कोरी बकवास और 'खाते' की हेरा-फेरी
महज एक दशक में ही, मोदी सरकार ने भारत के राष्ट्रीय कर्ज में 150 लाख करोड़ रुपये जोड़ दिए, जो बीते लगभग सात दशकों में सभी पिछली सरकारों द्वारा मिलकर जमा किए गए कुल कर्ज से भी लगभग 2.75 गुना ज्यादा है।

पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के कारण ईंधन की कीमतें भले ही तेजी से आसमान छू रही हों, भारत के पेट्रोल पंपों पर यह उम्मीद के विपरीत स्थिर बनी हुई हैं। मोदी सरकार ने नागरिकों के हित में अपने ‘जन-केन्द्रित’ उपायों का खूब ढिंढोरा पीटा है, लेकिन यह सारे उपाय असल में, एक दशक से चली आ रही लगातार दोहन और मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति में महज एक ‘कामर्शियल ब्रेक’ से ज्यादा कुछ नहीं हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में रहे एक दशक का ज्यादातर हिस्सा, सरकारी खजाने के लिए एक बड़ी सौगात साबित हुआ है। उनके कार्यकाल के दौरान, कच्चे तेल की वैश्विक कीमतें कई बार जमीन पर आ गिरीं- एक समय तो वे 30 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। कच्चे तेल की कीमतें जब-जब गिरीं, भारतीय उपभोक्ता इस इंतजार में रहा कि पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें भी उसी अनुपात में नीचे आएंगी। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ। सरकार ने बड़ी खामोशी से उस अंतर यानी मुनाफे को अपनी जेब में डाल लिया, और यह बताने की जहमत शायद ही कभी उठाई कि आखिर इसका फायदा आम जनता तक क्यों नहीं पहुंचाया गया।
जब कभी उसने समझाना या सफाई देनी चाही, तो वही तीन घिसे-पिटे तर्क दोहरा दिए: कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार द्वारा जारी किए गए ‘ऑयल बॉन्ड’, या पेट्रोलियम राजस्व से बनाई गई सड़कें, या फिर गरीबों को नकद हस्तांतरण। हालांकि, हकीकत इससे बिल्कुल अलग है, और सरकार के अपने ही आंकड़ों से बखूबी जाहिर भी हो जाती है।
दावा #1: ‘हम यूपीए कार्यकाल के ऑयल बॉन्ड चुका रहे थे’
मनमोहन सिंह सरकार ने 1.6 लाख करोड़ रुपये के ऑयल बॉन्ड छोड़े थे; ये ऐसे इंस्ट्रूमेंट थे जो तेल मार्केटिंग कंपनियों को रियायती दरों पर ईंधन बेचने के बदले मुआवजा देने के लिए जारी किए गए थे। भाजपा ने यह बात बार-बार दोहराई है, और इन ऑयल बॉन्ड को अपनी शिकायत और अपनी सफाई, दोनों के तौर पर पेश किया है।
लेकिन जिस बात को वह बड़ी आसानी से नजरअंदाज कर जाती है, वह यह है कि पिछले एक दशक में, मोदी सरकार ने पेट्रोलियम टैक्स के रूप में 44 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई की है। जबकि ऑयल बॉन्ड का भुगतान, मूलधन और ब्याज मिलाकर, लगभग 3.3 लाख करोड़ रुपये बैठता है। यह जमा किए गए टैक्स का लगभग सात प्रतिशत है।
दूसरे शब्दों में, तेल बॉन्ड चुकाने में खर्च हुए हर एक रुपये के बदले, मोदी सरकार ने तेरह रुपये अपनी जेब में डाले।
दावा #2 : ‘पैसे का इस्तेमाल सड़कें बनाने में हुआ’
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि मोदी के कार्यकाल में भारत में हाईवे की लंबाई बढ़ी है। सरकार इसे इस बात के सबूत के तौर पर पेश करती है कि पेट्रोलियम से होने वाली कमाई का इस्तेमाल सही तरीके से किया गया। पहली नजर में, यह तर्क ज्यादा सही लगता है, लेकिन इसमें हिसाब-किताब की एक कुटिलता छिपी है।
मार्च 2024 तक, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) पर 3.35 लाख करोड़ रुपये का कर्ज बकाया था। यह आंकड़ा उन ‘ऑयल बॉन्ड’ की देनदारी से दोगुने से भी ज्यादा है, जिसका रोना भाजपा अक्सर रोती रहती है। अगर, जैसा कि भाजपा का तर्क है, भविष्य के लिए टाला गया कर्ज आने वाली पीढ़ियों पर इतना भारी बोझ है, तो क्या एनएचएआई की बैलेंस शीट को लेकर भी वैसा ही गुस्सा नहीं होना चाहिए?
