राजीव गांधीः एक दूरदृष्टि वाला नेकदिल प्रधानमंत्री, जिसके जाने से मजबूत भारत का सपना बिखर गया

जब देश में आत्मघाती, अलगाववादी और सांप्रदायिक ताकतें सिर उठा रही थीं तो राजीव गांधी उम्मीद की रोशनी थे। अपने उसूलों के लिए वह कोई भी कुर्बानी देने को तैयार थे और आखिरकार उन्होंने अपनी जान ही कुर्बान कर दी।

फोटोः सोशल मीडिया
फोटोः सोशल मीडिया

जब उनकी हत्या की गई, वह भारत के प्रधानमंत्री नहीं थे। लेकिन उनकी अंत्येष्टि में शरीक होने के लिए दुनियाभर के नेताओं का दिल्ली में जमावड़ा लगा। तत्कालीन राष्ट्रपति आर. वेंकटरमण ने लिखा था: “राजीव गांधी की अंत्येष्टि में आम लोगों से लेकर 63 देशों के नेताओं का शामिल होना इस बात का प्रमाण है कि प्रधानमंत्री के तौर पर पांच साल के अपने छोटे से कार्यकाल में उन्होंने कैसा रुतबा हासिल किया था... राजीव गांधी ने एकजुट आधुनिक भारत का मार्ग प्रशस्त किया।”

राजीव गांधी के मामा और अमेरिका में भारत के पूर्व राजदूत बीके नेहरू ने राजीव गांधी की तुलना जवाहरलाल नेहरू से करते हुए कहा, “उनके पास वही सुंदरता, आकर्षण, शिष्टता, विचारशीलता और शालीनता थी जो जवाहरलाल नेहरू की विशिष्ट पहचान थीं और जिन्होंने नेहरू को पूरे देश का प्रिय बना दिया था।” बीके नेहरू लिखते हैं, “इसके साथ ही उनकी प्रवृत्ति, देश के प्रति निष्ठा, निस्वार्थता और समर्पण सब कुछ एकदम अपने नाना की तरह ही था।”

प्रधानमंत्री (1984-89) के रूप में राजीव गांधी की कई उपलब्धियां थीं- जिन्होंने देश की एकता और अखंडता को मजबूत किया, देश की सीमाओं को सुरक्षित किया, लाखों लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाया और विदेशों में मजबूत, धर्मनिरपेक्ष, सहिष्णु और दयालु देश के तौर पर भारत की छवि को और पुख्ता किया। दुर्भाग्य से, आज वह सब बिखर चुका है। कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में राजीव गांधी के उत्तराधिकारी और फिर कुछ ही समय बाद देश के प्रधानमंत्री बनने वाले पीवी नरसिंह राव राजीव गांधी को अद्भुत संभावनाओं वाला दूरदर्शी नेता मानते थे।

पीवी नरसिंह राव ने कहा था: “जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं, तो मुझे लगता है कि निष्पक्षता और दूरदर्शिता संभवतः राजीव गांधी के सबसे बड़े गुण थे। उनमें चीजों को निष्पक्ष रूप से देखने की क्षमता थी। समस्याओं के स्वीकार्य समाधान खोजने के रास्ते में उनका अपना अहम् कभी आड़े नहीं आया। उनके लिए भारत हमेशा सबसे पहले था...उन्होंने एक ऐसे भारत की कल्पना की थी जो विश्व शांति के आंदोलन का अगुवा था और भविष्य में तकनीकी प्रगति के शिखर की ओर बढ़ेगा।”


प्रौद्योगिकी मिशन: चार-चार प्रधानमंत्रियों के कैबिनेट में रह चुके सी. सुब्रमण्यम इसके बारे में कहते हैं, “राजीव गांधी ने बहुत जल्दी ही यह महसूस कर लिया था कि भारत बाहरी प्रतिस्पर्धा के लिए अर्थव्यवस्था को खोलने के साथ ही जब तक विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर जोर नहीं देता, प्रबंधन के आधुनिक तौर-तरीकों को स्वीकार नहीं करता, वह कभी भी विश्वास के साथ भविष्य को सुरक्षित नहीं कर सकता। विकास की रफ्तार को तेज करने और आम लोगों के फायदे के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी का उपयोग करके अधिकतम परिणाम पाने के उद्शदे्यों के लिए उन्होंने प्रौद्योगिकी मिशन शुरू किया। वह लोगों के जीवन के सभी क्षेत्रों में व्याप्त पिछड़ेपन को पूरी तरह खत्म करना चाहते थे। वह चाहते थे कि हर देशवासी के जीवन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का समावेश हो। वैसे ही, जैसा उनके नाना ने कल्पना की थी।”

स्वतंत्रता सेनानी जमनालाल बजाज के पोते और जाने-माने उद्योगपति राहुल बजाज ने राजीव गांधी के बारे में कहा: “आजादी बाद के भारत के इतिहास में राजीव गांधी को दूसरे महान आधुनिकतावादी के तौर पर याद किया जाएगा। पहले जवाहरलाल नेहरू थे...। मैं इस बात को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हूं कि नई कांग्रेस सरकार ने जुलाई 1991 से उदारीकरण की दिशा में जो कदम उठाए हैं, वे राजीव गांधी की इच्छाओं और उनकी योजनाओं के ही परिणाम रहे। इतना जरूर है कि इस दिशा में किए गए साहसी फैसले और तेज गति से आगे बढ़ने के लिए मौजूदा सरकार को पूरा श्रेय दिया ही जाना चाहिए।”

