तेजी से बढ़ता तापमान अब 'न्यू नॉर्मल' है, सरकार विकास के नाम पर सब बर्बाद करने पर आमादा
अब चरम तापमान या सामान्य से अधिक तापमान एक “न्यू नॉर्मल” बन गया है, पर सरकारी स्तर पर इससे लोगों को बचाने के कोई भी इंतजाम नहीं किए जाते। इसका सबसे बुरा असर बाहर खुले में काम करने वालों पर या फिर सड़कों पर काम करने वालों पर पड़ता है।

मार्च के पहले सप्ताह में ही गर्मी के तापमान ने नए रिकार्ड बनाना शुरू कर दिया है। मार्च का पहले सप्ताह का तापमान दिल्ली में पिछले 50 वर्षों का रिकार्ड ध्वस्त कर चुका है। मुंबई में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक पहुंच गया। राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और पंजाब में भी मार्च के शुरू से ही तापमान औसत को ध्वस्त करने लगा है। दिल्ली समेत अनेक राज्यों में तो पहले “हीट वेव” की चेतावनी भी जारी की गई है। अब चरम तापमान या सामान्य से अधिक तापमान एक “न्यू नॉर्मल” बन गया है, पर सरकारी स्तर पर इससे लोगों को बचाने के कोई भी इंतजाम नहीं किए जाते। इसका सबसे बुरा असर बाहर खुले में काम करने वालों पर या फिर सड़कों पर काम करने वालों पर पड़ता है।
सरकारी स्तर पर चेतावनी तो जारी की जाती है पर इसके प्रभाव को कम करने के कोई इंतजाम नहीं किए जाते। बीजेपी की सत्ता जहां पर भी है वहां विकास के नाम पर तमाम इंफ्रास्ट्रक्चर का जाल बिछाया जा रहा है। इसे सरकार विकास कहती है, पर इसके नाम पर शहरों में पेड़ों के आवरण को तेजी से नष्ट किया जा रहा है। इससे शहरों का तापमान और भी तेजी से बढ़ता जा रहा है और दूसरी तरफ गरीबों से पेड़ों की छाया भी छीन ली गई है।
बढ़ता तापमान पूंजीवाद की देन है, पर इसका असर गरीब लोगों को भुगतना पड़ता है। अमीर तो बढ़ते तापमान से निपटने के तरीके खोज लेते हैं पर गरीबों के पास संसाधन नहीं हैं। दूसरी तरफ अमीरों के एयरकंडिशनर और इस तरह के दूसरे उपकरण शहरों को पहले से अधिक गरम करने लगे हैं, ऊर्जा की खपत बढ़ाकर वायु प्रदूषण भी बढ़ा रहे हैं। “इन्वायरन्मेटल रिसर्च – हेल्थ” नामक जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार दुनिया की एक-तिहाई आबादी चरम तापमान की मार झेल रही है और इससे उनकी दक्षता और क्षमता प्रभावित हो रही है। अत्यधिक तापमान के कारण बुजुर्ग और बच्चे तो प्रभावित होते ही हैं, युवा भी सामान्य शारीरिक गतिविधि नहीं कर पाते।
इतिहास के किसी भी दौर की अपेक्षा अब पृथ्वी पर तापमान वृद्धि की दर अधिक है। जर्मनी स्थित पॉटसडैम इंस्टिट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च के वैज्ञानिकों के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में मानव के गतिविधियों के कारण तापमान वृद्धि की दर इससे पहले के वर्षों की तुलना में लगभग दुगुनी हो चुकी है। यदि तापमान वृद्धि की यही दर बरकरार रही तो पूर्व-औद्योगिक काल की तुलना में तापमान वृद्धि 1.5 डिग्री की सीमा वर्ष 2030 से पहले ही पार कर जाएगी। तापमान वृद्धि को कम करने से संबंधित दुनिया भर के नेताओं की कथनी और करनी में कितना अंतर है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है– पिछले 10 वर्षों से दुनिया भर के सत्ताधीश वक्तव्यों में इससे निपटने के लिए युद्धस्तर पर काम करने की बातें करते हैं, जबकि जमीनी स्तर पर बिल्कुल उल्टा हो रहा है।
इस अध्ययन के अनुसार वर्ष 1970 से 2015 के बीच तापमान वृद्धि की दर औसतन 0.2 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक रही, पर इसके बाद के 10 वर्षों के भीतर यह दर 0.35 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गई। यदि इस वृद्धि दर को नहीं रोका गया तब पेरिस समझौते के तहत जिस 1.5 डिग्री सेल्सियस के तापमान बढ़ोत्तरी की बात वर्ष 2100 तक के लिए की जा रही थी, इस बढ़ोत्तरी को वर्ष 2030 से पहले ही दुनिया देख लेगी। वैश्विक स्तर पर तापमान के रिकार्ड रखने की शुरुआत 1880 से की गई थी, और अब के तापमान वृद्धि की दर इससे पहले कभी नहीं रही है।
