ग्लासगो सम्मेलन में जलवायु बदलाव के संकट पर गंभीरता तो दिखी, पर इससे निपटने के लिए बना कोष अभी भी खाली

धनी देशों की ओर से जलवायु परिवर्तन के संकट से निपटने के लिए जो 100 अरब डॉलर का कोष बनाया जाना था, उसमें वास्तव में 2020 तक केवल 16 अरब डॉलर की ही व्यवस्था हो सकी। खास बात ये है कि इसमें भी अधिकांश राशि कर्ज के रूप में दी गई है।

फोटोः सोशल मीडिया
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भारत डोगरा

जलवायु बदलाव के संकट की गंभीरता को बेहतर समझते हुए इसे कम करने के उपायों पर अब बहुत जोर दिया जा रहा है और यह ग्लासगो में आयोजित महासम्मेलन में अभिव्यक्त भी हुआ है। पर विकासशील और निर्धन देशों की ओर से एक बड़ा सवाल यह है कि इसके लिए जो संसाधन जरूरी हैं उनकी व्यवस्था कैसे होगी? 12 वर्ष पहले वर्ष 2009 में इसके लिए धनी देशों की ओर से एक 100 अरब डॉलर के कोष की घोषणा तो हुई थी पर अभी यह कोष बहुत अनिश्चित स्थिति में है। ग्लासगो सम्मेलन में इस बारे में निरंतर चर्चा होती रही पर अभी भी बहुत संतोषजनक स्थिति सामने नहीं आई है।

इस वार्षिक कोष की स्थापना वर्ष 2020 तक हो जानी चाहिए थी, पर वर्ष 2021 में भी यह लक्ष्य नहीं प्राप्त किया गया। इसमें सबसे बड़ी कमी यह पाई गई कि जहां इस कोष के अनुदान के रूप में प्राप्त होने की उम्मीद आरंभ में थी, वहां अधिकांश राशि कर्ज के रूप में दी गई, हालांकि इसकी ब्याज दर प्रायः सामान्य से कुछ कम रखी गई। जो राशि जलवायु बदलाव का संकट कम करने के लिए दी जा रही है, उसको कर्ज के रूप में देना कतई उचित नहीं है। इसे अनुदान के रूप में ही देना चाहिए।

लेकिन साल 2018-19 में अनुमान लगाया गया कि अभी तक इस कोष के लिए प्राप्त राशि का 80 प्रतिशत हिस्सा कर्ज के रूप में दिया गया। इस तरह वास्तव में वर्ष 2020 में 100 अरब डॉलर की जगह 16 अरब डॉलर की ही व्यवस्था हो सकी। खैर, ग्लासगो सम्मेलन में वादा हुआ है कि शीघ्र ही कोष 100 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा, पर यह अभी स्पष्ट नहीं हुआ है कि इसमें अनुदान का हिस्सा कितना होगा।

इसके अतिरिक्त अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या की गंभीरता और इसके नियंत्रण व अनुकूलन से जुड़े कार्यों की व्यापकता को देखते हुए 100 अरब डॉलर वार्षिक की व्यवस्था भी बहुत कम है और वास्तव में धनी देशों की जिम्मेदारी इससे कहीं अधिक की बनती है। यह स्थिति तब और स्पष्ट हो जाएगी, जब हम कुछ अन्य तुलनात्मक आंकड़ों को देखें। अमेरिका में यानि केवल एक धनी देश में एक वर्ष में केवल शराब पर 252 अरब डॉलर खर्च होता है। अमेरिका के साथ यूरोपियन यूनियन के देशों को जोड़ कर देखा जाए तो यहां केवल एक वर्ष में केवल सिगरेट पर 210 अरब डॉलर से अधिक खर्च होता है। केवल संयुक्त राज्य अमेरिका में छात्रों की शिक्षा के लिए बकाया कर्ज की राशि 1700 अरब डॉलर है। विलासिता की वस्तुओं का उत्पादन करने वाली फ्रांस की केवल एक कंपनी की परिसंपत्तियां 133 अरब डॉलर की हैं।


