रोजगार बाजार में जान फूंकना नहीं आसान
भारत के बेरोजगारी संकट में ऊपर से दिखने वाली दिक्कतों से कहीं ज्यादा गहरे पेच हैं जिसे नीतिगत फैसलों ने और उलझाया है।

मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने बड़ी साफगोई से वह बात कह दी जिसे तमाम माता-पिता, छात्र और नीति-निर्माता सुनना नहीं चाहते: कि सॉफ्टवेयर डिग्री और एमबीए से जुड़ा पुराना आकर्षण अब खत्म हो रहा है। वैश्वीकरण के दौर का फॉर्मूला सीधा और सरल था। इंजीनियरिंग की डिग्री लो, कोडिंग सीखो, अगर संभव हो तो एमबीए करो, और सीधे व्हाइट-कॉलर तरक्की की राह पर बढ़ जाओ। लेकिन यह फॉर्मूला अब भरोसेमंद नहीं रहा।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) सामान्य बौद्धिक कार्यों के अर्थशास्त्र को बदल रहा है। एआई टूल्स की मदद से अब एक अनुभवी कर्मचारी अकेले वह काम कर सकता है जिसके लिए पहले दर्जनों फ्रेशर्स की जरूरत होती थी। इसका पहला असर शायद बड़े पैमाने पर छंटनी के रूप में न दिखे, बल्कि यह शुरुआती प्रवेश द्वारों के चुपचाप बंद होने के रूप में सामने आ सकता है। आईटी कंपनियों द्वारा हाल ही में नियुक्तियों में की गई कटौती इसका सीधा प्रमाण है।
लेकिन उनकी इस चेतावनी को इंजीनियरिंग या प्रबंधन शिक्षा के खात्मे के तौर पर नहीं पढ़ा जाना चाहिए। भारत की इंजीनियरों की जरूरत कम नहीं हुई; हां, अब अलग तरह के इंजीनियर चाहिए। उदाहरण के लिए, सिविल इंजीनियरिंग भारत के भविष्य के केन्द्र में बनी रहेगी। एक ऐसा देश जो अब भी सड़कों, पुलों, बंदरगाहों, रेलवे, जल प्रणालियों, आवासों, लॉजिस्टिक्स पार्कों और जलवायु-अनुकूल शहरों का निर्माण कर रहा है, वह यह नहीं कह सकता कि इंजीनियरिंग खत्म हो गई है। बल्कि, अच्छे इंजीनियरों की मांग और बढ़ेगी।
मूल सवाल यह है कि इंजीनियरिंग किस तरह की हो? कल का सिविल इंजीनियर कंक्रीट और सर्वेक्षण के केवल पुराने फॉर्मूले नहीं सीख सकता। उसे जलवायु जोखिम, जल संकट, शहरी बाढ़, हरित सामग्री, जीआईएस मैपिंग, प्रोजेक्ट फाइनेंस, खरीद और लाइफ साइकिल मेंटेनेंस को समझना होगा। मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरों को रोबोटिक्स, प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग, स्टोरेज, ग्रिड और रिन्यूएबल इंटीग्रेशन को समझना होगा। कंप्यूटर इंजीनियरों को रूटीन कोडिंग से आगे बढ़कर सिस्टम थिंकिंग, डेटा आर्किटेक्चर, साइबर सिक्योरिटी और एआई के एप्लिकेशंस की ओर बढ़ना होगा।
यही बात एमबीए पर भी लागू होती है। भारत की विश्लेषणात्मक और प्रबंधकीय कौशल वाले लोगों की जरूरत घटी नहीं। लेकिन उसे उन जगहों पर लोग चाहिए जहां वे आज शायद ही कभी पाए जाते हैं। हर जिले को ऐसे लोगों की जरूरत है जो डेटा का विश्लेषण कर सकें, निवेश योजनाएं तैयार कर सकें, परियोजनाओं का मूल्यांकन कर सकें, परिणामों की निगरानी कर सकें, खरीद व्यवस्था में सुधार कर सकें, सार्वजनिक संपत्तियों का प्रबंधन कर सकें और विभागों के बीच समन्वय बिठा सकें। अगर भारत जमीनी स्तर की योजना के प्रति गंभीर है, तो जिला केवल एक प्रशासनिक इकाई बनकर नहीं रह सकता। इसे योजना, डेटा और क्रियान्वयन की एक जीवंत इकाई बनना होगा।
