फागुन में रमजान... रमजान में फागुन!
यह दुर्लभ संयोग खुश होने का मौका है, होली और ईद दोनों गले मिलने के त्योहार हैं।

कोई इसे फागुन में रमजान कहे या रमजान में फागुन, गत दो वर्षों की तरह इस बार भी होली और ईद के बीच कुछ ही दिनों का फासला है। हम जानते हैं कि होली फागुन के महीने के समापन के अवसर पर मनाई जाती है, जबकि ईद रमजान के।
जानकारों के अनुसार, 1961 के बाद 2024 में पहली बार होली रमजान के महीने में मनाई गई, जबकि 2025 में दूसरी बार। स्वाभाविक ही, इन होलियों के बाद ईद भी दूर नहीं ही थी। अब इस साल के बाद ऐसा दुर्लभ संयोग 31 साल बाद 2057 में होगा, जब फागुन और रमजान या होली और ईद दोनों फिर एक दूजे के आस-पास पड़ेंगे।
इन पर्वों के इस दुर्लभ संयोग का उल्लास इस तथ्य के आईने में कई गुना बढ़ जाता है कि इस देश में हजारों सालों से साथ रहते आ रहे होली और ईद मनाने वाले हिन्दू-मुस्लिम समुदायों ने (अपने-अपने बीच के विघ्नसंतोषियों की तमाम कारस्तानियों के बावजूद) वक्त के साथ ऐसी समझदारी विकसित कर ली है, जो न इसे दुर्योग बनने देती है, न दुर्योग बना सकने वाली बदगुमानियों और अंदेशों को हवा देने। इसलिए इसका इतिहास समरसता और सौहार्द का है, न कि आजकल प्रचारित उस ‘अविश्वास’ का, जिसका बड़ा हिस्सा एक बड़े फितूर द्वारा गढ़ा और व्यर्थ के भय के हाथों भूत के रूप में लोगों के मन मस्तिष्क में प्रतिस्थापित किया गया है।
यह इतिहास ऐसा इसलिए है क्योंकि जब वह बना, तब राजनीतिक लाभ के लिए ‘हिन्दू-मुसलमान’ करने, दूसरे समुदाय के लिए जहर-बुझी बातें कहने, हेट स्पीच देने और नापसंद धर्मस्थलों के सामने गाजे-बाजे के साथ हुड़दंग मचाने के नहीं, अपने धर्म की परंपराओं और मान्यताओं के सौजन्य के साथ पालन करने के दिन थे।
उन्हीं दिनों की बिना पर आज हम जानते हैं कि ईद और होली दोनों ही गले मिलने के पर्व हैं और उनके संयोग को लेकर पैदा की जा रही आशंकाएं (जिन्हें कई सरकारें और उनके द्वारा नियंत्रित प्रशासन ‘हर स्थिति से निपटने’ की बड़बोली तैयारियों के अपने दावों से बढ़ा रहे हैं। इस तरह जैसे उनके सामने किसी आपातस्थिति से निपटने की कठिन चुनौती आ खड़ी हुई है) कुछ शातिर दिमागों की ‘बुद्धिमानी’ की संतानें हैं।
क्या कीजिएगा, इन शातिर दिमागों को गले मिलने से ज्यादा गले काटने का मौसम रास आता है। अन्यथा तो होली यह एलान करती आती है कि ‘जो हो गया बिराना उसको भी अपना कर लो’ और सबको अपना बना लेने का इरादा हो तो भला कौन पराया या कि दुश्मनी के लायक रह जाता है?
