वक्त-बेवक्त: दिल्ली पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने आज के बदहवास समय में ठहरकर सोचने का मौक़ा दिया है

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार के मामले में फैसला देते हुए केंद्र द्वारा चुनी सरकार को एक नौकरशाह के ज़रिए अनुशासित करने की हिमाक़त के लिए संयमित भाषा में फटकार ही लगाई है। इस निर्णय से भारत के संघीय ढाँचे की रक्षा के संघर्ष के लिए कुछ रास्ता हमवार हुआ है।

फोटो : सोशल मीडिया
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अपूर्वानंद

दिल्ली के प्रशासन को लेकर उच्चतम न्यायालय के फ़ैसले पर बहस शुरू हो गई है और विपक्षी दल सत्ताधारी आम आदमी पार्टी को कह रहे हैं कि अब वह नाटक छोड़कर काम करना शुरू करे क्योंकि यह साफ़ हो गया है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा सपना है। उसका नारा लगाना समय व्यर्थ करना है। लेकिन क्या सवाल यह था? जो मूल प्रश्न था उसे लेकर अदालत की राय साफ़ है: उपराज्यपाल को अपनी सीमा में रहना चाहिए।

अदालत ने कहा है कि चूँकि दिल्ली देश की राजधानी है, उसकी स्थिति विशेष है। पुलिस, ज़मीन के इस्तेमाल और सामान्य जन व्यवस्था को छोड़कर बाक़ी सभी विषयों पर दिल्ली की सरकार क़ानून बना सकती है और निर्णय भी ले सकती है और उप राज्यपाल उसमें रुकावट पैदा न करें। विशेषज्ञ अदालती फ़ैसले की समीक्षा कर रहे हैं। उनका कहना है कि इसमें उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार, दोनों के लिए अपनी सीमा समझने का संदेश है। वे यह कह रहे हैं कि दिल्ली सरकार को बहुत उत्साहित नहीं होना चाहिए क्योंकि कई सीमाएँ उसपर दिल्ली की विशेष अवस्था के कारण लागू होती हैं। उपराज्यपाल चाहें तो अभी भी कई फैसलों को रोक सकते हैं और उनकी समीक्षा भी कर सकते हैं।

तकनीकी ब्योरे और भी होंगे लेकिन इस तरह के विवाद के राजनीतिक पक्ष को नज़रंदाज नहीं करना चाहिए। वह यह है कि पिछले चार साल से केंद्र सरकार ने उपराज्यपाल के ज़रिए दिल्ली की सरकार पर जो शिकंजा कसा है वह भारत के संघीय प्रणाली की आत्मा के विरुद्ध है। न सिर्फ़ यह बल्कि वह दिल्ली की जनता का भी अपमान है जिसने चुनाव के माध्यम से एक सरकार बनाई है।जनता के द्वारा चुनी सरकार को एक नौकरशाह के ज़रिए अनुशासित करने की केंद्र सरकार की हिमाक़त के लिए उसे अदालत ने संयमित भाषा में फटकार ही लगाई है।

दिलचस्प यह है कि इस फैसले के व्यापक राजनैतिक और जनतांत्रिक आशय पर बात करने की जगह कांग्रेस पार्टी की नेता शीला दीक्षित भी एक नौकरशाह की तरह ही बात कर रही हैं। पहले भी वे कह चुकी हैं कि उन्होंने क़ानूनी सीमा को समझते हुए काम किया था और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के रहते हुए भी उन्हें कोई दिक़्क़त नहीं हुई थी। उन्होंने यह नसीहत भी दी कि पूर्ण राज्य का नारा तो लगाया जा सकता है लेकिन यह जानते हुए कि वह कभी सच न होगा।

शीलाजी को परेशानी नहीं हुई तो इसकी वजह उनका संयम नहीं बल्कि केंद्र में एक अपेक्षाकृत सभ्य सरकार का होना था। भारत में स्थिति अभी बिलकुल अलग है। केंद्र में एक ऐसी सरकार है जिसने इस इरादे को छिपाने की कोशिश भी नहीं की है कि वह भारत पर पूरी तरह से क़ब्ज़ा करना चाहती है। उसके नेता बार बार कहते रहे हैं कि इसके लिए साम दाम दंड भेद , किसी का सहारा लिया जाना उचित है।

यह याद कर लेना ठीक होगा कि दिल्ली के चुनाव प्रचार में भारतीय जनता पार्टी के मुख्य प्रचारक ने दिल्ली की जनता को धमकी दी थी कि बेहतर हो कि वह ऐसी सरकार चुने जो उसके डर से काम करे। 1 फ़रवरी , 2015 के अख़बार एक चुनावी रैली में दी गई इस चेतावनी को यों रिकॉर्ड करते हैं, “ अगर आप भारतीय जनता पार्टी की सरकार को चुनते हैं तो यहाँ वे लोग होंगे जिन्हें मोदी और केंद्र सरकार का डर होगा। लेकिन अगर कोई ऐसा हो जिसके सर पर कोई न हो तो वह सिर्फ़ बर्बादी ही लगा सकता है।”

