पढ़िए उत्तर प्रदेश का आंखों देखा सच, पूरी तरह सरकार प्रायोजित है पुलिस की बर्बरता

मैंने पत्र भेजने वाले से बात की तो उसने दहशत भरे स्वर में कहा कि जब लखनऊ में ऐसा हो सकता है तो कश्मीर में तो इसकी आसानी से कल्पना कर सकते हैं। सवाल उठता है कि क्या वाकई नागरिकों और मतदाताओं के साथ ऐसे हालात पैदा होने की गुंजाइश बर्दाश्त की जा सकती है?

फोटोः पीटीआई
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अनिल चमड़िया

हाल ही में मुझे नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ लखनऊ में विरोध-प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा का आंखों देखा हाल किसी ने एक पत्र के जरिये भेजा। मुझे सबसे पहले तो इस बात को लेकर हैरानी हुई कि आखिर उसमें किसी का नाम क्यों नहीं है? तब मेरे दिमाग में लखनऊ के एक वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान की एक अंतर्राष्ट्रीय मीडिया संस्थान के लिए उत्तर प्रदेश के हालात पर लिखी एक सामग्री की कुछ पंक्तियां कौंधने लगी, जिसमें उन्होंने लिखा था कि “अब तक जो कश्मीर में देखा, वह अब उत्तर प्रदेश में हम देख रहे हैं।”

उत्तर प्रदेश की कश्मीर से तुलना कितनी सही है, जहां एक चुनावी जंग में जीत हासिल करने वाली सरकार है? क्या वाकई नागरिकों और मतदाताओं के साथ ऐसे हालात पैदा होने की गुंजाइश बर्दाश्त की जा सकती है ? तब मैंने उस पत्र को लिखने वाले से बातचीत की और उसने दहशत भरे स्वर में लखनऊ के हालात से कश्मीर के हालत को देखने की कोशिश करते हुए कहा, “जब लखनऊ में ऐसा हो सकता है तो कश्मीर में तो इसकी आसानी से कल्पना कर सकते हैं।”

वह लखनऊ में दहशत का बयान इस तरह से कर रहा था जैसे उसने बिना कैमरे के सारे दृश्य अपनी आंखों में कैद कर लिए हों। उसने कहा, “हम सभी बिस्मिल-अशफाक की शहादत दिवस 19 दिसंबर 2019 को नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के खिलाफ अंबेडकर के वास्ते गांधी के रास्ते पर चलते हुए लखनऊ की सड़कों पर निकले। पुलिस अपने डीजीपी, एसएसपी के कहने पर परिवर्तन चौक लखनऊ पर होने वाले विरोध को नहीं होने देने का ऐलान कर रही थी। थानेदारों को भी यह कहा गया था कि उनके क्षेत्रों से लोगों को ना निकलने दें। लेकिन 19 दिसंबर को लखनऊ में जगह-जगह लोग तख्तियां लेकर सीएए और एनआरसी के खिलाफ अपना विरोध दर्ज करा रहे थे। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रेरणा लेकर शांतिपूर्ण यह प्रदर्शन चलता रहा। लखनऊ में देर शाम महिलाओं-युवाओं को जगह-जगह खड़े होकर तख्तियां लेकर हो रहे शांतिपूर्ण प्रदर्शन में देखा जा सकता है। डीजीपी का ये कहना कि प्रदर्शनकारियों की तरफ से फायरिंग में लोग मारे गए और प्रदर्शनकारी महिलाओं-बच्चों को कवच के रूप में इस्तेमाल कर रहे थे, बेबुनियाद और सरकारी हिंसा को छुपाने की कोशिश है।”

घटनाओं को सिलसिलेवार बताने की कड़ी बीच-बीच में जब टूट जाती तो मैं फिर उसे जोड़ने की कोशिश करता। उसने शहर में चारों तरफ पुलिस के न चाहने के बावजूद प्रदर्शनों की बनती तस्वीरों को फिर से उकेरा और कहा, “लखनऊ कचहरी के अधिवक्ता भी हाईकोर्ट चौराहे से निकलकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे, जिसमें शहर की सिविल सोसायटी भी शामिल थी। ठीक इसी तरह दूसरी तरफ केडी सिंह बाबू स्टेडियम की तरफ से भी लोग थे। पुलिस ने जगह जगह बैरिकेडिंग की हुई थी। सभी वहीं रुककर तख्तियां लेकर नारे लगाते हुए विरोध दर्ज करवा रहे थे। बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल थीं। दोपहर 3 बजे के बाद पुलिस बार-बार हमलावर होने लगी और 3.30 बजे के करीब उसने बेरहमी से लाठीचार्ज कर दिया, जिससे वहां मौजूद महिला साथियों को बमुश्किल निकाल पाना मुमकिन हुआ। पुलिस एक बार फिर लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले छोड़ने लगी, जिससे वहां भगदड़ मच गई और एक दूसरे पर गिरते-पड़ते लोग वहां से निकले। इसके बावजूद भी लोगों ने जगह-जगह तख्तियां लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन बरकरार रखा।”


