'भारत छोड़ो': आंदोलन, जिसने देश को आजादी की आहट दी

इस आंदोलन की खास बात ये थी इसका नाम भारत छोड़ो नाम यूसुफ मेहर अली ने सुझाया था, जो देखते ही देखते जनमानस में गहरे तक बैठ गया था। वहीं वीरांगना अरुणा आसफ अली ने अपने अतुलनीय साहस से इस आंदोलन को क्रांति में बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ा।

'भारत छोड़ो': आंदोलन, जिसने देश को आजादी की आहट दी
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जब आप ये पंक्तियां पढ़ रहे हैं, बार बार के 'नीट' पेपर लीक के विरुद्ध नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुआ छात्रों का लम्बा आंदोलन देशवासियों की चेतना पर छाया हुआ है। इस आंदोलन के तहत गत 20 जुलाई को निकाले गये संसद मार्च के दौरान बर्बर पुलिस बल प्रयोग से भड़के आक्रोश से डरी नरेन्द्र मोदी सरकार ने मोटे तौर पर छात्रों की सारी मांगें मानकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से तुरत-फुरत इस्तीफा दिलाया और साथ ही पेपर लीक के कारण आत्महत्या कर लेने वाले छात्रों के माता-पिता को कानून के मुताबिक मुआवजा देने और आंदोलन के सिलसिले में छात्रों पर दर्ज सारे मुकदमे वापस ले लेने का वादा किया।

जेन-जी आंदोलन ने मोदी सरकार का गुमान तोड़ा

अब आंदोलन के खात्मे के बाद कुछ हल्कों में वादाखिलाफी के अंदेशे जताये जाने के बावजूद कहा जा रहा है कि जेन जी ने अंततः अपनी शक्ति से नरेन्द्र मोदी सरकार का वह गुमान तोड़ डाला, जिसके कारण वह इस गलतफहमी की शिकार थी कि अपनी विभाजनकारी कार्रवाइयों के दम पर वह अपने खिलाफ किसी भी प्रतिरोध की अनसुनी करके भी निष्कंटक राज करती रहेगी।

इस आंदोलनकारी समय में, स्वाभाविक ही याद आता है कि आजादी की लड़ाई के दौरान अब से 84 साल पहले इन्हीं दिनों, जब दूसरा विश्व युद्ध छिड़ा हुआ था, 8 अगस्त, 1942 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने बंबई (अब मुंबई) के ग्वालिया टैंक मैदान से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की अगुवाई में उनके दिये ‘करो या मरो’ के नारे के साथ 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' आंदोलन शुरू किया, तो देशवासियों को अपनी छाती पर सवार ब्रिटिश सत्ता के हाथों बेहद निर्मम और क्रूर दमन चक्र झेलना पड़ा था। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी थी और अपना हौसला बनाए रखा था।

आंदोलन ने आजादी की आहट महसूस कराई

कोई एक लाख देशवासियों ने जेलों की यातनाएं सहकर इस दमन चक्र की कीमत चुकाई थी तो सैकड़ों ने अपने प्राणों की आहुति देकर। दमन का यह सिलसिला इस कारण कुछ ज्यादा ही क्रूर हो उठा था कि आंदोलन के दौरान देशवासियों के तेवरों से ब्रिटिश हुक्मरानों को अपने अंजाम का अहसास हो चला था। दूसरे शब्दों में कहें तो उनको लगने लगा था कि अब इस देश में उसके दिन ज्यादा नहीं रह गए हैं और प्रायः हर देशवासी को आलोड़ित कर देने वाला यह आंदोलन भारतीयों के आजादी की मंजिल तक पहुंचने में सबसे निर्णायक सिद्ध होने वाला है। 

अनंतर, इस आंदोलन ने देशवासियों को आजादी की आहट महसूस करा दी थी। वह भी तब, जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों शक्तियों ने अलग-अलग कारणों से खुद को इस आंदोलन से किनारे कर रखा था। मोहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग और विनायक दामोदर सावरकर की हिंदू महासभा ने भी इस आंदोलन का साथ देना गवारा नहीं ही किया था। हिंदू महासभा के एक और नेता श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने तो बंगाल के अंग्रेज गवर्नर जॉन हरबर्ट को इस आंदोलन को कठोरता से दबाने के लिए पत्र तक लिख डाला था।

आंदोलन का ऐलान होते ही गोरे सत्ताधीशों ने कांग्रेस और उसकी चार प्रांतीय कमेटियों को क्रिमिनल लॉ एमेडमेंड ऐक्ट, 1908 के तहत गैरकानूनी घोषित कर दिया और डिफेंस ऑफ इंडिया रूल 56 के तहत सभाओं और प्रदर्शनों आदि पर प्रतिबंध लगा दिया था। इतना ही नहीं, उन्होंने महात्मा गांधी समेत प्रायः सारे बड़े कांग्रेसी नेताओं को गिरफ्तार कर जेलों में ठूस दिया था, जिसके चलते अनेक जगहों पर आंदोलन की कमान समाजवादियों के हाथ आ गई थी।


