आरएसएस ने आरक्षण की वजह से किया था संविधान का विरोध, शुरू से पिछड़ी जातियों के उत्थान के खिलाफ रहा है संघ

आरएसएस और बीजेपी ‘आरक्षण’ खत्म करने की जरूरत पर बहस चाहते हैं। लेकिन वास्तव में बहस इसपर होनी चाहिए कि आरक्षण के लक्ष्यों को अभी तक पूरा क्यों नहीं किया गया। जब सत्ता और संसाधनों में साझेदारी की बात आती है, तो संघ योग्यता और क्षमता की बीन बजाने लगता है।

फोटोः सोशल मीडिया
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उदित राज

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ‘आरक्षण’ पर बहस चाहते हैं। यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने इस मसले पर अपने मन की बात कही है। पहले भी कई अवसरों पर, वह मुखर तरीके से अपने विचार रख चुके हैं। जब भागवत और उनके साथी ‘आरक्षण’ को खत्म करने की वांछनीयता पर बहस चाहते हैं, तब वास्तव में बहस इस पर करने की जरूरत है कि आरक्षण के लक्ष्यों को अभी तक पूरा क्यों नहीं किया गया।

‘आरक्षण’ आजादी के समय से ही रहा है, लेकिन तथ्य यह है कि इसके उद्देश्य अभी तक पूरे नहीं हुए हैं। इसलिए बहस इस पर होनी चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों है कि भारत सरकार में 89 सचिवों में अनुसूचित जाति (एससी) का केवल एक व्यक्ति है, अनुसूचित जनजाति (एसटी) से तीन हैं और अतिपिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से कोई नहीं है। बहस इस पर भी होनी चाहिए कि केंद्रीय सरकार की वर्ग-एक की नौकरियों में एससी के पास 13.4 फीसदी, एसटी के पास छह प्रतिशत और 27 प्रतिशत का अनिवार्य वैधानिक आरक्षण होने के बावजूद ओबीसी के पास मात्र 13 फीसदी पद ही क्यों हैं। एससी और एसटी की आबादी को जोड़ दिया जाए तो यह 25 प्रतिशत होती है।

केंद्र सरकार की वर्ग-दो की नौकरियों पर नजर डालें तो एससी और एसटी के मामले में स्थिति थोड़ी बेहतर दिखती है, लेकिन यहां भी ओबीसी के लिए आरक्षित 27 प्रतिशत के बावजूद उनके हिस्से में 14.77 फीसदी ही पद हैं। इसी तरह केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 1125 प्रोफेसरों में से केवल 39 एससी से हैं, जो मात्र 3.47 फीसदी ठहरता है। यहां एसटी का प्रतिनिधित्व 0.7 फीसदी है, जबकि ओबीसी पूरी तरह से गायब हैं। 2620 एसोसिएट प्रोफेसरों में से एससी का प्रतिनिधित्व 130 (4.96 प्रतिशत) और एसटी का 34 यानि मात्र 1.3 प्रतिशत है।

सवाल पैदा होता है कि एससी/एसटी और पिछड़ी जातियां क्या हिंदू समुदाय का हिस्सा नहीं हैं? उन्हें मुसलमानों और ईसाइयों से समस्या हो सकती है, लेकिन क्या एससी/एसटी/ओबीसी भारत माता की संतान नहीं हैं? ऊंचे स्वर में लगाया जाने वाला ‘भारत माता की जय’ का नारा किसके लिए है? उन्हें यह समझाना चाहिए कि भारत माता की धरती पर उसके संसाधनों, सत्ता और शासन पर किनका अधिकार है? उन्हें एक स्पष्ट घोषणा के साथ आने से कोई नहीं रोकता कि उनके सामाजिक-धार्मिक पदानुक्रम में, प्रत्येक व्यक्ति को ऋगवेद और अन्य शास्त्रों में निर्दिष्ट वर्ण व्यवस्था में उसकी रैंकिंग के हिसाब से किसको क्या मिलेगा।

लेकिन शास्त्रों में जो कहा गया है उसको लेकर जब भी वे कठिन परिस्थिति में फंसते हैं, तो वे या तो टालमटोल वाला रवैया अपनाते हैं या प्रेक्षप के लिए किसी दूसरे पर दोष मढ़ देते हैं। तथ्य यह है कि कोई भी एससी/एसटी या ओबीसी नागपुर में आरएसएस की निर्णय लेने वाली श्रेणी में नहीं पहुंचा है। जब भी सत्ता और संसाधनों को साझा करने की बात आती है, संघ तुरंत ही योग्यता और क्षमता की बीन बजाने लगता है। सांप्रदायिक विभाजन के अपने एजेंडे को बढ़ाने के लिए संघ घोषणा करता है कि कोई जाति नहीं है और सभी हिंदू हैं।

सच ये है कि संघ और उसके आनुषांगिक संगठनों ने शुरू से ही संविधान का सम्मान नहीं किया। संघ के सिद्धांतकार माधव सदाशिव गोलवलकर ने कहा था कि भारतीय संविधान दुनिया के विभिन्न संविधानों के प्रावधानों का एक सार है और इसमें कोई भारतीयता नहीं है। 11 दिसंबर, 1948 को उन्होंने नई दिल्ली के रामलीला मैदान में एक बड़ी सभा आयोजित की थी और डॉ अंबेडकर का पुतला जलाया था। संघ के लोगों ने तिरंगे का विरोध किया था और नागपुर में अपने मुख्यालय में 2002 के बाद ही इसे फहराया था।

आरएसएस ने भारतीय संविधान का विरोध क्यों किया था? अनेक कारणों में से एक वजह यह थी कि ‘आरक्षण’ का प्रावधान उन्हें हमेशा क्रोधित करता था। संविधान ने सामाजिक पदानुक्रम को समाप्त कर दिया था जो कि ब्राह्मणवादी अभिजात्य वर्ग को नामंजूर था।

जब वीपी सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा की थी तो संघ की प्रच्छन्न कार्रवाई के चलते पूरे देश में हंगामा हुआ और लाल कृष्णआडवाणी के नेतृत्व में देशव्यापी रथ यात्रा शुरू करने में इसने चारे का काम किया। जब 2006 में तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने 93वें संविधान संशोधन के जरिए ओबीसी को मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में आरक्षण प्रदान किया, तो आरएसएस ने इसी तरह के विरोध प्रदर्शन आयोजित किए। बीजेपी और संघ दोनों ही एससी, एसटी और ओबीसी का हिंदुओं के रूप में चालाकी से समर्थन करते हैं, वहीं दूसरी तरफ इनके सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक और वित्तीय हितों के खिलाफ काम करते हैं।

विडंबना यह है कि पिछड़े समुदाय आरएसएस और बीजेपी की साजिश को नहीं समझते हैं। आखिर आएसएस ने इस बात पर क्यों नहीं विरोध प्रदर्शन किया कि ओबीसी को 1992 में जो आरक्षण दिया गया था उसे अभी भी लागू किया जाना बाकी है? मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में ओबीसी समुदायों से एक भी कैबिनेट मंत्री नहीं है, जब तक कि प्रधानमंत्री को इसमें न गिन लिया जाए। अनुभवजन्य रूप से, कोई भी इस नतीजे पर पहुंच सकता है कि संघ उसी तरह से ओबीसी के प्रति शत्रुवत है जैसा वह मुस्लिम और ईसाई अल्पसंख्यकों के प्रति है।

लेकिन उनकी समस्या यह है कि वे ओबीसी के प्रति अपनी शत्रुता को सार्वजनिक करने का जोखिम नहीं उठा सकते क्योंकि वे चाहते हैं कि ओबीसी उनके पाले में आ जाएं। हालिया सर्वेक्षण दर्शाते हैं कि हिंदू उच्च जातियों के पास अनुपातहीन धन-संपदा है, जो भारत की 41 फीसदी धन-संपदा से अधिक है, जबकि27 फीसदी दलितों के पास 11.3 प्रतिशत है। वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में एक भी एससी/एसटी जज नहीं है। इन समुदायों में से देश में एक भी मान्यता प्राप्त पत्रकार नहीं है। क्या आरएसएस ने कभी इस पर बहस के लिए कहा कि इन समुदायों का इतना खराब प्रतिनिधित्व क्यों है?

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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