इस्तीफ़ा, स्तुतिगान और राजनीतिक नैतिकता का नया आख्यान
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा एक राजनीतिक घटना है, लेकिन उसके बाद का सामूहिक स्तुतिगान एक राजनीतिक संस्कृति का दस्तावेज़ है। ऐसी संस्कृति का, जहां नैतिकता का अर्थ उत्तरदायित्व नहीं, बल्कि छवि-प्रबंधन बनकर रह गया है

राजनीति में कभी-कभी घटनाएं कम और उनके मंचन अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं। धर्मेंद्र प्रधान के शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफ़े के बाद जो दृश्य सामने आया, वह किसी राजनीतिक जवाबदेही का नहीं, बल्कि एक सुविचारित छवि-प्रबंधन अभियान का दृश्य था। एक ओर लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़े नीट पेपर लीक प्रकरण पर देश का गुस्सा था, दूसरी ओर बीजेपी के शीर्ष नेताओं का तांता धर्मेंद्र प्रधान के आवास पर लगा था। कोई उन्हें दूरदर्शी बता रहा था, कोई ऐतिहासिक सुधारक, कोई नैतिकता का प्रतीक और कोई निस्वार्थ सेवक।
ऐसा लग रहा था मानो किसी असफल मंत्री के इस्तीफ़े पर नहीं, बल्कि किसी विजयी सेनापति के अभिनंदन समारोह में देश शामिल हो।
यहीं से प्रश्न शुरू होते हैं।
यदि धर्मेंद्र प्रधान ने वास्तव में "नैतिक जिम्मेदारी" लेते हुए इस्तीफ़ा दिया है, तो इसका सीधा अर्थ है कि उनके कार्यकाल में ऐसी गंभीर विफलता हुई जिसकी जिम्मेदारी उनसे बचाई नहीं जा सकती। लेकिन यदि वही व्यक्ति कुछ ही घंटों बाद "शिक्षा सुधारों का महानायक", "नई शिक्षा नीति का सफल शिल्पकार" और "नए भारत का दूरदर्शी निर्माता" घोषित कर दिया जाए, तो फिर इस्तीफ़ा किस बात का था? विफलता का, या केवल राजनीतिक दबाव का?
यहीं पूरा विमर्श पाखंड में बदल जाता है।
लोकतंत्र में इस्तीफ़ा एक नैतिक स्वीकृति माना जाता है। यह स्वीकार करना कि व्यवस्था में गंभीर चूक हुई है और उसकी जिम्मेदारी शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति को लेनी चाहिए। लेकिन यहां इस्तीफ़े के साथ-साथ विफलता को स्वीकार करने के बजाय उसकी प्रशंसा का महाकाव्य रचा जाने लगा। जैसे गलती किसी और की थी और महानता केवल इस्तीफ़ा देने वाले की।
विडंबना यह है कि जिन छात्रों ने महीनों तक सड़कों पर संघर्ष किया, उन्हें कभी विपक्ष का मोहरा कहा गया, कभी अराजक तत्व, कभी राजनीति से प्रेरित। दिल्ली से लेकर अनेक शहरों तक छात्रों पर लाठीचार्ज हुआ, आँसू गैस चली, गिरफ्तारियां हुईं, मुकदमे दर्ज हुए। उस समय सत्ता के किसी बड़े चेहरे ने यह नहीं कहा कि "हम युवाओं की भावनाओं का सम्मान करते हैं।"
अब वही वाक्य इस्तीफ़े के बाद सुनाई दे रहे हैं।
यदि युवाओं की भावनाओं का इतना सम्मान था, तो उनकी बात पहले क्यों नहीं सुनी गई? उन्हें सड़कों पर उतरने की नौबत क्यों आई? क्या लोकतंत्र में सरकार की संवेदनशीलता केवल तब जागती है जब राजनीतिक नुकसान दिखाई देने लगे?