यूसुफ मेहर अली ने दिया नारा

दूसरी ओर, अनेक अन्य जनप्रवाहों ने भी स्वेच्छया, अपनी तरह से, यानी महात्मा के ‘करो या मरो’ के नारे की अपनी अलग व्याख्या के तहत, खुद को आंदोलन में झोंक दिया था। इसके चलते कुछ प्रेक्षक यह भी कहने लगे थे कि आंदोलन कांग्रेस के हाथ से निकल गया है। कहते भी क्यों नहीं, कांग्रेसियों में भी ‘करो या मरो’ को लेकर अलग-अलग धारणाएं और विचार थे। इसकी एक मिसाल यह है कि इलाहाबाद में लंबी अवधि तक पुलिस को छकाते रहे लालबहादुर शास्त्री ने ‘करो या मरो’ के नारे को ‘मरो नहीं, मारो’ में बदल डाला था।

लेकिन आंदोलन के बीच अगर कोई सबसे ज्यादा खुश था तो वे थे यूसुफ मेहर अली। यूसुफ मेहर अली यानी उस वक्त बॉम्बे (अब मुंबई) के सबसे कम उम्र के नवनिर्वाचित मेयर। इस आंदोलन के ही साल, यानी 1942 में, जब वे जेल में थे, कांग्रेस ने उनको इस पद के चुनाव के लिए अपना प्रत्याशी नामित किया था।

तब इस नामांकन का समर्थन करते हुए सरदार वल्लभभाई पटेल ने कहा था कि यूसुफ मेहर अली के लिए व्यक्तिगत संतुष्टि का मतलब साथी देशवासियों की भलाई सुनिश्चित करना है। चुनाव जीतने के बाद यूसुफ ने भी वल्लभभाई को गलत सिद्ध नहीं होने दिया था और प्रभावी नागरिक सेवा सुनिश्चित करके बेहद लोकप्रिय हो गए थे।

'अगस्त क्रांति' भी कहा जाता है

लेकिन उनके लिए 'भारत छोड़ो आंदोलन' की सफलता से खुश होने का इसके अतिरिक्त भी एक कारण था। यह कि इस आंदोलन का भारत छोड़ो नाम उन्होंने ही सुझाया था, जो देखते ही देखते खासा चल निकला था।

जानकारों के अनुसार, महात्मा गांधी ने बंबई में अपने सहयोगियों से स्वतंत्रता के इस निर्णायक आंदोलन के लिए सबसे अच्छा नारा सुझाने को कहा तो सबसे पहले किसी ने ‘गेट आउट’ सुझाया, लेकिन महात्मा को लगा कि यह शिष्ट नहीं है। तब चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने ‘रिट्रीट’ और ‘विदड्रा’ नाम सुझाए, लेकिन महात्मा को वे भी नहीं जमे। तब यूसुफ मेहर अली ने महात्मा को एक धनुष भेंट किया, जिस पर ‘क्विट इंडिया’ गुदा हुआ था। इस पर महात्मा ने कहा, 'आमीन' यानी ऐसा ही हो और यही ‘क्विट इंडिया’ आंदोलन का नाम हो गया, क्विट इंडिया यानी भारत छोड़ो।

चूंकि यह आंदोलन अगस्त महीने में शुरू हुआ, इसलिए बाद में अनेक लोग इसको 'अगस्त क्रांति' भी कहने लगे। आंदोलन नहीं, क्रांति। इससे समझा जा सकता है कि यह आंदोलन अपनी प्रकृति में क्रांति के कितने नजदीक जा पहुंचा था।


यूसुफ मेहर अली कई बार जेल गए

यूसुफ मेहर अली के निकट यह नामकरण इस मायने में दुगुनी खुशी देने वाला था कि इससे पहले 1927 में साइमन कमीशन के बहिष्कार के कांग्रेस के आंदोलन को ‘साइमन कमीशन गो बैक’ (साइमन कमीशन वापस जाओ) का नारा भी उन्होंने ही दिया था। इसी आंदोलन के दौरान 30 अक्टूबर, 1928 को लाहौर में हुए बर्बर पुलिस लाठीचार्ज के दौरान घायल लाला लाजपत राय बाद में शहीद हो गए, तो देश में गुस्से की लहर दौड़ गई थी। यूसुफ मेहर अली को इसके बाद ही पहली बार जेल में डाला गया, जो उनके जेल जाने के सिलसिले की शुरुआत सिद्ध हुआ।अनंतर दांडी मार्च में उनके योगदान से ब्रिटिश सरकार इतनी चिढ़ी कि उनको वकालत करने तक से रोक दिया।

लेकिन अफसोस कि आजादी के बाद यूसुफ मेहर अली की सेवाओं को एकदम से भुला दिया गया। हालांकि, उन्होंने तब भी सामाजिक और राजनीतिक उद्देश्यों के लिए काम करना जारी रखा था और उनकी देशसेवाएं न महत्वहीन थीं, न ही विस्मृति की पात्र।

