आकार पटेल: तबलीगी जमात का कथित कोरोना जिहाद बनाम झूठ फैलाने के तंत्र को सक्रिय रखने की मूक मंशा

अगर आज के हालात को समझना है तो अतीत को याद करना जरूरी है कि किस तरह एक घृणित झूठ को फैलाया जाता है और उसका राजनीतिक लाभ उठाया जाता है। कोरोना काल में तबलीगी जमात के खिलाफ फैलाया गया झूठ इसका उदाहरण है कि हम कहां पहुंच चुके हैं।

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आकार पटेल

कभी-कभी वर्तमान को समझने के लिए खुद को अतीत की याद दिलाना जरूरी होता है। चार साल पहले, मार्च 2020 में, मुस्लिम संगठन, तब्लीगी जमात ने 10 से 13 तारीख तक दिल्ली में एक बैठक की थी। इस बैठक की तारीख कोविड-19 की शुरुआत से पहले से तय थी। और इस बैठक का आयोजन ऐसे समय में हुआ था जब मोदी सरकार खुद महामारी के खतरे को खारिज कर रही थी। 13 मार्च 2020 को पीटीआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा कि 'कोविड-19 हेल्थ इमरजेंसी यानी स्वास्थ्य आपातकाल नहीं है, घबराने की जरूरत नहीं।'

तबलीगी जमात की बैठक भारत सरकार द्वारा कोविड गाइडलाइंस जारी किए जाने से पहले हुई थी। लेकिन, मार्च के अंत तक जैसे-जैसे भारत में कोविड केस बढ़ने लगे, भारत सरकार ने एक तरह से ऐलान कर दिया कि इसके लिए मुसलमानों को बलि का बकरा बनाया जाए, और मीडिया को इसमें शामिल कर इसे 'कोरोना जिहाद' का नाम दे दिया गया।

सरकार ने दिखावे के लिए उस क्षेत्र को ख़ाली करने में काफ़ी मेहनत की जहां यह बैठक हो रही थी (मोदी ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल को आयोजकों को 'समझाने' के लिए भेजा, जो खुद ही कई दिनों से वहां से सुरक्षित निकाले जाने की मांग कर रहे थे)। इस दौरान वायरस का नयाप्न और इससे होने वाली पहली मौतें सामने आईं, जो तब्लीगी जमात की इस बैठक के समय से मेल खाती थीं। और, इस पर खुलेआम टीका-टिप्पणी करने की घोषणा कर दी गई।

स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने एक प्रेस कांफ्रेंस में ऐलान किया कि, ‘कोविड केसों में बढ़ोत्तरी का मुख्य कारण यह है कि तबलीगी जमात के लोग देश भर में घूम रहे थे।’ इसी दौरान पहली अप्रैल को बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने एक ट्वीट कर कहा कि तबलीगी जमात का जमावड़ा एक ‘इस्लामी विद्रोह’ था। बीजेपी के नेता कपिल मिश्रा ने तो इसे आतंकवाद का नाम दे दिया।

4अप्रैल को महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के मुखिया राज ठाकरे ने तो सुझाव दे दिया कि तबलीगी जमात के लोगों को गोली मार देनी चाहिए। उन्होंने कहा, ‘दिल्ली के जिस मरकज में तबलीगी जमा हुए थे। ऐसे लोगों को तो गोलियों से उड़ा देना चाहिए। उनका इलाज क्यों किया जा रहा है? एक अलग सेक्शन बनाया जाना चाहिए और उनका इलाज बंद कर देना चाहिए।’ उत्तर प्रदेश में तबलीगी जमात के सदस्यों को जेल में डाल दिया गया और उन पर रासुका (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून-एनएसए) का मुकदमा दायर कर दिया गया।


स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने 5 अप्रैल को कहा, ‘कोविड केसों को दोगुना होने की दर 4.1 दिन है, अगर निजामुद्दीन में तबलीगी जमात की बैठक नहीं हुई होती, तो अधिक केस सामे नहीं आते, और दर 7.14 दिन होती।’ लेकिन जैसा कि बाद की घटनाओं से साबित हुआ कि, यह सब कोरी बकवास थी, पर ये सबकुछ वैसा ही हो रहा था, जैसा रास्ता केंद्र सरकार ने चुन रखा था।

18 अप्रैल को अग्रवाल ने एक और दावा करते हुए कहा कि महामारी फैलाने के लिए तबलीगी जमात अकेला प्रमुख कारण है। इस तरह यह जहरीला झूठ फैलाया गया और इसका असर नागरिकों के बीच बड़े पैमाने पर उसी तेजी से दिखना शुरु हो गया, जिस तेजी से कोविड फैल रहा था।

हिंदी अखबार अमर उजाला ने रिपोर्ट दी कि पश्चिम उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में एक क्वारंटीन सेंटर में रखे गए तबलीगी जमात के लोगो ने मांसाहारी भोजन की मांग की है और वे अस्पताल में खुले में शौच कर रहे हैं। सहारनपुर पुलिस ने ट्वीट कर इसका खंडन किया और कहा कि ऐसा कुछ नहीं हुआ। इसके बाद अखबार ने इस खबर को वापस लिया।

इस सक्रिय उत्पीड़न के महीनों के दौरान, तबलीगी जमात में शामिल विदेशियों सहित समूह के सदस्यों को जेल में डाल दिया गया और उन पर हत्या के प्रयास और धारा 269 के प्रावधानों (जानबूझकर या लापरवाही से ऐसा कोई कार्य करना है जिससे लोगों की जान के लिए खतरनाक किसी बीमारी का संक्रमण फैलने की संभावना हो') का आरोप लगाया गया।