राजनीति में यह कोई नई तकनीक नहीं है। पहले संकट को नकारो, फिर विरोध करने वालों को बदनाम करो, उसके बाद जब दबाव असहनीय हो जाए तो एक नियंत्रित बलिदान प्रस्तुत कर दो और अंततः उसी बलिदान को नैतिक आदर्श घोषित कर दो।
इसे जवाबदेही नहीं, नैरेटिव मैनेजमेंट कहते हैं।
सबसे रोचक बात यह है कि धर्मेंद्र प्रधान के समर्थन में दिए गए वक्तव्यों में कहीं भी उन लाखों छात्रों का उल्लेख नहीं है जिनकी मेहनत और मानसिक शांति इस पूरे प्रकरण में दांव पर लगी। किसी ने यह नहीं कहा कि छात्रों से क्षमा मांगी जानी चाहिए। किसी ने यह नहीं कहा कि जिन युवाओं पर मुकदमे दर्ज हुए, उन्हें वापस लिया जाएगा। किसी ने यह नहीं कहा कि जिन अधिकारियों की लापरवाही से यह संकट पैदा हुआ, उनकी जिम्मेदारी तय होगी।
पूरा विमर्श केवल एक व्यक्ति की प्रतिष्ठा बचाने के इर्द-गिर्द घूमता रहा।
यह लोकतंत्र की एक गंभीर बीमारी है। संस्थाएं विफल होती हैं, लेकिन व्यक्तियों की छवि बचाई जाती है। शिक्षा व्यवस्था संकट में होती है, लेकिन राजनीतिक ब्रांडिंग जारी रहती है। परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता टूटती है, लेकिन प्रेस विज्ञप्तियों में "ऐतिहासिक उपलब्धियां" गिनाई जाती हैं।
यदि नई शिक्षा नीति इतनी सफल रही, यदि शिक्षा मंत्रालय ने इतने महान सुधार किए, तो फिर पेपर लीक की घटनाएं लगातार क्यों बढ़ीं? भर्ती परीक्षाओं पर प्रश्नचिह्न क्यों लगे? युवाओं का भरोसा क्यों टूटा? केवल नई नीति की घोषणाएं पर्याप्त नहीं होतीं; किसी भी नीति का मूल्यांकन उसके परिणामों से होता है।
दुखद यह भी है कि भारतीय राजनीति में नैतिकता का अर्थ अब केवल इस्तीफ़ा देकर समाप्त हो गया है। इस्तीफ़ा एक शुरुआत होना चाहिए—जांच की, पारदर्शिता की, जवाबदेही की और सुधार की। लेकिन यहाँ इस्तीफ़ा अंत बन गया। उसके बाद शुरू हुआ गुणगान।
यह गुणगान इसलिए भी असहज करता है क्योंकि यह जनता की स्मृति का अपमान करता है। जनता ने आंदोलन देखा है। छात्रों की पीड़ा देखी है। अभिभावकों की चिंता देखी है। अदालतों में चली बहसें देखी हैं। ऐसे समय में यदि सत्ता यह बताने लगे कि सब कुछ उत्कृष्ट था, केवल परिस्थितियां प्रतिकूल थीं, तो यह सत्य से अधिक प्रचार का दस्तावेज़ प्रतीत होता है।
भारतीय राजनीति में व्यक्तिपूजा का यह नया संस्करण है। जब तक व्यक्ति सत्ता में है, वह अचूक है। यदि पद छोड़ भी दे, तब भी वह महान है। गलती केवल परिस्थितियों की होती है। व्यवस्था कभी दोषी नहीं होती, नेतृत्व कभी उत्तरदायी नहीं होता।
लेकिन लोकतंत्र इसी सोच को अस्वीकार करता है।
लोकतंत्र कहता है कि पद सम्मान नहीं, उत्तरदायित्व है। यदि आपके मंत्रालय में ऐसी घटना हुई जिससे करोड़ों युवाओं का विश्वास डगमगा गया, तो केवल त्यागपत्र नहीं, पूरी सच्चाई भी सामने आनी चाहिए। स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। दोषियों को दंड मिलना चाहिए। परीक्षा प्रणाली का व्यापक पुनर्गठन होना चाहिए। और सबसे बढ़कर, उन छात्रों से क्षमा माँगी जानी चाहिए जिनकी मेहनत को व्यवस्था ने असुरक्षित बना दिया।
सवाल केवल धर्मेंद्र प्रधान का नहीं है। सवाल उस राजनीतिक संस्कृति का है जिसमें हर संकट को जनसंपर्क अभियान में बदल देने की अद्भुत क्षमता विकसित हो चुकी है। जहाँ असफलता को उपलब्धि, विवशता को नैतिकता और दबाव में लिए गए निर्णय को स्वैच्छिक त्याग का नाम दे दिया जाता है।
राजनीतिक दलों का अपने नेताओं के साथ खड़ा होना स्वाभाविक है। लेकिन लोकतंत्र की कसौटी यह नहीं है कि नेता अपने नेता के साथ खड़े हैं या नहीं। कसौटी यह है कि वे जनता के साथ खड़े हैं या नहीं। इस पूरे घटनाक्रम में छात्रों के साथ खड़े होने की भाषा सबसे कम सुनाई दी, जबकि एक नेता के साथ खड़े होने की घोषणाएँ सबसे अधिक सुनाई दीं।
यही इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा विरोधाभास है।
जब इतिहास इस दौर को देखेगा, तो वह शायद यह नहीं लिखेगा कि किस नेता ने किसके घर जाकर समर्थन दिया। वह यह लिखेगा कि करोड़ों युवाओं के विश्वास के संकट के समय सत्ता ने आत्मालोचना चुनी थी या आत्मप्रशंसा। उसने जवाबदेही स्वीकार की थी या केवल उसका अभिनय किया था।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा एक राजनीतिक घटना है; लेकिन उसके बाद का सामूहिक स्तुतिगान एक राजनीतिक संस्कृति का दस्तावेज़ है। ऐसी संस्कृति का, जहाँ नैतिकता का अर्थ उत्तरदायित्व नहीं, बल्कि छवि-प्रबंधन बनकर रह गया है; जहाँ लोकतंत्र का संवाद जनता से नहीं, कैमरों से होता है; और जहाँ हर संकट के अंत में एक नया नारा गढ़ लिया जाता है।
यही कारण है कि यह पूरा प्रसंग केवल एक मंत्री के इस्तीफ़े का नहीं, बल्कि खंड-खंड पाखंड का आख्यान है—जहाँ सच को टुकड़ों में बाँटकर, विफलता पर प्रशस्ति का आवरण चढ़ा दिया जाता है। लेकिन इतिहास की स्मृति प्रचार से अधिक लंबी होती है। वह अंततः यही पूछती है—यदि सब कुछ इतना ही उत्कृष्ट था, तो इस्तीफ़ा क्यों देना पड़ा? और यदि इस्तीफ़ा आवश्यक था, तो फिर यह महिमामंडन किसलिए?
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