राम पुनियानी का लेखः धार्मिक अल्पसंख्यक और सांप्रदायिक राष्ट्रवाद; किस ओर जा रहा है भारत?
जहां तक मुसलमानों का सवाल है, सामाजिक विमर्श में उनका दानवीकरण अभूतपूर्व स्तर तक पहुंच चुका है। शुरूआत में इस समुदाय को नफरत और हिंसा का निशाना बनाया जाता था। अब लक्ष्य है उन्हें मताधिकार से वंचित करना। इसकी शुरूआत हुई कुख्यात एनआरसी और सीएए से।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के तीन देशों के दौरे के बाद विश्लेषक इस पर अपनी-अपनी राय जाहिर कर रहे हैं। कुछ ने यह कहते हुए भागवत की सराहना की है कि उन्होंने विविधता को हिन्दुत्व से जोड़कर उसे अधिक उदार बनाया है। क्या हिन्दुत्व किसी भी तरह से इतना उदार हो सकता है कि उसमें हमारे देश की समृद्ध धार्मिक विविधता समाहित हो सके?
किसी भी देश में विविधता का कितना सम्मान है, इसका अंदाजा उस देश में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति से लगाया जा सकता है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि किसी देश में लोकतंत्र की सेहत कैसी है, यह इस आधार पर जाना जा सकता है कि वहां अल्पसंख्यक कितने सुरक्षित हैं। वर्तमान में लोकतंत्र संबंधी सूचकांकों पर भारत की स्थिति लगातार गिरती जा रही है। हमें इसे अल्पसंख्यकों के हालात और वे स्वयं अपनी स्थिति के बारे में क्या सोचते हैं, से जोड़कर देखना चाहिए। हालांकि कुछ मुस्लिम नेता और अन्य मुसलमान, जो बेहतर स्थिति में हैं, यह दावा कर सकते हैं कि भारत में अल्पसंख्यकों की हालत बद से बदतर नहीं हो रही है।
इसका मूल्यांकन करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि पिछले कुछ वर्षों या एक दशक के दौरान सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का आकलन किया जाए। हाल में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) द्वारा इन्हीं मुद्दों पर केन्द्रित एक बैठक दिल्ली में आयोजित की गई थी, जिसमें दिए गए विवरण से हमारे समाज के हालात अच्छी तरह प्रतिबिंबित होते हैं। बीजेपी के 240 लोकसभा सदस्य और 117 राज्यसभा सदस्य हैं। इसके अलावा उसके करीब 1,516 विधायक हैं, यानि केन्द्रीय एवं राज्य स्तरीय विधायिकाओं में उसके कुल 1,873 जनप्रतिनिधि हैं। इनमें से केवल 2 मुसलमान हैं- एक त्रिपुरा में और एक मणिपुर में!
पीयूसीएल द्वारा आयोजित इस बैठक में विभिन्न मानवाधिकार संगठनों के प्रतिनिधियों ने अपने विचार रखे। जहां तक मुसलमानों का सवाल है, सामाजिक विमर्श में उनका दानवीकरण अभूतपूर्व स्तर तक पहुंच चुका है।
दिल्ली में पुलिस द्वारा 4पीएम की दो पत्रकारों (शाहीन और नफीसा) की पिटाई तब और तेज हो गई जब उनके साथ मारपीट कर रहे अधिकारी को यह पता लगा कि ये दोनों महिला पत्रकार मुसलमान हैं। शुरूआत में इस समुदाय को नफरत और हिंसा का निशाना बनाया जाता था। अब लक्ष्य है उन्हें मताधिकार से वंचित करना।
इसकी शुरूआत हुई कुख्यात एनआरसी और सीएए से। चूंकि इसके खिलाफ दिल्ली के शाहीन बाग में हुए मुस्लिम महिलाओं के प्रतिरोध के पूरे देश में फैल जाने का डर था, इसलिए इस प्रक्रिया को रोक दिया गया। इस बीच विशेष सघन पुनःनिरीक्षण (एसआईआर) के माध्यम से मुसलमानों के नाम मतदाता सूचियों से हटाने का नया तरीका खोज निकाला गया और इसे देश पर लाद दिया गया।
एक के बाद एक कई राज्यों में लाखों मतदाताओं के नाम, जिनमें से अधिकतर मुस्लिम या दलित हैं, मतदाता सूचियों से हटाए जा रहे हैं। इसकी सबसे स्पष्ट पुष्टि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के परिणामों से हुई, जहां चुनाव के ठीक पहले 27 लाख से अधिक मतदाताओं को एसआईआर के माध्यम से मताधिकार से वंचित कर दिया गया।
पराकला प्रभाकर, जो एक प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री और राजनैतिक टिप्पणीकार हैं, ने कहा है कि एसआईआर का उद्देश्य सिर्फ मतदाता सूचियों का पुनःनिरीक्षण करना नहीं है बल्कि इससे ‘‘नागरिकों के दो वर्ग बन जाएंगे- पहला वह जो मतदान कर सकेगा, और दूसरा वह जो नहीं कर सकेगा‘‘। जिस दर से मतदाताओं के नाम मतदाता सूचियों से हटाए जा रहे हैं, उससे यह अनुमान है कि प्रक्रिया पूर्ण होने तक लगभग 16 करोड़ लोग अपना मताधिकार खो चुके होंगे। इस तरह एसआईआर एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से समाज के कुछ वर्गों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सेदारी से वंचित कर दिया जाएगा।