दिल्ली की जनता ने इस अहंकार को पूरी तरह से ठुकरा दिया। प्रधानमंत्री के एक समर्थक ने उस वक़्त मुझसे कहा था कि दिल्ली की जनता ने उन्हें जो थप्पड़ मारा है उसकी गूँज पूरे भारत में सुनाई देगी। इसे वे नहीं भूले और उस वक़्त से दिल्ली की जनता से उसकी हिमाक़त का बदला ले रहे हैं। ऐसा लगता है कि झगड़ा दिल्ली की सरकार से है लेकिन असल नाराज़गी दिल्ली की जनता से है और उसे हर क्षण सज़ा दी जा रही है।

शुरू से ही समझ में आ गया कि केंद्र सरकार का इरादा दिल्ली की सरकार को चलने देने का नहीं था। वह अपने सचिव बहाल करे तो उसके निर्णय को ख़ारिज किया जा सकता था। वह स्वास्थ्य या शिक्षा को लेकर फ़ैसला करे तो वह रद्द किया जा सकता था। केंद्र सरकार ने उपराज्यपाल के ज़रिए दिल्ली की सरकार को अपमानित करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ा।

यह भी बड़ी निराशा की बात है कि उपराज्यपाल के पद पर विराजमान नौकरशाहों ने केंद्र सरकार के चाकरों की तरह बर्ताव किया और थोड़ी सभ्यता का परिचय नहीं दिया। जब दिल्ली के उपराज्यपाल के बाहरी कमरे में दिल्ली के मुख्यमंत्री और उसके साथी विरोध के लिए ही बैठे थे तो उन्हें शालीनता के लिए ही सही, कम से कम उनसे एक बार मिलना चाहिए था। इतना भी उनसे न किया गया। इसका अर्थ यह है कि वे मामूली सभ्यता भी भूल गए।

दिल्ली की सरकार निर्दोष नहीं लेकिन हम शायद बाक़ी सरकारों से वह अपेक्षा नहीं करते जो दिल्ली की सरकार से कर रहे हैं। हमने शायद ही किसी और राज्य में आरोप लगते ही साहसी दल के नेताओं की फ़ौरन गिरफ़्तारी होते देखी है। दिल्ली में एक नहीं अनेक गिरफ़्तारियाँ हुईं। चुनाव आयोग ने सारे क़ायदों की धज्जियाँ उड़ाते हुए विधायकों की सदन की सदस्यता रद्द की। वह निर्णय भी बाद में उच्च न्यायालय ने ख़ारिज किया। लेकिन इन सबमें वक़्त लगा। बल्कि वक़्त बर्बाद हुआ।

उच्चतम न्यायालय के निर्णय ने एक बार फिर आज के बदहवास समय में ठहरकर सोचने का मौक़ा दिया है और भारत में तेज़ी से लुप्त हो रहे जनतांत्रिक स्थान को बचाने का एक और औज़ार भी जो सांस्थानिक रूप से स्वीकार्य भी है। आश्चर्य नहीं कि दिल्ली की पूर्व मुख्य मंत्री से अलग कांग्रेस के ही दूसरे नेता, पुदुच्चेरी के मुख्यमंत्री ने इस फ़ैसले को अपने राज्य के लिए प्रासंगिक बताया। वहाँ केंद्र सरकार की प्रतिनिधि वे हैं जो एक समय दिल्ली की मुख्यमंत्री बनाना चाहती थीं। वे राज्य सरकार से ऊपर उसकी मालिक की तरह फटकार जारी कर रही हैं।

यह मान भी लें कि कि क़ानूनी तौर पर दिल्ली की सरकार हरियाणा की सरकार जैसे अधिकार का दावा नहीं कर सकती, लेकिन यह न भूलें कि आख़िर इन सरकारों को इन राज्यों की जनता ने चुना है। जनता के चुनाव को एक नौकरशाह नज़रंदाज कर सकता है, यह ख़याल ही अपने आप में ख़ासा विद्रोहजनक होना चाहिए। लेकिन यह सभ्य समाज को स्वीकार था और दिल्ली के उच्च न्यायालय को भी यह जनतंत्र के ख़िलाफ़ न लगा। इससे उस चिंताजनक अवस्था का अन्दाज़ मिलता है जिसमें हमारा समाज और वे संस्थाएँ पहुँच गयी हैं जिनपर जनतंत्र की रक्षा का दायित्व है।

जब हम उच्चतम न्यायालय के इस फ़ैसले का स्वागत करते है तो इसका अर्थ यह यह नहीं कि आम आदमी पार्टी सरकार या पार्टी के हर क़दम का समर्थन किया जाता रहा है। सिर्फ़ यह कि इस निर्णय से भारत के संघीय ढाँचे की रक्षा के संघर्ष के लिए कुछ रास्ता हमवार हुआ है।

यह समझने की ज़रूरत है कि अभी भारत एक असाधारण अवस्था में है।केंद्र में एक ऐसी सरकार है जिसका जनतांत्रिक मूल्यों में कोई विश्वास नहीं। इसलिए उसके हर क़दम को संदेह की नज़र से देखने की आवश्यकता है।

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