प्रधानमंत्री राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विकास और गरीबी उन्मूलन में सीधा रिश्ता देखते थे: “गरीबी की खाई, चाहे वह किन्हीं देशों के बीच हो या किसी देश के भीतर, अनिवार्यतः इसकी वजह प्रौद्योगिकीय अंतर ही होता है। हम मानते हैं कि लोगों के दैनिक जीवन में तकनीक के उपयोग को बढ़ाकर ही हम एकसमान आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में सक्षम हो सकेंगे, इसलिए भारत में, प्रौद्योगिकी का मुख्य उद्शदे्य गरीबी उन्मूलन ही है।”

पूर्व सेना प्रमख और बाद में जम्मू -कश्मीर के राज्यपाल रहे जनरल कृष्ण राव के अनुसार, “उन्हें (राजीव गांधी) यह बात अच्छे से पता थी कि जब तक गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी और पिछड़ापन जैसी देश की मूल समस्याओं से प्रभावी ढंग से निपटा नहीं जाएगा, देश में स्थायी शांति या प्रगति नहीं होगी।” अर्थशास्त्री एएम खसरो कहते हैं: “यह नहीं भूलना चाहिए कि राजीव गांधी के शासन के दौरान गरीबी उन्मूलन के लिए आईआरडीपी, एनआरईपी और नेहरू रोजगार योजना जैसे रोजगार उन्मुख कार्यक्रमों पर जोर दिया गया।... इसके अतिरिक्त पंचायतों को नई जिम्मेदारियां और अतिरिक्त संसाधन देने के लिए महत्वपूर्ण बिल तैयार किया गया और संसद में पेश किया गया। पंचायती राज के अलावा, आईटी और कंप्यूटर क्रांति की शुरुआत संभवतः घरेलू क्षेत्र में राजीव गांधी की सबसे उत्कृष्ट और चिरस्थायी उपलब्धियां हैं।”


राजीव गांधी कैबिनेट में मंत्री और बाद में लोकसभा अध्यक्ष रहे शिवराज पाटिल ने 1992 में लिखा: “समग्र विकास प्रक्रिया में देश में एक नए युग की शुरुआत करने और कम्प्यूटरीकरण तथा कंप्यूटर प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत को कई विकसित देशों से भी आगे ले जाने के लिए आज का भारत राजीव गांधी का ऋणी है।” इसके साथ ही शिवराज पाटिल ने यह भी कहा कि “विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के क्षेत्र में भी राजीव गांधी का योगदान उल्लेखनीय था।”

पूर्व विदेश सचिव टीएन कौल भी कुछ इसी तरह की बात करते हैं। वह कहते हैं कि: “विदेश मामलों में राजीव गांधी का योगदान सबसे प्रभावशाली है... रोनाल्ड रीगन, मिखाइल गोर्बाचेव, मार्ग्रेट थैचर, रॉबर्ट मगाबे, फिदेल कास्त्रो सहित एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका के विभिन्न देशों के नेताओं के साथ उनके बेहतरीन व्यक्तिगत संबंध काबिले तारीफ थे...। वह चीन और अमेरिका के साथ रिश्तों को सुधारने और भारत-सोवियत संबंधों को और मजबूत करने में कामयाब रहे...संयुक्त राष्ट्र में राजीव गांधी ने अपने भाषण में यह कहते हए पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण का प्रस्ताव रखा कि अगर दुनिया को आत्मघाती परमाणु विध्वंस से बचाना है तो इसका यही उपाय है...उनका प्रस्ताव व्यावहारिक, यथार्थवादी और आवश्यक था।”

बीजेपी सांसद और बाद में वाजपेयी सरकार में विदेश मंत्री बने जसवंत सिंह के मुताबिक विश्व नेताओं ने राजीव गांधी को बड़ी सहजता के साथ अपनाया क्योंकि “राजीव गांधी को वे तीसरी दुनिया के ऐसे नेता के रूप में देखते थे, जिनसे वे बड़ी आसानी से संवाद कर सकते थे। इसके अलावा दुनिया के नेताओं के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी की स्मृतियां और और विरासत तब ताजा ही थीं।”

इस लेख का समापन राजीव गांधी के कैबिनेट सहयोगी रहे खुर्शीद आलम खान की श्रद्धांजलि के साथ करना उचित होगा, जिन्होंने कहा था: “राजीव आधुनिकता के प्रतीक, लोकतंत्रवादी और दृष्टिकोण में सच्चे धर्मनिरपेक्ष थे...। वह मानते थे कि किसी इंसान की देशभक्ति का उसके मजहब से कोई वास्ता नहीं होता... जब देश में आत्मघाती, अलगाववादी और सांप्रदायिक ताकतें सिर उठा रही थीं तो वह उम्मीद की रोशनी थे। अपने उसूलों के लिए वह कोई भी कुर्बानी देने को तैयार थे और आखिरकार उन्होंने अपनी जान ही कुर्बान कर दी।”

ईश्वर क्या दिन दिखाए, कोई नहीं जानता। पीवी नरसिंह राव सरकार में गृहमंत्री रहे एसबी चव्हाण ने अफसोस भरे शब्दों में सही ही कहा था, “... आखिरकार हम कैसे खुद को सांत्वना दें? हम जिस व्यक्ति के कई जन्मदिन मना रहे होते, आज हम उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं!”

(लेखक पूर्व सैन्य अधिकारी और राजनीतिक विश्लेषक हैं)

नवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ें

प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia