बलिदान दिवस विशेषः चन्द्रशेखर आजाद देश को विदेशी शासन से ही नहीं, शोषण, सांप्रदायिकता से भी मुक्त कराना चाहते थे

चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह और उनके साथी भारत के लिए समाजवादी भविष्य देखते थे। इसके लिए वे तत्कालीन राष्ट्रीय नेतृत्व में जवाहरलाल नेहरु को अधिक महत्व देते थे। इसके बारे में एक दस्तावेज भी प्रकाशित किया गया था।

फोटोः सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

चन्द्रशेखर आजाद ने उत्तर भारत के क्रांतिकारी आंदोलन के सैन्य पक्ष को अंत तक कितने साहस से संभाला था, इसकी अनेक कहानियां प्रचलित हैं। पर इसके साथ समग्र मूल्यांकन के लिए यह भी ध्यान में रखना जरूरी है कि उन्हांने साहस के साथ कितने संयम और आत्म-नियंत्रण का परिचय बार-बार दिया। उनका स्वभावगत झुकाव साहसी कार्यवाहियों की ओर था, पर योग्य सेनापति के रूप में उन्होंने अनेक बार कठिन स्थितियों की हकीकत को देखते हुए अव्यवहारिक कार्यवाहियों पर रोक भी लगाई।

किशोरावस्था में ही चंद्रशेखर ने देश को अपनी गहरी निष्ठा और हिम्मत का परिचय बहुत मार्मिक स्थितियों में दिया था। बनारस में अध्ययन कर रहे इस छात्र से एक सत्याग्रही पर एक पुलिसकर्मी का अत्याचार देखा न गया तो एक पत्थर फेंककर उसने सत्याग्रही को बचा कर पुलिसकर्मी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।

बाद में पकड़े जाने पर छात्र ने सजा की परवाह न करते हुए अदालत में भी भारत माता की जय और महात्मा गांधी के जय के नारे लगाए। अपना और पिता का नाम पूछने पर नाम ‘आजाद’ और ‘स्वतंत्र’ बताया। घर का पता पूछने पर कहा ‘जेलखाना’। भयंकर बेंत की मार पड़ी तो भी इस किशोर ने और जोर से आजादी के नारे बुलंद किए। पुलिस की मार से घायल किशोर का स्वागत जनता ने बहुत जोर-शोर से किया और तभी से चन्द्रशेखर के साथ ‘आजाद’ का नाम भी जुड़ गया।


कानपुर में कांग्रेस के महान नेता और प्रताप के संदापक गणेश शंकर विद्यार्थी क्रान्तिकारियों के लिए परम हितकारी मित्र थे। उनके माध्यम से अनेक क्रांतिकारी आपस में मिलते थे। जब चंद्रशेखर आजाद पंजाब के युवा क्रांतिकारी भगत सिंह से मिले तो दो महान प्रतिभाओं का मिलन हुआ। चंद्रशेखर की सैन्य नेतृत्व और नियोजन क्षमताओं का जब भगत सिंह की गहन अध्ययन आधारित समाजवादी सोच से मिलन हुआ तो उत्तर भारत के क्रांतिकारी आंदोलन को नई दिशा मिली। हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में समाजवादी शब्द जुड़ गया और पंजाब व संयुक्त प्रान्त (वर्तमान में उत्तर प्रदेश) के अतिरिक्त राजस्थान और बिहार के कुछ क्रांतिकारी भी इस संगठन से जुड़ गए।

चाहे लाला लाजपत राय की निर्मम लाठीचार्ज से मृत्यु का बदला लेने का मामला हो या अनेक अन्य अन्यायों का विरोध यह क्रांतिकारी संगठन अपने बहुत सीमित साधनों से ही आजादी की लड़ाई में नया उत्साह लाने और जन-शिक्षण की जिम्मेदारियों को निभाता रहा। भगत सिंह ने जोर दिया कि अपने क्रांतिकारी विचारों को लोगों में ले जाने के लिए एक बड़ा कदम लेना होगा। अतः उन्होंने बटुकेश्वर दत्त के साथ केंद्रीय असेंबली में अपने संगठन के प्रचार के पर्चे बांटते हुए गिरफ्तारी दी।

इसके बाद अनेक अन्य क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी हुई और उन्होंने अदालत व जेल से बहुत हिम्मत और समझ-बूझ से पूरे देश का ध्यान आजादी के उद्देश्य की ओर केन्द्रित किया। पर चंद्रशेखर आजाद को पुलिस उस समय भी न पकड़ सकी और वे क्रांतिकारी संगठन को सक्रिय बनाए रखने के अथक प्रयास करते रहे।

चंद्रशेखर किशोरावस्था से ही अपने माता-पिता से बिछुड़ गए थे। अतः इन दिनों समय निकाल कर वे तीन-चार दिनों के लिए अपने माता-पिता के निवास में जाकर चुपके से उन्हें मिल भी आए। प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच आजाद ने जेल से भगत सिंह को छुड़ाने की एक योजना पर गंभीरता से कार्य करना आरंभ किया। उनके नेतृत्व में एक दल लाहौर में जेल के फाटक पर उस समय पंहुच भी गया जब भगत सिंह को एक जेल से दूसरे जिले में भेजा जा रहा था। पर ऐन मौके पर कुछ स्थितियां प्रतिकूल हो जाने से आगे की कार्यवाही नहीं हो पाई।


फरवरी 1931 का महीना भी संगठन की आर्थिक और अन्य कठिनाईयों को दूर करने की उधेड़बुन में गुजरा। 27 फरवरी को वे इलाहबाद के एलफ्रेड पार्क में अपने एक साथी से मिलने जा रहे थे कि पुलिस को खबर मिल गई और पार्क को घेर लिया। चन्द्रशेखर ने अपने साथी को तो पुलिस के घेरे से बचा लिया पर स्वयं अंतिम समय तक बहुत शौर्य से लड़ते हुए शहीद हुए। वीरगति प्राप्त करते समय उनकी आयु मात्र 25 वर्ष की थी और एक दशक से वे निरंतर आजादी की लड़ाई में पूरी निष्ठा से प्रयासरत थे।

चन्द्रशेखर आजाद के शौर्य को याद करने के साथ आज उनके और उनके साथियों के संदेश को याद रखना भी बहुत जरूरी है। वे देश को विदेशी शासन से ही नहीं, शोषण और सांप्रदायिकता से भी आजाद कराना चाहते थे। चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह और उनके साथी भारत के लिए समाजवादी भविष्य देखते थे। इसके लिए वे तत्कालीन राष्ट्रीय नेतृत्व में जवाहरलाल नेहरु को अधिक महत्व देते थे। इसके बारे में एक दस्तावेज भी प्रकाशित किया गया था।

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