दूसरी ओर ईद को लेकर शायर कमर बदायूंनी ने क्या खूब शे'र कहा है: ‘ईद का दिन है गले आज तो मिल ले जालिम, रस्म-ए-दुनिया भी है मौका भी है दस्तूर भी है’। इस रस्म-ए-दुनिया, मौके या दस्तूर की बेल को अवध में अपने प्रभुत्व के दौरान उसके नवाबों ने और बुरे दिनों में उनकी वीरांगना बेगम हजरतमहल ने, 1857 में लड़े गए पहले स्वतंत्रता संग्राम की नाज़ुक घड़ी में भी, खूब सींचा। फिर तो ये पर्व धार्मिक और सांस्कृतिक मेल-मिलाप की ऐसी मिसाल बन गए कि कहा जाने लगा कि जिसे होली और ईद पर भी अपना हिन्दू या मुसलमान होना याद रह जाए, वह सच पूछिए तो इन्हें मनाने लायक ही नहीं है। इसकी पात्रता ही नहीं रखता।
तिस पर होली और ईद के संयोग की तो बात अलग ही रहे, नवाब वाजिद अली शाह के वक्त एक साल मातम का पर्व मुहर्रम होली के ही दिन पड़ गया तो दोनों को मनाने वालों ने एक दूजे की भावनाओं के सम्मान की ऐसी मिसाल बनाई, जो आज तक बेमिसाल बनी हुई है।
हुआ यह कि होली मनाने वालों ने मुहर्रम के मातम के मद्देनजर होली न मनाने का फैसला कर डाला तो वाजिद अली शाह ने कहा कि अब दूसरे पक्ष का फर्ज है कि वह भी पहले पक्ष की भावनाओं का उस जैसा ही सम्मान करे। फिर उन्होंने खुद रंग खेलकर होली मनाने की शुरुआत की। न केवल शुरुआत की, बल्कि समूचे सूबे में सबके होली खेलने का फरमान भी जारी किया।
मुगल बादशाहों अकबर, जहांगीर और शाहजहां के वक्त तो होली को ‘ईद-ए-गुलाबी’ का नाम देकर शाही स्तर पर ईद-उल-फितर जैसी ही खुशी के साथ मनाया जाता था। मुगलों के पतन के बाद अंग्रेजों का राज आया तो उनकी ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के बावजूद जब भी फागुन और रमजान या होली और ईद एक साथ या एक दूजे के आस-पास आए, सद्भाव के दुश्मन उकसावों के विपरीत दोनों समुदायों के लोग आपसी सहमति से रंग खेलने, गले मिलने और जुलूस निकालने वगैरह का समय तय करके परस्पर सामंजस्यपूर्वक सौहार्द की परंपरा को आगे बढ़ाते रहे: हरचंद कोशिश करके कि किसी भी हालत में उल्लास के रंग में भंग न पड़े। न रोजेदार संयम व शांति का साथ छोड़ें, न होली मनाने वाले रंगों से बचना चाहने वालों पर जबरदस्ती रंग डालें।
उनकी यह परंपरा तब थी, जब अंग्रेज आमतौर पर उनके पर्वों को बेरंग और बेनूर करने की कोई भी कोशिश उठा नहीं रखते थे।
अलबत्ता, ऐसे कई मौकों पर ब्रिटिश अधिकारी (जो सदाशयी हुए तो उत्साहपूर्वक इन पर्वों में भागीदारी भी करते थे) सार्वजनिक रूप से रंग खेलने की जगहों और जुलूसों के रूट पर पुलिस बल की तैनाती किया करते थे। लेकिन सौहार्द बनाए रखने में बड़ी भूमिका समाज के बड़े-बूढ़ों द्वारा एक दूजे की आस्थाओं और भावनाओं के सम्मान के लिए उठाए जाने वाले विशिष्ट कदम ही निभाया करते थे। दोनों स्तरों पर सौहार्द बनाए रखने में स्थानीय स्तर पर गठित शांति समितियों द्वारा डाली और विकसित की गई साझा सांस्कृतिक परंपराओं की प्रमुख भूमिका होती थी।
शांति समितियां दोनों समुदायों के प्रभावशाली बुजुर्गों और धार्मिक नेताओं को मिलाकर बनतीं, जो किसी भी विवाद की स्थिति में परस्पर सीधे संवाद के जरिये उसको सुलझा लेती थीं। जुमा (शुक्रवार) और होली एक साथ होते, तो नमाज और जुलूस का समय आपस में चर्चा करके तय कर लिए जाते।
