राजीव गांधी की अर्थनीति आज भी उबार सकती है देश को मंदी से

राजीव गांधी के उजले वर्षों में भारत की विकास-दर पहली बार पांच प्रतिशत होने लगी थी। उद्योगों की तरक्की और भी तेजी से हो रही थी। वहां आठ से नौ प्रतिशत का आंकड़ा हम छू रहे थे। ‘टाइम’ और ‘न्यूजवीक’ जैसे अखबारों में भारत के आर्थिक करतब को पहली बार सराहना के साथ देखा जा रहा था

फोटो : Getty Images
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राजेंद्र माथुर

इतिहासकार अक्सर सवाल पूछते हैं कि जो हुआ, क्या होना ही था? क्या वह टाला नहीं जा सकता था या और किसी शक्ल में नहीं हो सकता था? क्या बोल्शेविक क्रांति अनिवार्य थी, और 1917 की कोख से स्तालिन का जन्म आगे-पीछे अनिवार्य था? क्या हिटलर अनिवार्य था? क्या गांधी के रास्ते ही भारत को आजादी मिल सकती थी? इतना बड़ा तो नहीं, लेकिन भारत के लिए एक महत्वपूर्ण सवाल ताजा इतिहास के बारे में भी पूछा जा सकता है- क्या 1978 और 1979 के बीच राजीव गांधी का पतन और कांग्रेस की पराजय अनिवार्य थे? क्या सिर्फ राजीव गांधी की निजी कमजोरियों के कारण कांग्रेस हारी? या देश में सामाजिक-आर्थिक असंतोष का कोई प्रतिज्वार उन दिनों उठ रहा था, जो कांग्रेस को ले बैठा?

ये प्रश्न कुछ अफसोस के साथ पूछना इसलिए जरूरी हैं कि राजीव गांधी के चमकीले वर्षों में (अर्थात 1985-86 में) भारत अपने सनातन दलदल से उभरकर पहली बार आकाश में उड़ता लग रहा था। एक पीढ़ी से हम सुन रहे थे कि चाहे जितने शीर्षासन लगा लीजिए, भारत की विकास-गति तीन प्रतिशत प्रति वर्ष से आगे जा ही नहीं पाती। हरित क्रांति हो गई, भारी कारखाने खुल गए, बैंकों का (अर्थात बचत और कर्जों का) राष्ट्रीयकरण हो गया और कई किस्म के आर्थिक जादू-टोने हमने करके देख लिए, लेकिन तीन प्रतिशत अर्थ-वृद्धि और ढाई प्रतिशत आबादी-वृद्धि के चक्कर से हम निकल ही नहीं पाए। और तब हमने जाति-प्रथा की तरह इस धीमी विकास दर को भी अपनी विशिष्ट पहचान के रूप में स्वीकार कर लिया और कहा कि यह हमारी हिंदू विकास-दर है। अर्थात क्योंकि हममें सुस्ती है, इसलिए हमारी हस्ती है-यदि हम तेज भागते होते तो न जाने कब के खत्म हो जाते।

राजीव गांधी के उजले वर्षों में भारत की विकास-दर पहली बार पांच प्रतिशत होने लगी थी। उद्योगों की तरक्की और भी तेजी से हो रही थी। वहां आठ से नौ प्रतिशत का आंकड़ा हम छू रहे थे। ‘टाइम’ और ‘न्यूजवीक’ जैसे अखबारों में भारत के आर्थिक करतब को पहली बार सराहना के साथ देखा जा रहा था, और लिखा जा रहा था कि यदि दस साल तक भारत के आर्थिक इंजन इसी रफ्तार से धड़कते रहे, तो वह आर्थिक हस्ती बन जाएगा। पहली बार उम्मीद बंधी थी कि पूर्वी एशिया के छोटे-छोटे देश खुशहाली के युग में प्रवेश करेंगे और तब यह दुनिया एक अलग दुनिया होगी।

निश्चय ही यह सब इसलिए नहीं हुआ कि कोई जादू का डंडा अचानक कहीं से आ गया, और राजीव गांधी ने अपने प्रधानमंत्रित्व के दौरान उसे देश पर घुमा दिया। राजीव के उजले दिनों में जो हुआ, उसके पीछे लगभग दस साल की पृष्ठभूमि थी।

इंदिरा गांधी ने 1975 में आपातकाल लगाने के बाद यह महसूस करना शुरू कर दिया था कि समाजवादी वाहवाही के जिस रास्ते का चुनाव उन्होंने 1969 के बाद किया था, उसने देश को 1974-75 के आर्थिक संकट में ला फंसाया है। और 1976 में संजय गांधी की सलाह से उन्होंने देश को उस पटरी पर लाना शुरू कर दिया था, जिसका आग्रह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाएं करती रहती हैं। लेकिन मार्के की बात यह है कि इंदिरा गांधी को हराकर जब जनता पार्टी 1977 में जीती, तो मोरारजी देसाई की सरकार ने भी आर्थिक उदारवाद की नीतियों को आगे ही बढ़ाया। जॉर्ज फर्नांडिस ने कोका कोला को निकाल दिया और फिक्की के बजाय रोजगार-प्रधान छोटे उद्योगों को बढ़ावा देने का नारा लगाया और चरण सिंह ने पैसों का बहाव शहर के बजाय गांवों की ओर मोड़ने वाला बजट पेश किया, लेकिन कुल मिलाकर जनता राज एक स्वस्थ दक्षिणपंथी राज था, जिसे इंदिरा गांधी या जवाहरलाल के समाजवाद की ओर लौटने की कोई इच्छा नहीं थी। यों भी रूस से कुछ विमुख होने वाली सरकार यदि पूंजीवादी खेमे में अपने रिश्ते नहीं बढ़ाती तो वह क्या करती?....

राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो उनके पीछे यह सारी विरासत थी, लेकिन अपने आरंभिक वर्षों में उन्होंने सचमुच विस्मय जनक गति और उत्साह के साथ देश का पूंजीवादी आधुनिकीकरण किया। न तब समाजवादी झिझक थी, न चरण सिंह के किसान-आग्रह थे, न अतीत की और कोई बेड़ियां थीं। तीन चैथाई बहुमत ने उन्हें सहयोग दिया और वे लथपथ मटमैली सड़क और चौराहों को उजाला दे सके। लेकिन कुछ समय के लिए एक रास्ता कौंधा था, तो हमने ही इंतजाम कर दिया कि फिर अंधेरा घुप्प हो जाए।

सवाल यह है कि क्या राजीव गांधी के 1985-86 के आर्थिक प्रयोग का इतनी जल्दी अंत होना अनिवार्य था? क्या उसका अंत एक स्वागत योग्य चीज थी जो मात्र हमें एक नया और बेहतर रास्ता खोजने में मदद दे रही है?... राजीव सरकार की अमीर-परस्त नीतियों के खिलाफ देश के दलित और वंचित लोग उठ खड़े नहीं हुए थे, हालांकि मंडल-विरचित कर्कशताओं के कुहासे में आप कह सकते हैं कि ऐसा ही हुआ था। दरअसल, राजीव के जहाज डूबने के वास्तविक कारण जहाज के मल्लाहों के भयावह झगड़े थे।

शुरुआत कैसे हुई? मार्च, 1987 में ’इंडियन एक्सप्रेस’ के पन्नों में ’फेअरफैक्स’ नामक एजेंसी की कथाएं छपने लगी थीं और सिर्फ दो हफ्तों के अंदर माहौल यह बन गया कि राजीव गांधी एक बेईमान आदमी हैं और उन्हें प्रधानमंत्री बने रहने का अधिकार नहीं है। संसद में प्रतिदिन हंगामे होने लगे और राजीव गांधी ने एक जांच कमीशन बैठा दिया। अतः विश्वनाथ प्रताप सिंह ने पश्चिम जर्मनी से आए संक्षिप्त संदेश का हवाला देते हुए रक्षा मंत्री-पद से इस्तीफा दे दिया।

क्या आप बता सकते हैं कि ’फेअरफैक्स’ नामक एजेंसी ने आज तक ऐसी कौन-सी सच्चाई उजागर की है जिसके कारण भारत के किसी भी नेता या उद्योगपति को हिंद महासागर में या चुल्लू भर पानी में डूब मरना लाजमी हो जाए? समय-समय पर इस एजेंसी का अध्यक्ष डराता रहा कि मैंने मुंह खोला, तो गजब हो जाएगा, लेकिन जाहिर है कि उसके पास न तब कोई सूचना थी, न आज है। और जिस समय विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार छोड़ रहे थे, उस समय तक बोफोर्स कांड का किसी ने नाम भी नहीं सुना था।

... इसलिए हमारी राय है कि वह अनिवार्य नहीं था। यदि भारत का हड़बड़ाया हुआ रूलिंग एलीट अपने-आप में स्थित रहने की कलाएं जानता और हर हवा से उसके पैर न उखड़ते, तो राजीव गांधी का आर्थिक प्रयोग तब तक जारी रह सकता था जब तक कि वह अपने अंतर्विरोधों से ही न मारा जाता। हम जानते हैं कि अंर्विरोध भी आगे-पीछे उभरते ही। लेकिन आठ-दस साल की पूंजीवादी प्रगति के बाद यदि कोई सामाजिक प्रतिज्वार राजीव गांधी और उनकी नीतियों को उखाड़ फेंकता, तो यह एक बहुत स्वस्थ द्वंद्वात्मक स्थिति होती। दक्षिण कोरिया में बरसों की तानाशाही के बाद जब जनता उठी, तो वहां लोकतंत्र आ गया। लेकिन यह लोकतंत्र उस समृद्धि को तो कहीं उठाकर नहीं ले जाएगा जो दक्षिण कोरिया में इन वर्षों में आ गई है। राजीव गांधी की अर्थनीति के दस साल यदि भारत को लाखों आर्थिक इंजनों वाला एकउद्यमशील देश बना देते, तो उन्हें उखाड़ने वाली जनता-लहर इन आर्थिक इंजनों को बंद थोड़े ही करती! वह उनका उपयोग करते हुए सामाजिक न्याय और वितरण के अपने कार्यक्रम लागू करती। लेकिन आज स्थिति यह है कि बैंक का दिवाला निकल रहा है और लोग जातियों और धर्मों के आधार पर चेकबुक में आंकड़े भरकर पैसा मांगने के लिए दरवाजे पर खड़े हैं।

... यह भी स्पष्ट है कि किसी भी पार्टी को दिल्ली में ठीकठाक बहुमत मिला, तो अन्य मामलों में वह भले ही चाहे जो नीति अपनाए (आरक्षण, केंद्र-राज्य संबंध आदि) लेकिन जब वह अर्थनीति के बारे में सोचेगी, तो राजीव गांधी की आर्थिक दोपहरी की ओर ही लौटना चाहेगी।

(साभारः सामयिक प्रकाशन द्वारा प्रकाशित और मधुसूदन आनंद द्वारा संपादित' सपनों में बनता देश' के दूसरे खंड में 'असमय डूबे एक जहाज की याद में' का संपादितअंश।

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