जहां सर्वोच्च न्यायालय तक ने मुसलमानों के खिलाफ बुलडोजरों के इस्तेमाल पर पाबंदियां लगाई हैं लेकिन उत्तर प्रदेश सहित कई बीजेपी-शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इसे एक तमगे की तरह इस्तेमाल किया। इसके साथ ही परिसीमन का खतरा भी मंडरा रहा है जिससे बीजेपी के बोलबाले वाले राज्यों के जनप्रतिनिधियों की संख्या में अधिक बढ़ोत्तरी होगी। ऐसी बड़ी-बड़ी चालें आरएसएस की कोख से निकली इस पार्टी द्वारा चली जा रही हैं। एक अन्य मोर्चे पर बीजेपी सरकार ने पूरे वंदे मातरम का गायन अनिवार्य कर दिया है जो संविधान सभा की गीत समिति के फैसले के विपरीत है। यह ऐसी स्थिति पैदा करने का प्रयास है जिसमें हिंदू देवियों की पूजा गैर-हिन्दुओं को भी करनी होगी।
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भारत में धार्मिक स्वतंत्रता बहुत हद तक केवल एक खोखला शब्द भर रह गया है। एक के बाद एक कई राज्यों ने ‘धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम‘ लागू किए हैं, जिनका मुख्य प्रावधान यह है कि हिन्दुओं को धर्म परिवर्तन करने की इजाजत नहीं दी जाएगी और इसके बहाने अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा सकता है। संघ परिवार का एक अन्य कार्यक्रम है ‘घर वापसी‘ जिसके अंतर्गत आदिवासियों, दलितों और मुसलमानों को धर्मपरिवर्तित कर हिन्दू बनाया जाता है। यह कार्य देश के दूरदराज के इलाकों में जोरशोर से जारी है।
धार्मिक स्वतंत्रता की निगरानी करने वालों ने भारत को ‘विशेष चिंता वाले’ राष्ट्रों की श्रेणी में रखा है। यूनाईटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (यूएससीआईआरएफ), जो एक स्वतंत्र संघीय संस्था है, ने भागवत के अमेरिका पहुंचने के कुछ ही दिन पहले एक वक्तव्य जारी कर कहा कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति में गिरावट जारी है, अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और उनके विरूद्ध आम लोगों को उकसाने का काम नियमित तौर पर किया जा रहा है और आरएसएस से जुड़े समूहों की इस हिंसा में भागीदारी है।
स्तंभ लेखिका तवलीन सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा, ‘‘हिन्दुत्व के अधिक साहसी योद्धा चर्चों में बलपूर्वक घुस जाते हैं और वहां हिंसा एवं तोड़फोड़ करके प्रार्थनासभाओं में बाधा डालते हैं। इन ‘कौशलों‘ के वीडियो सोशल मीडिया पर डाले जाते हैं। इनमें से एक में मैंने देखा कि एक बीजेपी नेत्री जबलपुर के एक चर्च में घुसकर आक्रामक लहजे में एक नेत्रहीन से बात कर रही है, और उसे धमकाते हुए उस पर हिन्दुओं का धर्मपरिवर्तन कर उन्हें ईसाई बनाने का प्रयास करने का आरोप लगा रही है। ईसाईयों के धार्मिक उत्सवों में खलल डालने के लगभग 100 प्रयास किए गए हैं और ऐसी लगभग सभी घटनाएं बीजेपी शासित राज्यों में हुई हैं। लेकिन ऐसा करने वाले एक भी व्यक्ति को दंडित नहीं किया गया और एक भी मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक तौर पर हिंसा की इन घटनाओं की निंदा नहीं की।‘‘
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कई अन्य राज्यों की तरह महाराष्ट्र में भी धर्मपरिवर्तन निरोधक कानून लागू किया गया है। यह कानून बलपूर्वक, धोखाधड़ी या लालच देकर धर्मपरिवर्तन करवाने वालों के खिलाफ वैधानिक कार्यवाही का रास्ता साफ करता है। जो भी व्यक्ति धर्मपरिवर्तन करने का इच्छुक है उसे 60 दिन पहले संबंधित अधिकारी को इसकी सूचना देनी होगी। यदि इन नियमों का उल्लंघन होता है, तो चर्च के पदाधिकारियों या अन्य दोषी व्यक्तियों को सात साल की सजा दी जा सकती है।
बीस नागरिक समाज संगठनों, जिनमें ईसाईयों के संगठन भी शामिल थे, ने 24 अगस्त 2026 को मुंबई में एक पत्रकार वार्ता आयोजित की और यह कानून वापिस लिए जाने की मांग की। उन्होंने इसे ‘निजी पसंद में दखलअंदाजी‘‘ और भारतीय नागरिकों को संविधान में दी गई धर्म का पालन करने एवं प्रचार करने की गारंटी पर हमला बताया। इस पृष्ठभूमि में मुंबई क्षेत्र के चर्चों ने फैसला किया है कि वे चर्चों में प्रार्थना सभाओं में भाग लेने के लिए आने वालों से सहमतिपत्र पर हस्ताक्षर करवाना शुरू करेंगे।
प्रार्थना सभाओं पर हमलों के अलावा मानवीय कार्य करने वाले ईसाई स्वयंसेवी संगठनों को एक अन्य समस्या का सामना करना पड़ है- पैसे की किल्लत। नए एफसीआरए नियमों में ऐसे प्रावधान किए गए हैं जिनसे मिशनरियों की परोपकारी गतिविधियां रूक जाएंगीं और उनके द्वारा दी जा रही मानवीय सहायता पर निर्भर गरीब लोग उससे वंचित हो जाएंगे। यह है ‘विविधता‘ को एक आलंकरिक वाक्यांश की तरह इस्तेमाल करने वाले हिन्दुत्व राजनीति के वयोवृद्ध नेता मोहन भागवत के दावों की हकीकत।
(लेख का अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया द्वारा)