क्यों न अर्थशास्त्र, प्रबंधन, सार्वजनिक वित्त, सांख्यिकी, जीआईएस, बुनियादी ढांचा योजना और सामाजिक क्षेत्र की डिलीवरी में प्रशिक्षित युवा पेशेवरों के साथ जिला योजना कार्यालयों को मजबूत किया जाए? कॉरपोरेट नौकरियों के पीछे भागने वाले सामान्य एमबीए तैयार करने के बजाय, हम जिला विकास विश्लेषक, नगरपालिका वित्त सहयोगी, खरीद विशेषज्ञ, स्वास्थ्य प्रणाली प्रबंधक, शिक्षा डेटा अधिकारी और जलवायु अनुकूलन अधिकारी बना सकते हैं। ऐसी टीमें स्थानीय शासन को बदल सकती हैं और सार्थक नौकरियां पैदा कर सकती हैं।
ये ही वे जगहें हैं जहां पाठ्यक्रम सुधार और नौकरियों के नए प्रारूप को एक साथ चलना होगा। कॉलेजों से केवल यह कहना काफी नहीं है कि वे सिलेबस अपडेट करें। श्रम बाजार को भी ऐसी भूमिकाएं बनानी होंगी जो अपडेटेड स्किल्स को पुरस्कृत करें। यदि कॉलेज जलवायु-अनुकूल निर्माण सिखाते हैं लेकिन लोक निर्माण विभाग पुराने मानदंडों पर भर्ती करता है, तो कुछ नहीं बदलेगा। यदि एमबीए छात्र डेटा एनालिटिक्स सीखते हैं लेकिन जिला प्रशासनों में परिणामों की निगरानी या जीआईएस मैपिंग के लिए कोई पद ही नहीं है, तो वह हुनर बेकार चला जाएगा। नौकरी सुधार के बिना शिक्षा सुधार सिर्फ एक और ‘प्रमाणपत्र की फैक्ट्री’ बनकर रह जाता है।
सीईए का यह कहना भी सही है कि भारत को कुशल व्यवसायों को गंभीरता से लेना चाहिए। वेल्डिंग, प्लंबिंग, बढ़ईगीरी, इलेक्ट्रिकल काम, केयरगिविंग, नर्सिंग, हॉस्पिटैलिटी और पाक कला के कामों में मानवीय उपस्थिति, निर्णय, निपुणता और भरोसे की जरूरत होती है। इन्हें एआई द्वारा आसानी से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता। लेकिन यहां भी हमें सावधान रहने की जरूरत है। आप केवल उपदेश देकर सामाजिक नजरिया नहीं बदल सकते। एक मध्यमवर्गीय माता-पिता जिसने अपने बच्चे को इंजीनियर या एमबीए बनाने के लिए दो दशक खर्च किए हैं, वह अचानक वेल्डिंग को एक समान रूप से आकर्षक विकल्प के रूप में स्वीकार नहीं करेगा। भारत में, डिग्री केवल योग्यता नहीं; यह सामाजिक प्रतिष्ठा, विवाह की ‘बाजार कीमत’, जातिगत गतिशीलता, पलायन की संभावना और शारीरिक श्रम की अनिश्चितता के खिलाफ एक बीमा है।
यही वजह है कि जर्मनी, स्विट्जरलैंड, जापान या दक्षिण कोरिया के साथ तुलना बहुत सावधानी से की जानी चाहिए। वहां कुशल व्यवसायों का सम्मान इसलिए है क्योंकि वहां के संस्थानों ने उन्हें सम्मानजनक बनाया है।