इस अध्ययन में कहा गया है कि पूरी दुनिया पिछले कुछ वर्षों से चरम तापमान और इसके प्रभावों को भुगत रही है। तापमान वृद्धि के मानव की गतिविधियों के अतिरिक्त प्राकृतिक कारण भी रहते हैं। प्राकृतिक कारणों में सौर-चक्र, ज्वालामुखी का सक्रिय होना और अल निनो जैसे वायुमंडलीय कारण प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त कुछ कारण, जैसे वायुमंडल में सल्फर डाइआक्साइड के अत्यधिक उत्सर्जन के कारण पृथ्वी का तापमान घटता है।
पॉटसडैम इंस्टिट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च के वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में दावा किया है कि तापमान वृद्धि के आकलन के लिए प्राकृतिक कारणों से तापमान बढ़ाने वाले कारकों के अनुमानित असर को पूरे आकलन में शामिल नहीं किया गया है और केवल मानव की गतिविधियों द्वारा होने वाले वृद्धि को ही शामिल किया गया है। इस अध्ययन से इतना तो स्पष्ट है कि पेरिस समझौते के बाद भी तापमान को बढ़ाने वाली मनुष्यों की गतिविधियां सघन होती जा रही हैं और बढ़ती जा रही हैं।
तापमान वृद्धि की रोकथाम वैश्विक मंचों पर राष्ट्राध्यक्षों की घोषणाओं तक ही सीमित हैं। इसका नतीजा यह है कि पूर्व-औद्योगिक काल की तुलना में दीर्घकालीन तापमान वृद्धि 1.4 डिग्री सेल्सियस को पार कर चुका है। वर्ल्ड मेटेरियोलोजिकल ऑर्गनाइजेशन के अनुसार पिछले 3 वर्ष सबसे गरम लगातार तीन वर्ष रहे हैं। यूरोपियन यूनियन के कूपरनिकस सर्विस के अनुसार, यदि तापमान वृद्धि को कम करने के लिए शीघ्र कोई कदम नहीं उठाए गए तो वर्ष 2026 में ही तापमान वृद्धि पूर्व-औद्योगिक काल की तुलना में 1.5 डिग्री सेलसियस की सीमा पार कर जाएगी। वर्ष 2025 में एक दूसरे अध्ययन में बताया गया था कि तापमान वृद्धि की दर 0.27 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक को पार कर चुकी है।
वर्ष 2025 में एक अध्ययन में बताया गया था कि दुनिया में घनी आबादी वाले राजधानी शहरों में अत्यधिक तापमान वाले दिनों की संख्या 25 प्रतिशत से अधिक बढ़ चुकी है। इस अध्ययन को नई दिल्ली समेत दुनिया के 43 सघन आबादी वाले राजधानी शहरों में किया गया है। रोम और बीजिंग जैसे शहरों में तो अत्यधिक तापमान वाले दिनों, जब तापमान 35 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहता है, की संख्या दुगुनी से अधिक है, जबकि मनीला मे यह वृद्धि तीन-गुणा है। नई दिल्ली में अत्यधिक तापमान वाले दिनों की संख्या 1994-2003 की तुलना में 2014-2015 के बीच 29 दिन बढ़ चुकी है।
नेचर क्लाइमेट चेंज नामक जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, तापमान वृद्धि की लगातार मार झेलते लोग जल्दी बूढ़े होने लगते हैं। इस अध्ययन को ताइवान में 25000 लोगों पर लगातार 15 वर्षों तक किया गया है। इसके अनुसार, बढ़े तापमान वाले दिनों की संख्या में वृद्धि के बाद 2 वर्षों के भीतर ही वास्तविक उम्र की तुलना में आदमी की जैविक उम्र 33 दिन बढ़ जाती है।
अमेरिका के वैज्ञानिकों ने वर्ष 2023 में बताया था कि तापमान में अत्यधिक वृद्धि से मनुष्य की, विशेष तौर पर बच्चों और किशोरों की, बौद्धिक क्षमता प्रभावित होती है। वैज्ञानिक लगातार तापमान वृद्धि पर अनुसंधान कर इसके प्रभाव बता रहे हैं लेकिन दुनिया पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। तापमान वृद्धि की दर बढ़ती जा रही है और पूरी दुनिया इसके प्रभाव झेल रही है।अमेरिका, रूस और इजरायल जैसे देश केवल दूसरे देशों पर युद्ध कर ही नरसंहार नहीं कर रहे हैं, बल्कि ग्रीनहाउस गैसों का बेतहाशा उत्सर्जन कर और भी बड़ा नरसंहार कर रहे हैं।अंतर बस इतना है कि युद्ध में मृतकों की संख्या की व्यापक चर्चा की जाती है और गर्मी से मरते लोगों को दुनिया तमाशे की तरह देखती है। हमारे देश में भी जिस तरह पूंजीवाद और सत्ता का गठबंधन है, इसमें मानव विकास नहीं बल्कि इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास को ही आगे बढ़ने का पैमाना माना जाता है और ऐसा विकास तापमान और गरीबी दोनों बढ़ाता है।