राम पुनियानी का लेखः नेताजी और भगत सिंह के साथ सावरकर को खड़ा करने का संघ का एजेंडा, लंबा है साजिश का इतिहास

हाल में दिल्ली विश्वविद्यालय के परिसर में भगत सिंह, सुभाषचन्द्र बोस और सावरकर की एक-दूसरे से जुड़ी मूर्तियां लगाई गईं और उन्हें स्वाधीनता संग्राम की त्रिमूर्ति बताया गया। दरअसल यह सावरकर को नेताजी और भगत सिंह के समकक्ष बताने के संघ के एजेंडे का हिस्सा है।

फोटोः सोशल मीडिया
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राम पुनियानी

समावेशी बहुवाद पर आधारित वह राष्ट्रवाद, जो भारत के स्वाधीनता संग्राम की आत्मा था, आज खतरे में है। इसका कारण है संघ परिवार की राजनीति का बढ़ता प्रभामंडल। संघ से जुड़े अनेकानेक संगठन, हमारे सामाजिक और राजनैतिक जीवन के सभी क्षेत्रों में घुसपैठ कर अपना वर्चस्व स्थापित कर रहे हैं। इसके साथ ही, यह आख्यान निर्मित करने का प्रयास हो रहा है कि हिन्दू राष्ट्रवाद, अनादिकाल से भारतीय परंपरा का हिस्सा था।

लेकिन हिन्दू राष्ट्रवाद के महिमामंडन की राह में सबसे बड़ी बाधा है इस राष्ट्रवाद की स्वाधीनता आंदोलन में शून्य भूमिका और इसका अंग्रेजों का पिछलग्गू होना। इस तथ्य को छुपाना, हिन्दू राष्ट्रवाद के पैरोकारों के लिए अपरिहार्य है। यही कारण है कि वे दिन-रात मेहनत कर यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि उनके वैचारिक पूर्वजों ने स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लिया था। स्वाधीनता संग्राम से अपने विश्वासघात को छुपाने के लिए वे कहानियां गढ़ रहे हैं। वे उन नायकों को अपना बताने का प्रयास कर रहे हैं जिनके गांधी या नेहरू से रणनीतिक मतभेद थे या जिन्होंने स्वाधीनता पाने के लिए अपनी अलग राह चुनी थी।

इस दिशा में पहला प्रयास था मोहनदास करमचंद गांधी के अनन्य शिष्य, जवाहरलाल नेहरू के निकट सहयोगी और जीवनपर्यंन्त कांग्रेस के निष्ठावान सिपाही, सरदार वल्लभभाई पटेल को हिन्दू राष्ट्रवादी ढांचे में ढालने की कोशिश। इधर-उधर से कुछ असंबद्ध घटनाओं और तथ्यों को उद्धत कर यह कहा जा रहा है कि अगर सरदार पटेल देश के प्रथम प्रधानमंत्री होते तो आज कश्मीर समस्या न होती। अब, यह भी कहा जा रहा है कि महात्मा गांधी ने भगत सिंह की जान बचाने का कोई प्रयास नहीं किया था।

यहां इस ऐतिहासिक तथ्य को नजरअंदाज किया जा रहा है कि गांधीजी ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू की फांसी रूकवाने की हरचन्द कोशिश की थी, लेकिन अंग्रेज शासक, भगत सिंह और उनके साथियों को माफी देने के लिए तैयार नहीं थे। यह दुष्प्रचार करने वाले इस तथ्य की भी अनदेखी कर रहे हैं कि भगत सिंह ने अंग्रेजों से माफी मांगने या अपनी सजा कम करने का अनुरोध करने से साफ इंकार कर दिया था। भगत सिंह एक सिद्धान्तवादी व्यक्ति थे और अपने आचरण से पूरे देश को प्रेरित करना चाहते थे।

इस मुद्दे पर चर्चा का संदर्भ यह है कि अभी हाल (अगस्त 2019) में दिल्ली विश्वविद्यालय के परिसर में भगत सिंह, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और सावरकर की एक-दूसरे से जुड़ी हुई मूर्तियां लगाई गईं और उन्हें भारतीय स्वाधीनता संग्राम की त्रिमूर्ति बताया गया। दरअसल, यह सावरकर को नेताजी और भगत सिंह के समकक्ष बताने के एजेंडे का हिस्सा है। यह बताने का प्रयास है कि इन दोनों की तरह, सावरकर भी ब्रिटिश-विरोधी क्रांतिकारी थे।

लेकिन ये सब जानते हैं कि सावरकर केवल अपने जीवन के पहले चरण में ब्रिटिश-विरोधी थे। अंडमान स्थित सेल्लुयर जेल में कैद कर दिए जाने के बाद उनका ह्रदय परिवर्तन हो गया और उन्होंने अपनी रिहाई के लिए अंग्रेज सरकार को पांच दया याचिकाएं भेजीं। सावरकर, आरएसएस और हिन्दू राष्ट्रवादियों के सबसे बड़े वैचारिक गुरू हैं। उन्होंने ही हिन्दुत्व, जो कि हिन्दू राष्ट्रवाद की विचारधारा है को परिभाषित किया था।