यहां बता दें कि रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब को 18 दिसंबर की शाम को, जबकि पूर्व आईपीएस अधिकारी एसआर दारापुरी और मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित संदीप पांडेय को प्रदर्शन वाले दिन 19 दिसंबर को हाउस अरेस्ट कर लिया गया था। यह प्रक्रिया अलोकतांत्रिक तो है ही, लेकिन वास्तव में इन्हें कैदी बनाने के पीछे विरोध को नेतृत्वविहीन कर राज्य सरकार द्वारा अराजकता फैलाने की साजिश मानी जानी चाहिए । बार-बार अनुमति और धारा-144 की बात करने वाले शासन-प्रशासन को यह भी याद करना चाहिए कि 25 नवंबर 2018 को फैजाबाद में हिंदुत्ववादी संगठन को कैसे इतना बड़ा आयोजन करने दिया गया। जबकि उसके पहले भड़काऊ सांप्रदायिक भाषण देकर उन लोगों ने अराजकता पैदा करने की खुली कोशिश की।

फिर उस दर्शक ने सवाल पूछा, “सरकार को बताना चाहिए कि अशफाक-बिस्मिल की शहादत पर होने वाले आयोजन से उसको क्या खतरा था? “साझी शहादत-साझी विरासत” को मानने वाले एक साथ सीएए, एनआरसी, एनपीआर आदि विभाजनकारी षडयंत्रों के खिलाफ खड़े थे। उन्होंने एक स्वर में कहा कि धर्म के आधार पर बंटवारा नहीं होगा। मोहल्लों से निकलने वाले रास्तों पर पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं। जिसमें एक युवक के पेट में गोली लगने से मौत और कइयों के गंभीर हालत में होने की खबर हम तक पहुंची।”

आगे उन्होंने कहा, “शाम से ही सदफ जाफर और पवन राव आदि साथियों की कोई खबर नहीं लग पा रही थी। जिससे इनके परिजन परेशान थे। वहीं रात 11:45 बजे एडवोकेट मुहम्मद शुएब, जिन्हें पिछले 2 दिनों से पुलिस ने हाउस अरेस्ट कर रखा था, को सीओ से मिलवाने की बात कह कर पुलिस नजीराबाद थाने ले गई। उनके रिश्तेदार ने बताया कि उस समय वह सो रहे थे। उनकी पत्नी मलका ने बताया कि कैसरबाग, हजरतगंज थाने ले जाने की खबर पुलिस वालों ने दी। रात में ही पूर्व आईपीएस एसआर दारापुरी जी ने बताया कि शुएब को कैंट थाने ले जाकर जेल भेज दिया गया। वहीं संदीप पांडेय को भी ऐसी खबर मिली। फिर दो सिपाही रात 2 बजे के करीब शुऐब के घर आए और दवा मांगते हुए कहा कि वह बहुत अच्छे आदमी हैं और थोड़ी देर पूछताछ करके उन्हें छोड़ देंगे। उनकी पत्नी थोड़ा आश्वस्त हुईं, लेकिन सुबह भी कोई अता-पता नहीं चला। इस बीच सदफ जाफर और पवन राव के बारे में भी अब तक कोई सूचना नहीं मिली।”

