खेलों में सट्टेबाजी और जुए का विरोध जरूरी

विधि आयोग ने सरकार से खेल में सट्टेबाजी को कानूनी दायरे में लाने की सिफारिश की है। अगर सरकार विधि आयोग की यह सिफारिश मान लेती है तो आने वाले समय में खेल में सट्टेबाजी कानूनी दायरे में आ जाएगी।

फोटो: सोशल मीडिया 
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भारत डोगरा

विधि आयोग ने हाल ही में केन्द्र सरकार को सौंपी अपनी एक रिपोर्ट में इतनी अजीब सिफारिश कर दी है कि इसके बारे में पता चलने पर अधिकांश देशवासी चिंतित हैं। विधि आयोग ने खेलों में सट्टेबाजी और जुए के प्रवेश की सिफारिश की है। आयोग का मानना है कि चूंकि खेलों, खासकर क्रिकेट में अवैध सट्टेबाजी पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा है, इसलिए खेलों में सट्टेबाजी को वैध कर देना चाहिए और फिर इसका नियमन करना चाहिए।

यह एक बहुत ही चिंताजनक सिफारिश है। किसी अवैध कार्य और अपराध को नियंत्रित न कर सको तो उसे वैध बना दो। यह दलील लोगों के गले नहीं उतर रही है। चोरी-डकैती भी कहीं बढ़ने लगे तो क्या यह कहा जाएगा कि इसे वैध कर इसका नियमन कर दो। फिलहाल राहत की बात तो यह है कि विधि आयोग के ही एक सदस्य ने इस सिफारिश की तीखी आलोचना की है। इसके बावजूद अभी यह संभावना बनी हुई है कि इस सिफारिश को आगे बढ़ाया जाएगा।

केन्द्रीय विधि आयोग ने परोक्ष और अप्रत्यक्ष टैक्स सिस्टम के अंतर्गत जुआ खेलने या सट्टेबाजी करने में मान्यता देकर इसे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को आकर्षित करने का साधन बनाने के सिफारिश की है। आयोग ने कहा है कि संसद इस सट्टेबाजी को वैध बनाने के लिए कानून बना सकती है। इस कानून को या इससे मिलते-जुलते कानून को राज्य भी अपना सकते है।

विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में ‘प्रॉपर जुए’ और ‘छोटे जुए’ में बांटा है। प्रॉपर जुआ धनी लोगों का बड़ी धनराशि का जुआ होगा। छोटा जुआ निम्न आय वर्ग का होगा। इस तरह का वर्गीकरण कर कमजोर वर्ग को भी जुए के निमंत्रण से जोड़ दिया गया है। हालांकि, उसने गरीबी की रेखा के नीचे के लोगों को जुए से दूर रखने के लिए कहा है।

विधि आयोग ने कहा है कि विदेशी मुद्रा और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति और कानून में संशोधन कर जुआघरों और ऑनलाइन गेमिंग उद्योग में विदेशी निवेश को आकर्षित करना चाहिए और इस तरह पर्यटन को भी बढ़ाना चाहिए। आयोग की यह सोच बुनियादी तौर पर अनुचित और अनैतिक है। जहां जुए के सामाजिक रूप से बहुत हानिकारक होने और अक्सर तबाही का कारण बनने के बारे में हमारे समाज की व्यापक समझ रही है, वहां विधि आयोग इस सामाजिक बुराई को प्रगति से जोड़ रहा है।

आयोग के ही एक सदस्य एस शिवकुमार ने आयोग की इस सोच की कड़े शब्दों में आलोचना की है और इसे देश के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक माहौल के विरुद्ध बताया है। उन्होंने कहा है कि भावी पीढ़ी की रक्षा के लिए जुए को देश से दूर रखना चाहिए। उन्होंने कहा है कि जुए को वैध रूप देने के लिए बहुत शक्तिशाली निहित स्वार्थ सक्रिय हैं। उन्होंने कहा है कि यह सिफारिश करते समय आयोग ने अपनी सीमा का उल्लंघन किया है।

उधर विधि आयोग ने जुए के पक्ष में ऊल-जुलूल तर्क दिए है, जो हास्यास्पद है। उसने कहा है कि महाभारत के समय में जुए को वैध कर उसका नियमन किया जाता तो युधिष्ठिर ने अनुचित दांव न लगाया होता। कहा जाता है कि जुए को सबसे पहले वैधता ऑस्ट्रिया की महारानी मारिया थेरेसा ने साल 1761 में दी थी। हमारे विधि आयोग के अध्यक्ष उनसे इतने प्रभावित बताएं जाते हैं कि प्रकाशित समाचारों के अनुसार वे अपने विदेशी दौरे के दौरान विशेष तौर पर ऑस्ट्रिया गए। वहां वे विशेषकर होफबर्ग महल के उन कमरों में गए जहां मारिया पुरुषों के साथ जुआ खेलती थी। प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार इस यात्रा के बाद अध्यक्ष महोदय ने विधि आयोग के सदस्यों से कहा है कि रानी मारिया द्वारा जुए को वैधता देने के उपायों का अध्ययन कीजिए।

सरकार इस सिफारिश को कतई स्वीकार न करे इसके लिए इस सिफारिश का व्यापक स्तर पर विरोध होना चाहिए। जैसा कि विधि आयोग के ही एक सदस्य ने चेतावनी दी है, जुए को वैधता दिलवाने के लिए अति शक्तिशाली निहित स्वार्थ सक्रिय हैं। इसलिए शांतिपूर्ण तौर-तरीकों से किसी भी तरह के जुए को वैधता देने के कुप्रयासों का विरोध होना चाहिए।

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