सबसे मजे की बात यह है कि सावरकर स्वयं नास्तिक थे। उनके विचार, हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति का आधार हैं। साल 1857 के विद्रोह पर अपनी पुस्तक में सावरकर ने लिखा है कि हिन्दुओं और मुसलमानों ने किस तरह कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। परंतु हिन्दू राष्ट्रवादी के रूप में अवतार लेते ही उन्होंने मुसलमानों के खिलाफ जहर उगलना शुरू कर दिया, क्योंकि उन्हें लगा कि मुसलमानों से नफरत ही हिन्दू राष्ट्रवाद का आधार हो सकता है।

इसके विपरीत, भगत सिंह और नेताजी- संघ परिवार जिनसे सावरकर को जोड़ना चाहता है - जीवनपर्यंन्त ब्रिटिश विरोधी रहे। भगत सिंह कम्युनिस्ट थे और सुभाषचंद्र बोस, समाजवादी थे। भगत सिंह मानते थे कि गांधीजी के नेतृत्व में समावेशी आंदोलन ही भारतीय स्वाधीनता संग्राम की धुरी हो सकता है। गांधीजी के साथ अपने मतभेदों के बावजूद, नेताजी उन्हें राष्ट्रपिता कहते थे। नेताजी, गांधीजी और भगत सिंह के बीच मतभेद, राष्ट्रवाद की अवधारणा को लेकर नहीं थे। उनमें अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ाई लड़ने के तरीके के बारे में मतभेद थे।

गांधीजी अहिंसा के पक्के समर्थक थे। उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजों की भारत पर पकड़ कमजोर करने के लिए भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया था। बोस चाहते थे कि भारत के स्वाधीनता सेनानी, ब्रिटेन के विरूद्ध युद्धरत धुरी राष्ट्रों- जर्मनी, इटली और जापान से हाथ मिलाएं।

कुल मिलाकर, जहां तक राष्ट्रवाद का संबंध है, भगत सिंह, नेताजी और गांधीजी और इन नेताओं के समर्थक एक शिविर में हैं। दूसरे शिविर में हैं जिन्ना (मुस्लिम लीग का सदस्य बनने के बाद) और हिन्दू राष्ट्रवाद के पथप्रदर्शक सावरकर। ये दोनों धर्म को राष्ट्रवाद का आधार मानते और बताते थे। धार्मिक राष्ट्रवाद की यह विचारधारा, राजाओं-नवाबों और जमींदारों से उपजी थी। इसके विपरीत, भारतीय राष्ट्रवाद के समर्थक, समाज के विभिन्न तबकों से थे। इनमें शामिल थे उद्योगपति और व्यवसायी, श्रमिक और शिक्षित मध्यमवर्ग। ये वर्ग स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के हामी थे और धर्म से ऊपर उठकर सोचते थे। हिन्दू और मुस्लिम राष्ट्रवादी, जन्म-आधारित सामाजिक पदक्रम के सामंती मूल्य में आस्था रखते थे।

दिल्ली विश्वविद्यालय में जो कुछ हुआ वह इस बात का नमूना है कि तेजी से उभरता धार्मिक राष्ट्रवाद, इतिहास को किस रूप में प्रस्तुत करना चाहता है और हमारे अतीत के नायकों के साथ किस तरह की छेड़छाड़ करने पर आमादा है। अब तक हमने इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने के संघ परिवार के अभियान का एक पक्ष देखा है, जिसमें हिन्दू शासकों और मनुस्मृत्ति जैसे हिन्दू ग्रंथों का महिमागान किया जाता है। दिल्ली विश्वविद्यालय की घटना, हिन्दू राष्ट्रवाद की वैचारिक मजबूरी के एक दूसरे पक्ष को उद्घाटित करती है। संघ परिवार केवल उन नेताओं को महिमामंडन के लिए चुन रहा है जिनके गांधी या नेहरू से मतभेद थे। बोस और भगत सिंह को इसलिए चुना गया क्योंकि वे कई मामलों में गांधीजी से असहमत थे और पटेल को इसलिए क्योंकि उनमें और नेहरू में कुछ मुद्दों पर मतभिन्नता थी।

परंतु महत्वपूर्ण यह है कि ये सभी नेता भारतीय राष्ट्रवादी थे और इनकी तुलना सावरकर से कतई नहीं की जा सकती। सावरकर ने तो स्वाधीनता संग्राम से विश्वासघात किया था। दिल्ली विश्वविद्यालय की घटना मामूली भले ही हो परंतु इससे यह पता चलता है कि संघ परिवार, भारतीय राष्ट्रवादियों और हिन्दू राष्ट्रवादियों को एक पलड़े पर तोलने का प्रयास कर रहा है।

हिन्दू राष्ट्रवादी, विचारधारात्मक विभाजक रेखाओं को मिटाने का उपक्रम कर रहे हैं। हमें भारतीय स्वाधीनता संग्राम के प्रमुख नायकों की मूल विचारधारा को समझना होगा। तभी हम समझ पाएंगे कि कौन से मतभेद वास्तविक और महत्वपूर्ण थे और कौन से मामूली और नजरअंदाज करने लायक। यह केवल मूर्तियों का प्रश्न नहीं है। प्रश्न यह है कि आखिर हम किस तरह के भारत का निर्माण करना चाहते हैं। भगत सिंह, बोस, गांधी और अम्बेडकर के भारत का या सावरकर के हिन्दू राष्ट्र का।

(लेख का अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया द्वारा)

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