जो धारणाएं प्रचलित की जा रही थीं, वे ये थीं कि ये लोग जानबूझकर पूरे देश में वायरस फैलाने के लिए खुद को संक्रमित कर रहे हैं और फलों पर थूक रहे हैं, मास्क पहनने से इनकार कर रहे हैं, अपने वार्डों में नंगे घूम रहे हैं, नर्सों को परेशान कर रहे हैं...आदि आदि। लेकिन इनमें से कुछ भी सच नहीं था।

पूरी दुनिया ने मुसलमानों के खिलाफ चलाए जा रहे इस दुष्प्रचार का संज्ञान लिया। और इस बाबत खबरें भी छपीं। टाइम मैगजीन ने लिखा, ‘मुसलमानों के लिए भारत में पहले से खतरा था। अब तो कोरोना वायरस भी आ गया है।’ वहीं बीबीसी ने लिखा, ‘कोरोवायरस: भारत की मस्जिद में संक्रमण के बाद इस्लामोफोबिया’... न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा, ‘भारत में कोरोनावायरस से धार्मिक घृणा का दौर।’ बिना किसी सबूत और बिना किसी मामले में दोषी पाए जाने के बावजूद जमात के सदस्यों को भारत में ब्लैक लिस्ट कर दिया गया जिससे उन्हें भविष्य में कभी भारत का वीजा न मिले।


जून के महीने में मोदी सरकार ने वीजा नीति में संशोधन किया और इसमें तबलीग से संबंधित विशेष प्रावधान शामिल किया। इसके मुताबिक कहा गया, 'तबलीगी गतिविधियों में शामिल होने पर प्रतिबंध - किसी भी प्रकार के वीजा प्राप्त विदेशी नागरिकों और ओसीआई कार्डधारकों को तबलीगी कार्यों में शामिल होने की अनुमति नहीं दी जाएगी। धार्मिक स्थलों पर जाने और धार्मिक प्रवचनों में भाग लेने जैसी सामान्य धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने पर कोई प्रतिबंध नहीं होगा। हालांकि, धार्मिक विचारधाराओं का प्रचार करना, धार्मिक स्थानों पर भाषण देना, संबंधित ऑडियो या विजुअल डिस्प्ले/पैम्फलेट का वितरण करना, धार्मिक विचारधाराओं को बढ़ावा देना, धर्मांतरण फैलाना आदि की अनुमति नहीं दी जाएगी।'

ऐसा पहली बार हुआ था किक भारत में किसी विशेष धर्म के लोगों का वीजा नियमों में उल्लेख किया गया था। ऐसा शुद्ध रूप से उस आग को और भड़काने के लिए किया गया जो पहले से ही मीडिया ने लगा रखी थी जिसमें भारत में कोविड संक्रमण के प्रसार के लिए इस समूह को कसूरवार बताया जा रहा था। और, इस सबके बीच सरकार को उसकी जिम्मेदारी से मुक्ति दे दी गई थी, खासतौर से 2020 में लगाए गए बिना सोचे-समझे लगाए गए विनाशकारी लॉकडाउन के लिए।

काफी दिनों बाद जब विश्व स्तर पर इस बात को स्वीकार कर लिया गया कि वायरस का न रोका जा सकने वाला संक्रमण वैश्विक परिघटना है, और विभिन्न माध्यमों से फैल रहा है, तब कहीं जाकर तबलीगी साजिश वाली कहानी फीकी पड़ी। 19 मई को जमात के विदेशी सदस्यों ने संस्थागत या सरकारी क्वारंटीन से मुक्ति के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया, क्योंकि लगातार किए जा रहे टेस्ट में कोविड निगेटिव पाए जाने के बावजूद वे डेढ़ महीने से अधिक समय से क्वारंटीन में बंद थे।

सरकार ने अदालत को बताया कि किसी भी विदेशी यात्री को हिरासत में नहीं रखा गया है, और वे महज जांच में शामिल हैं। लेकिन जमात के 700 से ज्यादा सदस्यों के पासपोर्ट जब्त कर लिए गए थे, और वे किसी भी मानक पर स्वतंत्र नहीं कहे जा सकते थे।


6 जुलाई को, दिल्ली की साकेत कोर्ट में चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने तबलीगी जमात के 44 सदस्यों ने केस बंद किए जाने के एवज 4 से 10 हजार रुपए का जुर्माना देने से इनकार कर दिया, और बहादुरी से कहा कि वे मुकदमे का सामना करने को तैयार हैं। दिसंबर आते-आते करीब 8 महीने बाद 11 राज्यों ने तबलीगी जमात के 2500 से ज्यादा सदस्यों के खिलाफ 20 एफआईआर दर्ज करां दी, लेकिन इनमें से किसी को भी दोषी नहीं पाया गया। अदालत ने सरकारी कार्रवाई की कड़ी निंदा की।

न्यायाधीशों ने मामलों को 'दुर्भावनापूर्ण', 'उत्पीड़न', 'प्रक्रिया का दुरुपयोग', 'सत्ता का दुरुपयोग' आदि बताते हुए कहा कि सरकार ने तबलीगी जमात के सदस्यों 'एक राजनीतिक सरकार के लिए बलि का बकरा' बताया, और कहा कि बिना किसी तथ्य या सबूत के सरकार ने इनके खिलाफ कार्रवाई की।

इस तरह के घृणित झूठ को जानबूझकर फैलाने दिया गया था, इससे हमें यह समझने की जरूरत है कि आज हम कहां पहुंच चुके हैं।

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