राम पुनियानी का लेख: पहचान की राजनीति नष्ट कर रही है धर्मनिरपेक्ष मूल्य, भारत न हिंदू राष्ट्र था, और न कभी होगा

कुछ दशकों पहले राम मंदिर आंदोलन चला और यह कहा जाने लगा कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है। हिन्दू राष्ट्रवादी दावा करने लगे कि भारत का संविधान देश के मूल चरित्र से मेल नहीं खाता और इसलिए उसे बदल कर, हिन्दू राष्ट्र के निर्माण की नींव रखी जानी चाहिए।

फोटो : सोशल मीडिया
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राम पुनियानी

भारत की स्वतंत्रता और तत्पश्चात संविधान के लागू होने से, भारत एक धर्मनिरपेक्ष प्रजातान्त्रिक गणराज्य बन गया। भारत से अलग हुए पाकिस्तान के निर्माता मोहम्मद अली जिन्ना ने, पाकिस्तान की संविधान सभा को संबोधित करते हुए यह घोषणा की कि पाकिस्तान एक धर्मनिरपेक्ष राज्य होगा। लेकिन, जिन्ना की मृत्यु के बाद, पाकिस्तान की नीतियों का आधार वही बन गया जो उसके निर्माण का आधार था - अर्थात धर्म - और आगे चलकर उसे इस्लामिक गणराज्य घोषित कर दिया गया।

इस्लाम के नाम पर बना पाकिस्तान, भाषा और भूगोल के चलते बांग्लादेश और पाकिस्तान में बंट गया। भारत धर्मनिरपेक्षता की नीतियों पर चलने का प्रयास करता रहा। चंद समस्याओं के साथ, भारत ने कुल मिलाकर धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों की रक्षा की। लेकिन इस स्थिति में तब बदलाव आया जब कुछ दशकों पहले राम मंदिर आन्दोलन का उभार हुआ और यह कहा जाने लगा कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है। हिन्दू राष्ट्रवादी यह दावा करने लगे कि भारत का संविधान देश के मूल चरित्र से मेल नहीं खाता और इसलिए उसे बदल कर, हिन्दू राष्ट्र के निर्माण की नींव रखी जानी चाहिए।

भारत का विभाजन और इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान और धर्मनिरपेक्ष भारत का निर्माण एक ऐतिहासिक तथ्य है, जिसे नकारा नहीं जा सकता। हिन्दू राष्ट्रवाद के जयकारों के बीच कई लोग इस ऐतिहासिक घटनाक्रम को उसके सही परिप्रेक्ष्य में देख और समझ नहीं पा रहे हैं।

हाल में, मेघालय उच्च न्यायालय के एक जज न्यायमूर्ति सेन ने, मूल निवासी प्रमाणपत्र से जुड़े एक मामले को निपटाते हुए कहा कि भारत का विभाजन धार्मिक आधार पर किया गया था और पाकिस्तान को मुसलमानों के लिए बनाया गया था और उसी समय, भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित कर दिया जाना था। जब उनके इस कथन की आलोचना हुई तो उन्होंने कहा कि वे धर्मनिरपेक्षता में विश्वास रखते हैं और भारत का आगे जाति या धर्म के नाम पर विभाजन नहीं होना चाहिये।

हाईकोर्ट जज जैसे व्यक्ति द्वारा इस तरह की बात किये जाने को हम कैसे देखें? भारत के स्वाधीनता संग्राम और उसके विभाजन के इतिहास को तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता रहा है। आम लोग विभाजन को जिस रूप में देखते हैं, उससे ऐसा नहीं लगता कि उन्हें उसके असली कारणों का ज्ञान है और वे यह जानते हैं कि लाखों लोगों का एक देश से दूसरे देश में पलायन कितनी त्रासद घटना थी।

भारतीय उपमहाद्वीप आज भी विभाजन के कुप्रभावों से मुक्त नहीं हो सका है। जहां भारत में यह माना जाता है कि मुसलमानों के अलगाववादी रुख के कारण पाकिस्तान बना, वहीं पाकिस्तान में यह मान्यता कि 8वीं सदी में सिंध पर मुहम्मद बिन कासिम का राज स्थापित होने के समय से ही वह एक अलग राष्ट्र हैं और पाकिस्तान का निर्माण इसलिए ज़रूरी था ताकि हिन्दुओं के वर्चस्व से मुसलमान मुक्त हो सकें।