आगे उन्होंने बताया, “इसी बीच थाना हजरतगंज में एक एफआईआर का पता लगा तो पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया। संदीप पांडेय ने प्रशासनिक अधिकारियों से बात करने की कोशिश की और मुहम्मद शुएब की पत्नी के साथ एसएसपी से मुलाकात भी की, लेकिन कोशिश विफल रही। इसी बीच सूचना मिली कि पूर्व आईजी एसआर दारापुरी के घर पहुंची पुलिस उन्हें गाजीपुर थाने ले जाने के लिए कहकर साथ ले गई। वहां जाने पर पता चला कि वह वहां नहीं हैं। उनके बेटे से सूचना मिली कि हजरतगंज थाने में दारापुरी जी को रखा गया है और उन्हें जेल भेज रहे हैं। दुख हुआ कि 75 वर्षीय कैंसर मरीज, जिसे हाउस अरेस्ट कर रखा था, अब उनकी गिरफ्तारी की जा रही है।”


थोड़ी खामोशी के बाद फिर उन्होंने कहा, “उसी शाम 20 नवंबर को सूचना मिली कि थाने में बंद लोगों से मिलने गए दीपक कबीर का पता नहीं चल रहा। जिससे उनका पूरा परिवार काफी परेशान है। देर शाम खबर मिली कि रॉबिन वर्मा को पुलिस ने उठा लिया। कुछ लोगों के अनुसार दारुलसफा स्थित चौराहे से उनको उठाया गया और थाने में पुलिस ने बुरी तरह से मारा-पीटा। उनके साथ उठाए गए द हिन्दू के पत्रकार उमर राशिद ने लिखा कि पुलिस ने दोनों को उठाया था। उनके साथ भी काफी बदसलूकी की और थाने में रॉबिन को काफी मारा गया।”

भर्रायी आवाज में उन्होंने जारी रखते हुए कहा, “फिर खबर पहुंची कि वाराणसी में सामाजिक कार्यकर्ता एकता शेखर और रवि शेखर को गिरफ्तार कर लिया गया, जिनकी एक साल की छोटी बच्ची है। कानपुर में बेगुनाहों पर गोलियां चलाई गईं। बिजनौर, वाराणसी से लेकर मेरठ, मुजफ्फरनगर और रामपुर आदि जगहों पर भी पुलिस द्वारा की गई हिंसा में लोग मारे गए। वाराणसी में भी सामाजिक कार्यकर्ताओं के फोटो जारी कर उनको आतंकित करने का प्रयास किया जा रहा है।”

आवाज में थोड़ी सख्ती लाते हुए उन्होंने कहा, “मौजूदा हुकूमत यह गलतफहमी पाल रही है कि कुछ नेताओं-कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी से इस जन आंदोलन को रोके देगी। वहीं बार-बार सरकार आंदोलन को हिंसक और सांप्रदायिक बताने पर तुली है। हम सभी को यह पता है कि अंबेडकर के वास्ते, गांधी के रास्ते हम गैर संवैधानिक नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी व एनपीआर, जो कि मूल रूप से विभाजन करने पर आमादा हैं, का विरोध कर रहे हैं।”

बातचीत खत्म होने से पहले अपील करते हुए उन्होंने कहा, “देश के चिकित्सक साथियों से गुजारिश करेंगे कि वे घायलों की मदद के लिए आगे आएं। पत्रकार और विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ता दोस्तों से अपील है कि घर-घर जाकर नाइंसाफी को सामने लाएं। वकील साथियों से गुजारिश है कि भारी संख्या में हो रहे मुकदमों, गिरफ्तारी को लेकर अवाम को मदद चाहिए। लोगों को कानूनी मदद की सख्त जरूरत है। लखनऊ में थाना हजरतगंज, हसनगंज, ठाकुरगंज, कैसरबाग में दर्ज एफआईआर के सिलसिले में लोगों को उठाकर बुरी तरह से मारा-पीटा जा रहा है। थानों में हो रही इन ज्यादतियों के खिलाफ खड़े हों तो पूरा मुल्क आपके साथ होगा।”

अंत में लोकतंत्र के अस्तित्व का सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट से उत्तर प्रदेश के ताजा हालात पर तत्काल संज्ञान लेने की मांग करते हुए उन्होंने काफी ताकत के साथ कहा, “एक सीएम क्या बदला लेने की बात कर सकते हैं? योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ को लेकर जनता से बदला लेने तक की बात कही। रासुका के तहत कार्रवाई करने की बात कहकर आंदोलन को राष्ट्रविरोधी ठहराने की कोशिश की जा रही है। देशद्रोह की धाराएं लगाई जा रही हैं। सुप्रीम कोर्ट को इस पर तत्काल संज्ञान लेना चाहिए।”

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Published: 28 Dec 2019, 6:59 AM