कारण यह कि वे सिर्फ नारों के लेखक नहीं, समाजवादी विचारधारा से ओतप्रोत स्वतंत्रता सेनानी भी थे। उन्होंने कई किसान और मजदूर आंदोलनों में भागीदारी भी की थी और उनका नेतृत्व भी। वे नेशनल मिलीशिया और बॉम्बे यूथ लीग के संस्थापक तो थे ही, 1934 में जयप्रकाश नारायण और मीनू मसानी आदि के साथ कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी।

गौरतलब है कि 23 सितंबर, 1903 को बॉम्बे में पैदा हुए यूसुफ एक संपन्न पारिवारिक पृष्ठभूमि से आते थे और उन्होंने कलकत्ता और मुंबई से शिक्षा प्राप्त की थी। वे महात्मा गांधी के अहिंसक प्रतिरोध और सामाजिक समानता के दर्शन से बहुत प्रभावित थे। विडंबना यह कि जीवन भर किसानों और मजदूरों के लिए इंसाफ की हिमायत करने वाले यूसुफ के साथ उम्र ने बड़ी नाइंसाफी की और 31 मई, 1950 को उनके 47वें वर्ष में ही उनको हमसे छीन लिया।

'भारत छोड़ो आंदोलन की रानी'

बहरहाल, जहां यूसुफ ने इस आंदोलन का नामकरण किया, वहीं 'ग्रैंड ओल्ड लेडी’ कहलाने वाली वीरांगना अरुणा आसफ अली ने अपने अतुलनीय साहस के प्रदर्शन से उसकी शौर्यगाथा को सुनहरी करने में कुछ भी उठा नहीं रखा। 

बाद में उनको 'भारत छोड़ो आंदोलन की रानी' करार देकर खास तौर पर उनके उस अदम्य साहस के लिए याद किया जाने लगा, जो उन्होंने नौ अगस्त, 1942 को बॉम्बे के ऐतिहासिक ग्वालिया टैंक (अगस्त क्रांति) मैदान में प्रदर्शित किया था। फिर तो इस आंदोलन की कोई चर्चा तब तक पूरी हुई नहीं मानी जाती थी, जब तक अरुणा को उसमें न शामिल किया जाए।


अरुणा आसफ अली ने फहराया झंडा

जैसा कि पहले बता आए हैं, एक दिन पहले आठ अगस्त को इसी मैदान से आंदोलन के ऐलान के फौरन बाद ब्रिटिश सरकार सारे बड़े कांग्रेस नेताओं को गिरफ्तार कर भीषण दमन पर उतर आई थी। उसने सोचा था कि अब कांग्रेस को ग्वालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराने वाला भी कोई नहीं मिलेगा, लेकिन साहस की पुतली अरुणा ने न सिर्फ वहां कांग्रेस कार्यकर्ताओं को नेतृत्व प्रदान किया, बल्कि पुलिस को चकमा देकर मैदान में तिरंगा भी फहरा दिया।

लेकिन यह तो सिर्फ शुरुआत थी। स्वतंत्रता आंदोलन में अरुणा की भूमिगत सक्रियताओं से क्रुद्ध अंग्रेजों द्वारा उनकी सारी संपत्ति जब्त कर लिए जाने के बावजूद उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया, न ही कभी पुलिस की पकड़ में आईं। आजादी के ऐलान तक वे निर्भयता से देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग भूमिकाओं में अलख जगाती रहीं।

अरूणा को भी कई बार जेल भेजा गया

गौरतलब है कि 1928 में उन्होंने तत्कालीन सामाजिक रूढ़ियों को धता बताकर अपनी पसंद से उस वक्त के प्रसिद्ध वकील और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आसफ अली से प्रेम  विवाह कर लिया था, जिसे उस दौर में सेल्फ-अरेंज्ड मैरिज भी कहा जाता था। यह एक अंतरधार्मिक (हिंदू-मुस्लिम) विवाह था, जिसमें अरुणा एक रूढ़िवादी बंगाली ब्राह्मण परिवार से थीं, जबकि आसफ अली मुस्लिम थे। इस वजह से अरुणा के परिवार ने इस विवाह का कड़ा विरोध किया था, लेकिन अरुणा ने झुकने से इन्कार कर दिया था।

इस विवाह के दो ही साल बाद 1930 में अरुणा को जेल यात्रा करनी पड़ी थी। 1932 और 1941 के व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान भी वे जेल गई थीं। उन्होंने डॉ. राममनोहर लोहिया के साथ कांग्रेस की मासिक पत्रिका ‘इंकलाब’ का संपादन और ऊषा मेहता के साथ गुप्त रेडियो स्टेशन से प्रसारण भी किया था।

29 जुलाई, 1996 को 87 साल की अवस्था में संसार को अलविदा कहते वक्त तक उनकी झोली में अंतरराष्ट्रीय लेनिन पुरस्कार, ऑर्डर ऑफ लेनिन, जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार और पद्मविभूषण आदि सम्मान थे। मरणोपरांत उन्हें देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ भी दिया गया। लेकिन अब यूसुफ मेहर अली की ही तरह उनको भी विस्मृति के गर्त में धकेल दिया गया है।