विश्व के अरबपतियों की कुल संपदा 13000 अरब डॉलर की है। यदि उन पर केवल 2 प्रतिशत टैक्स जलवायु बदलाव के कार्यों के लिए लगाया जाए तो इससे जलवायु बदलाव के प्रकोप को कम करने के कार्यों के लिए 260 अरब डॉलर प्राप्त किये जा सकते हैं। चार सबसे बड़े अरबपति ऐसे हैं जिनमें से हर एक की संपदा 100 अरब डॉलर से अधिक है। विश्व के 10 सबसे बड़े अरबपतियों की संपदा ही 1153 अरब डॉलर है। वर्ष 2020-21 के दौरान विश्व के सभी अरबपतियों की संपत्ति में 5000 अरब डालर की वृद्धि हुई और इस वृद्धि में से मात्र 5 प्रतिशत को यदि निर्धन और विकासशील देशों में जलवायु बदलाव के कार्यों के लिए प्राप्त कर लिया जाए तो इस तरह लगभग 250 अरब डॉलर की प्राप्ति हो सकती है।

यदि विश्व की कुल मनी लांड्रिंग को देखा जाए तो एक वर्ष में धन के अनुचित और अवैध उपयोग की राशि (संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुमान के अनुसार) लगभग 1600 अरब डॉलर है। इसे नियंत्रित कर यदि इसका 10 प्रतिशत भी जलवायु बदलाव से जुड़े जरूरी कार्यों में हो सके तो इस तरह 160 अरब डॉलर एक वर्ष में प्राप्त हो सकते हैं। विश्व में अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का कुल मूल्य एक वर्ष में 17000 अरब डॉलर है और इसकी तुलना में 100 अरब डॉलर की राशि तो बहुत ही कम है। अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार पर एक प्रतिशत की दर से कर इस दृष्टि से लगाया जाए तो निर्धन और विकासशील देशों में इस सार्थक कार्य के लिए 170 अरब डॉलर की राशि प्राप्त हो सकती है।

इस दृष्टि से देखा जाए तो 100 अरब डॉलर के विश्व कोष की व्यवस्था जलवायु बदलाव जैसे बहुत महत्वपूर्ण कार्य के लिए करना और निर्धन व विकासशील देशों तक इस सहायता को पहुंचाना कोई बड़ी बात नहीं है। निर्धन और विकासशील देशों के लिए जो विश्व स्तर पर जलवायु बदलाव कोष बन रहा है, वास्तव में उसकी राशि 100 अरब डॉलर से कहीं अधिक होनी चाहिए, जैसा कि अफ्रीका के अनेक जलवायु बदलाव वार्ताकारों और विशषज्ञों ने कहा है। अब तो इस बारे में अधिकांश विकासशील देशों में सहमति बन गई है कि यह कोष 100 अरब डॉलर से कहीं अधिक का होना चाहिए और इसके अतिरिक्त जलवायु बदलाव के कारण बढ़ने वाली आपदाओं की क्षतिपूर्ति भी धनी देशों को कुछ हद तक करनी चाहिए।

मान लीजिए कि 200 अरब डॉलर का ऐसा विश्व स्तर का कोष बन सके और विकासशील और निर्धन देशों में अपनी जनसंख्या के अनुकूल भारत को इस सहायता से लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त हो जाए तो इस 200 अरब डॉलर के कोष से भारत को 40 अरब डॉलर की सहायता प्राप्त हो सकती है। 40 अरब डॉलर का अर्थ है लगभग 3000 अरब रुपए या 300000 करोड़ रुपए और इस तरह की वार्षिक राशि से निश्चय ही बहुत उपयोगी कार्य किए जा सकते हैं।

इन संभावनाओं को देखते हुए इस कोष को मजबूत करने के लिए विभिन्न विकासशील और निर्धन देशों को एकजुट होकर प्रयास करने चाहिए और आपसी एकता बनाकर अपनी आवाज को इतना असरदार बनाना चाहिए कि शीघ्र ही अनुदान के रूप में यह 200 अरब डॉलर का कोष निश्चित रूप ले सकें।

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