लेकिन, यह एक परस्पर विरोधी समझ है जो अत्यंत सतही है और वर्तमान साम्प्रदायिक सोच से प्रभावित है। स्वतंत्रता पूर्व के भारत में अधिकांश हिन्दू और मुसलमान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा प्रतिपादित सांझा राष्ट्रवाद के समर्थक थे। ये वे लोग थे जिन्होंने भारत के औपनिवेशिक विरोधी आंदोलन में भाग लिया।

स्वाधीनता आंदोलन उद्योगपतियों, व्यवसायियों, श्रमिकों और शिक्षित वर्ग के नए उभरते सामाजिक वर्गों की इच्छाओं और महत्वकाक्षाओं को प्रतिबिंबित करता था। ये वर्ग प्रजातांत्रिक समाज के पक्षधर थे। वे कांग्रेस और गांधी से जुड़ गए। स्वाधीनता आंदोलन के दो पहलू थे - पहला था ब्रिटिश राज का विरोध और दूसरा स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों पर आधारित आधुनिक भारत का निर्माण।

इसके साथ ही अस्त होते वर्गों और सामंती तत्वों ने आधुनिक भारत के निर्माण की प्रक्रिया और औपनिवेशिक -विरोधी आंदोलन का विरोध किया। ये वर्ग जन्म आधारित असमानता और जाति व लिंग के पदक्रम में विश्वास रखते थे। समय के साथ ये तत्व भी धार्मिक आधार पर बंट गए।

अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति ने सामंती तत्वों के धर्म के आधार पर विभाजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पहले मुस्लिम श्रेष्टि वर्ग को बढ़ावा दिया गया और उसने मुस्लिम लीग बना ली। इसके बाद हिन्दू श्रेष्टि वर्ग ने स्वयं को पहले पंजाब हिन्दू सभा और बाद में हिन्दू महासभा के रूप में संगठित किया। शुरूआत में केवल राजा और जमींदार इन संस्थाओं के सदस्य थे। बाद में ऊंची जातियों के पढ़े-लिखे वर्ग के कुछ सदस्य भी इनमें शामिल हो गए। समय के साथ मुस्लिम लीग ने मुस्लिम राष्ट्र की बात शुरू कर दी और हिन्दू महासभा ने कहा कि इस देश में दो राष्ट्र हैं - हिन्दू और मुस्लिम - और हिन्दू राष्ट्र सर्वोपरि है। इसी विचारधारा के चलते आरएसएस ने हिन्दू राष्ट्र के निर्माण को अपना लक्ष्य घोषित किया। इन संगठनों ने पहचान की राजनीति शुरू की और ‘दूसरे‘ समुदायों के खिलाफ नफरत फैलाई। इसी से साम्प्रदायिक हिंसा की नींव पड़ी।

अंग्रेज चाहते थे कि दक्षिण एशिया में उनका एक पिट्ठू देश रहे। इसलिए उन्होंने मुसलमानों के लिए पाकिस्तान बनाने में जरा भी देरी नहीं की। यद्यपि मुस्लिम बहुल इलाकों को पाकिस्तान का हिस्सा बनाया गया तथापि भारत में भी बड़ी संख्या में मुसलमान बच गए। न्यायमूर्ति सेन जैसे लोगों को, जो विभ्रम है उसका एक कारण यह भी है कि वे नीतियां जिनके चलते भारत का विभाजन हुआ, अपने आप में गलत थीं।

भारत को एक धर्मनिरपेक्ष, प्रजातांत्रिक राष्ट्र होना चाहिए यह केवल स्वाधीनता आंदोलन के नेताओं का स्वप्न नहीं था बल्कि यह भारतीय समाज के एक बड़े वर्ग की इच्छा का भी प्रतिनिधित्व करता था। आम भारतीयों की इसी इच्छा का सम्मान करते हुए उसे संविधान का अंग बनाया गया।

पिछले कुछ दशकों में इन मूल्यों को बुरी तरह से रौंदा गया है। ये वे मूल्य हैं जिनके प्रति भारत के बहुसंख्यक लोग प्रतिबद्ध थे और हैं। जिस तरह स्वतंत्रता पूर्व के भारत में मुस्लिम लीग अपनी पहचान की राजनीति के जाल में कुछ मुसलमानों को फंसाने में सफल रही थी उसी तरह आज देश में पहचान की राजनीति करने वाले कुछ लोगों को यह विश्वास दिलाने में सफल हो गए हैं कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है। यह सोच जितनी जल्दी खत्म होगी उतनी ही जल्दी हम सब को यह अहसास होगा कि यह देश हम सबका है और हमें अपनी धर्म, जाति और लिंग पर विचार किए बगैर इसके निर्माण में हाथ बंटाना है।

अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया- (लेखक आईआईटी, मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)

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