अंग्रेजों का राज बीता, देश को स्वतंत्रता मिली और उसके चौदह साल बाद 1961 में होली और ईद फिर आसपास आईं तो भी सामाजिक सौहार्द की परंपरा कुछ और मजबूत हुई थी। तब रमज़ान का महीना 16 फरवरी से शुरू हुआ था और होली 2 मार्च को मनाई गई थी।
इस बीच कितना गहरा सौहार्द रहा था, इस बात से समझा जा सकता है कि तत्कालीन ऐतिहासिक दस्तावेज़ों और अखबारी रिपोर्टों में होली या ईद पर सांप्रदायिक तनाव का एक भी मामला दर्ज नहीं है, जबकि आपसी भाईचारे के अनेक उदाहरण मिलते हैं। यह स्थिति तब थी, जब होली और ईद से पहले तीन से दस फरवरी के बीच एक निजी विवाद को लेकर मध्य प्रदेश के जबलपुर में भीषण सांप्रदायिक दंगा हुआ था।
इस दंगे से व्यथित पं. जवाहरलाल नेहरू ने कड़ा रुख अपनाते हुए न सिर्फ इस एक बल्कि देश की सभी राज्य सरकारों को कानून-व्यवस्था सुनिश्चित करने और सांप्रदायिक संगठनों की गतिविधियों पर नजर रखने के निर्देश दिए थे।
उन्होंने समूचे देश में सांप्रदायिक सद्भाव और धर्मनिरपेक्षता बनाए रखने पर जोर दिया और जबलपुर में दंगे न रोक पाने के लिए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कैलाश नाथ काटजू और उनकी सरकार की तीखी आलोचना की और इस बिना पर ‘बख्श’ देना गवारा नहीं किया कि वह उन्हीं की पार्टी की सरकार है। इसका देशव्यापी असर हुआ।
उन दिनों के विपरीत आज के दौर में मुश्किल यह है कि सद्भाव की प्रतिष्ठा ‘हिन्दू-मुसलमान’ करने वाली सरकारों की प्राथमिकता में ही नहीं रह गई है। वे ऐसे हर संयोग को अपनी साम्प्रदायिक राजनीति के लिए इस्तेमाल करने के फेर में रहती हैं और उनके द्वारा संरक्षित आग भड़काने वाले नेता सच्चे झूठे अंदेशों को हवा देकर परस्पर अविश्वास पैदा करने में लगे रहते हैं।
उत्तर प्रदेश की बात करें तो योगी आदित्यनाथ की सरकार ऐसे नेताओं पर अंकुश लगाने के बजाय उनके कवच के रूप में काम करती है। इसके लिए उसने खास तरह की सत्ता शैली विकसित कर ली है और दावा है कि वह शैली बहुत लोकप्रिय है।
इस शैली को इस तरह समझ सकते हैं कि 2024 और 25 में होली और रमजान का संयोग हुआ तो वह विघ्नसंतोषी हुड़दंगियों को मस्जिदों पर रंग या गुलाल फेंककर विवाद या फसाद कराने से रोकने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के सीधे रास्ते पर चलने के बजाय प्रदेश के कथित रूप से संवेदनशील जिलों की सैकड़ों मस्जिदों को ढकने के रास्ते पर चल पड़ी।
यह मानने के कारण हैं कि इसके पीछे उसकी अमन-चैन कायम रखने की चिंता कम और अपना इकबाल प्रदर्शित करने की मंशा ज्यादा थी। इस मंशा के संकेत उसने 2017 में सत्ता में आते ही देने शुरू कर दिए थे। उसके सत्ता में आने से पहले मस्जिदें केवल शाहजहांपुर में ही ढकी जाती थीं। वह भी होली और ईद या फागुन और रमजान के संयोग के अवसर पर नहीं, ‘लाट साहब’ के जुलूस के मौके पर, जो वहां 1728 से ही निकाला जाता है।
प्रशंसा की जानी चाहिए कि देशवासी अब भी, भेदभाव पर आमादा रहने वाली सरकारों के कलुषित रवैये के बावजूद ‘तू मनाओ ईद अउर हम मनाई होली, न तू हमसे बोला न हम तुहंसे बोली’ के ‘नुस्खे’ पर अमल नहीं करते और परस्पर सद्भाव बनाए रखकर दुर्भावना के पैरोकारों को गलत सिद्ध करने और निराश करने में विश्वास रखते हैं। विश्वास है कि इस बार भी वे ऐसा ही करेंगे।
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