भारत के पास ऐसा कोई पारिस्थितिक तंत्र नहीं है। हमारे पास उत्कृष्ट व्यक्तिगत कारीगर तो हैं, लेकिन प्लंबरों, इलेक्ट्रिशियनों, वेल्डर, बढ़ई या मैकेनिकों के लिए कोई मजबूत पेशेवर गिल्ड नहीं हैं। हमारे पास आईटीआई और कौशल योजनाएं तो हैं, लेकिन सामाजिक प्रतिष्ठा कमजोर है। हमारे पास प्रमाणपत्र हैं, लेकिन नियोक्ताओं का भरोसा नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत का कार्यबल अब भी अत्यधिक अनौपचारिक या गैर-पंजीकृत है। ऐसे बाजार में, कोई व्यावसायिक हुनर स्वतः ही सम्मान या आय की सुरक्षा में नहीं बदल जाता। इसका सीधा मतलब कैजुअल लेबर, मनमाना वेतन, कोई लिखित अनुबंध न होना, कोई बीमा न होना, कोई पेंशन न होना और असुरक्षित कामकाजी परिस्थितियां हो सकता है। इसके विपरीत, जर्मन कानून के तहत कंपनी बोर्डों में अनिवार्य श्रम प्रतिनिधित्व की व्यवस्था है।
नोएडा और गुरुग्राम-मानेसर बेल्ट में औद्योगिक श्रमिकों द्वारा हाल ही में किया गया विरोध प्रदर्शन इसका एक बड़ा उदाहरण हैं। ऑटोमोटिव, गारमेंट्स और संबद्ध विनिर्माण के कई श्रमिकों ने कथित तौर पर लगभग 20,000 रुपये या उससे अधिक के बुनियादी मासिक वेतन के लिए विरोध प्रदर्शन किया। ये कोई सॉफ्टवेयर इंजीनियर नहीं थे जो अप्रेजल साइकिल की शिकायत कर रहे थे। ये कारखाने के मजदूर थे जो कह रहे थे कि उनका वेतन जीवित रहने के स्तर से भी कम है। आईटी क्षेत्र एक अपेक्षाकृत औपचारिक, वैश्विक स्तर पर जुड़े श्रम बाजार के रूप में उभरा; जबकि औद्योगिक और व्यापारिक श्रमिक अनौपचारिकता और अनुबंध श्रम के बीच फंसे हैं और उनकी सामूहिक आवाज बहुत कमजोर है।
असली और गहरी समस्या भारत का स्नातक बेरोजगारी संकट है। लाखों युवा स्नातक काम करने, कमाने या अनुभव हासिल करने के बजाय प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। सरकारी नौकरी एक लॉटरी का टिकट बन गई है; कोचिंग क्लास एक वेटिंग रूम बन गई है। यह कोई अतार्किक व्यवहार नहीं है। यह एक ऐसे श्रम बाजार के प्रति युवाओं की बेहद व्यावहारिक प्रतिक्रिया है जहां निजी क्षेत्र की शुरुआती नौकरियां बहुत कम वेतन देती हैं और असुरक्षित हैं, जबकि सरकारी नौकरियां एक सम्मानजनक वेतन, रुतबा, सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करती हैं।
यही तर्क विश्वविद्यालयों पर भी लागू होता है। इंटरनेट, ऑनलाइन कोर्सेज, बूटकैंप, महामारी और अब एआई ट्यूटर्स के कारण विश्वविद्यालय अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। फिर भी उच्च शिक्षा का बड़े पैमाने पर विस्तार हुआ है। असली मुद्दा यह है कि क्या विश्वविद्यालय एआई का उपयोग सीखने में एक भागीदार के रूप में करेंगे या केवल इसे नकल करने के एक टूल की तरह देखेंगे।
सीईए की चेतावनी बिल्कुल सही समय पर आई है। लेकिन नीतिगत संदेश डिग्री को दफनाने का नहीं, बल्कि उसे नए सिरे से डिजाइन करने का होना चाहिए। व्यावसायिक हुनर को औपचारिक रूप दिए जाने और सामाजिक प्रतिष्ठा हासिल करने की आवश्यकता है। भारत का रोजगार संकट केवल एक सामाजिक सनक की जगह दूसरी सनक लाकर हल नहीं होगा। यह तब हल होगा जब कोई युवा सिविल इंजीनियर, कोडर, नर्स, शेफ, वेल्डर, जिला योजनाकार, तकनीशियन, शिक्षक, उद्यमी या लोक सेवक बन सके- और प्रत्येक रास्ते में सम्मान, आय, सुरक्षा और आगे बढ़ने के मौके हों।
अजित रानाडे जाने-माने अर्थशास्त्री हैं। सौजन्यः बिलियन प्रेस
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