बात इतनी ही नहीं है। उधार के पैसे से बनाए गए हाईवे अब इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (इन्वीट) मैकेनिज्म के जरिये असल में निजी निवेशकों और सॉवरेन वेल्थ फंड्स को वापस बेचे जा रहे हैं। भविष्य में टोल से होने वाली कमाई को, निजी खिलाड़ियों के लिए रिटर्न कमाने के साथ-साथ, कर्ज चुकाने के लिए भी इस्तेमाल किया जाएगा। सड़क मंत्री नितिन गडकरी ने सार्वजनिक तौर पर कहा है कि एनएचएआई की सालाना टोल से होने वाली कमाई 50,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 1.45 लाख करोड़ रुपये होने की उम्मीद है। वित्त वर्ष 2025-26 में, टोल से होने वाली कमाई पहले ही 73,000 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है।
तो, सड़कें उधार के पैसे से बनाई जाती हैं, कर्ज चुकाने और निवेशकों को मुनाफा देने के लिए भविष्य के टोल को गिरवी रख दिया जाता है, और आम नागरिक या उपभोक्ता से यह स्वीकार करने को कहा जाता है कि ईंधन पर लगने वाले ऊंचे टैक्स से ही इस सड़क प्रोजेक्ट का खर्च चला है। यह वही उपभोक्ता है जो टोल भी देता है, जिससे कथित तौर पर कर्ज भी चुकता होता है और निजी निवेशक को मुनाफा भी मिलता है।
दावा #3: ‘पैसा गरीबों तक पहुंचा’
यह तीसरा तर्क सबसे ज्यादा पेचीदा, बल्कि सबसे ज्यादा बेईमान है। भाजपा मोदी सरकार के कार्यकाल में 50 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के ‘डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर’ (डीबीटी) का हवाला देते हुए यह दावा करती है कि पेट्रोलियम से हुई कमाई को गरीबों तक पहुंचाया गया। यह आंकड़ा तब तक बहुत बड़ा और चौंकाने वाला लगता है, जब तक कि आप इसे अलग-अलग हिस्सों में बांटकर इसकी बारीकी से जांच नहीं कर लेते।
भारत का कुल सब्सिडी बिल, जिसे केन्द्रीय बजट के हिस्से के तौर पर मापा जाता है, असल में 2013-14 के 16.3 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में 13.06 प्रतिशत हो गया है। मौजूदा सब्सिडी का लगभग 91 प्रतिशत हिस्सा अनाज वितरण, उर्वरक, प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवास और एलपीजी पर खर्च होता है; ये सभी चीजें यूपीए के शासनकाल में भी मौजूद थीं- लेकिन तब इनका स्तर काफी ऊंचा था। तो, इस सरकार ने कल्याणकारी योजनाओं का कोई विस्तार नहीं किया है; इसने बस उन्हें एक नया नाम जरूर दे दिया है।
सबसे ज्यादा चौंकाने वाला आंकड़ा पेट्रोलियम सब्सिडी में आई भारी गिरावट है, जो यूपीए के समय केन्द्रीय बजट का 5.1 प्रतिशत थी, और जो आज घटकर महज 0.24 प्रतिशत रह गई है। 2013-14 में, भोजन और उर्वरक सब्सिडी मिलाकर बजट का 9.6 प्रतिशत थीं; अब वे 7.33 प्रतिशत पर हैं। और न ही यूपीए के वर्षों की तुलना में आवास आवंटन में कोई खास बढ़ोतरी हुई है।
यहां गौर करने की बात यह भी है कि डीबीटी के दावों में जिन ‘दक्षता लाभों’ का जिक्र हुआ है, वे आंकड़े सरकार द्वारा जारी किए गए हैं; भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) द्वारा इनका स्वतंत्र रूप से ऑडिट नहीं किया गया है। दरअसल हुआ यह कि सरकार ने वितरण प्रणाली (पाइपलाइन) में बदलाव किया, उसके जरिये प्रवाहित होने वाली मात्रा सीमित कर दी, और फिर इस बदलाव को ‘कल्याणकारी’ कदम के रूप में पेश कर दिया।
कर्ज जो छिपाए न छिपे
जब मई 2014 में नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभाली, तब भारत का कुल राष्ट्रीय कर्ज, जो पिछले 67 सालों में जवाहरलाल नेहरू से लेकर अब तक के सभी प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में जमा हुआ था, लगभग 55 लाख करोड़ रुपये था। मार्च 2026 तक, यह आंकड़ा बढ़कर 197 लाख करोड़ रुपये हो गया! 2026-27 के केन्द्रीय बजट के अनुमान के अनुसार, मार्च 2027 तक यह आंकड़ा 218.63 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा।
महज एक दशक में ही, मोदी सरकार ने भारत के राष्ट्रीय कर्ज में लगभग 150 लाख करोड़ रुपये जोड़ दिए हैं, जो कि बीते लगभग सात दशकों में सभी पिछली सरकारों द्वारा मिलकर जमा किए गए कुल कर्ज से भी लगभग 2.5 गुना ज्यादा है। अब भारत हर साल लगभग 11 लाख करोड़ रुपये सिर्फ ब्याज के तौर पर चुकाता है, और अब हर भारतीय नागरिक पर औसतन 1.5 लाख रुपये से ज्यादा का कर्ज है।
इसमें एनएचएआई, इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉरपोरेशन, पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन और फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया की ऑफ-बजट देनदारियां शामिल नहीं हैं, जिनका अनुमान 20-25 लाख करोड़ रुपये है। ये देनदारियां आधिकारिक राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) विवरणों में दिखाई नहीं देतीं।
अब अगर 1.6 लाख करोड़ रुपये की स्थगित सब्सिडी, जैसा कि भाजपा तर्क देती है, भारत के भविष्य पर एक अवांछित-अनुचित बोझ थी, तो फिर इस 150 लाख करोड़ रुपये के नए कर्ज को हम क्या कहेंगे? यह कर्ज गरीबों को सब्सिडी देने के लिए नहीं, बल्कि शासन के एक ऐसे मॉडल को वित्तपोषित करने के लिए जमा किया गया है, जो नागरिकों-उपभोक्ताओं से संसाधन निचोड़ता है, सार्वजनिक संपत्तियों को गिरवी रखता है और फिर इसे ‘विकास’ का नाम दे देता है।
(गुरदीप सिंह सप्पल कांग्रेस कार्यसमिति के स्थायी आमंत्रित सदस्य हैं)
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