर लगाया है तो उसने भी तो कुछ सोचा ही होगा। अब क्या वह अपनी चाल सिर्फ इसलिए धीमी कर ले कि भाजपा को हराने के लिए उसे व्यापक और खुले नजरिये से सोचना चाहिए।’ उनका मानना है कि कांग्रेस इस बार अपना वोट प्रतिशत ठीक से बढ़ा ले गई तो सीटों में बहुत बड़ा इजाफा हो न हो, अपनी जमीन तो मजबूत कर ही लेगी। उनकी समझ में प्रियंका की नजर भी 2022 में हासिल होने वाली जमीन से 2024 की फसल काटने पर है जो कांग्रेस में आए बड़े बदलाव का प्रतीक है।

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