खामोश संकटः तपता दक्षिण, अल्ट्रा वायलेट किरणों का कहर, नहीं चेते तो...
दक्षिण भारत में बढ़ती गर्मी, प्रदूषण और सतह पर ओजोन की मात्रा में वृद्धि एक घातक 'रासायनिक मिश्रण' का निर्माण कर रही है।

भले ही उत्तर और मध्य भारत में अप्रैल में बेमौसम बरसात हुई, दक्षिणी हिस्सा इन दिनों गंभीर पर्यावरणीय चुनौती का सामना कर रहा है। तीखी गर्मी के साथ आर्द्रता और खतरनाक पराबैंगनी, यानी अल्ट्रा वायलेट किरणों का मिश्रण गंभीर स्वास्थ्य आपातकाल की ओर इशारा कर रहा है।
केरल में यूवी इंडेक्स ज्यादा होने की वजह से केरल राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (केएसडीएमए) ने छह जिलों में सूरज की सीधी किरणों से बचने के लिए चेतावनी जारी की है। नवीनतम डेटा बताते हैं कि राज्य के पथानामथिट्टा, अलाप्पुझा, कोट्टयम, इदुक्की, कोल्लम और पलक्कड़ में यूवी इंडेक्स स्तर 8 है जबकि तिरुवनंतपुरम और कोच्चि में यह 10 और 11 के बीच है जो स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है।
केएसडीएमए की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य के लगभग अस्सी प्रतिशत हिस्सों में विकिरण का स्तर सुरक्षित सीमा से कहीं अधिक है। अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि इन इलाकों में सूरज की सीधी किरणों से धूप से झुलसने, चमड़े के रोग और आंखों को नुकसान हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मानकों के अनुसार, 11 से ऊपर का सूचकांक 'चरम श्रेणी' में माना जाता है, जिसका मतलब है कि बिना सुरक्षा के धूप में मात्र दस मिनट रहने पर भी त्वचा की कोशिकाओं को स्थायी नुकसान पहुंच सकता है।
कर्नाटक की राजधानी और कभी 'गार्डन सिटी' कहे जाने वाले बेंगलुरु में इस बार यूवी इंडेक्स 13 तक दर्ज किया गया है। अप्रैल के तीसरे हफ्ते के सिर्फ दो दिनों में जिस तरह यह 10 से 13 तक पहुंचा है, वह गंभीर चिंता का कारण है। तमिलनाडु के तटीय शहरों और विशेषकर चेन्नई में यूवी स्तर 11 के पार पहुंच गया है। चेन्नई में तो दोपहर में यूवी लेवल 13 तक पहुंच जा रहा है।
भारत भर के अन्य प्रमुख शहरों की तुलना में चेन्नई में यूवी का स्तर पूरी स्थिति को सामने लाता है। इससे स्थानीय लोगों के साथ बाहर से आने वाले लोगों को स्थानीय स्तर पर सूरज के ताप की हालत को समझने और उसके अनुरूप अपनी सुरक्षा के लिए एहतियाती कदम उठाने में मदद मिलेगी।
भारत का दक्षिणी हिस्सा समुद्र के किनारों के करीब है और यह अपनी सुखद जलवायु, मानसूनी हरियाली और समृद्ध जलस्रोतों के लिए जाना जाता रहा है। तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल में इस साल गर्मी ने न केवल समय से पहले दस्तक दी है, बल्कि इस बार इसमें तेजी भी ज्यादा है। दक्षिण भारत की भौगोलिक स्थिति इसे सूर्य की किरणों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती है। भूमध्य रेखा से निकटता और कई क्षेत्रों की ऊंचाई के कारण यहां विकिरण का प्रभाव उत्तर भारत की तुलना में अधिक तीव्र होता है।
चेन्नई के पल्लीकरनै जैसे क्षेत्रों में जल निकायों के सूखने से परावर्तन का प्रभाव बढ़ा है, जिससे स्थानीय स्तर पर विकिरण की तीव्रता और घातक हो गई है। दरअसल, जलवायु परिवर्तन का एक काला पक्ष सतही ओजोन का बढ़ता स्तर है। ओजोन की जो परत समताप मंडल में हमारी रक्षा करती है, वही जब बढ़ती गर्मी और प्रदूषण के कारण जमीन के पास बनती है, तो जहर बन जाती है। दक्षिण भारत के महानगरों में बढ़ती गाड़ियों की संख्या और उच्च तापमान ने मिलकर एक ऐसी रासायनिक प्रयोगशाला बना दी है, जहां सूरज की तीव्र किरणें नाइट्रोजन ऑक्साइड के साथ क्रिया कर ओजोन पैदा कर रही हैं। यह गैस श्वसन तंत्र पर सीधा प्रहार कर रही है, जिससे अस्थमा और फेफड़ों की सूजन के मामले दक्षिण भारत के शहरों में बीस प्रतिशत से अधिक बढ़ गए हैं।
इस बार गर्मी अपने साथ पराबैंगनी विकिरण और सतही ओजोन का ऐसा घातक मेल लेकर आई है, जिसने स्वास्थ्य संबंधी गंभीर संकट उत्पन्न कर दिया है। तीव्र यूवी विकिरण सीधे डीएनए को नुकसान पहुंचाता है, जिससे चमड़े के कैंसर के शुरुआती लक्षणों में वृद्धि देखी गई है। इसके अलावा, आंखों की पुतलियां इन किरणों के प्रति अत्यंत संवेदनशील होती हैं, जिससे कम उम्र में ही मोतियाबिंद और दृष्टिहीनता का खतरा बढ़ रहा है। अत्यधिक विकिरण शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर देता है। इस त्रासदी की सबसे बड़ी मार उन लोगों पर पड़ रही है जो समाज के अंतिम पायदान पर खड़े हैं। निर्माण कार्य में लगे श्रमिकों और रेहड़ी-पटरी वालों के पास गर्मी से बचने का कोई विकल्प नहीं है। कर्नाटक और तमिलनाडु के भीतरी इलाकों में हीट स्ट्रोक के साथ-साथ गंभीर निर्जलीकरण के कारण गुर्दे की बीमारियों के मामले बढ़ रहे हैं।
इस वजह से दक्षिण भारत की समृद्ध जैव विविधता भी प्रभावित हो रही है। तमिलनाडु और कर्नाटक के प्रमुख फसल क्षेत्रों में यूवी किरणों के कारण पौधों की प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया बाधित हो रही है, जिससे पैदावार में गिरावट आ रही है। विशेषकर धान और दलहन की फसलें इस विकिरण के प्रति अधिक संवेदनशील पाई गई हैं। तटीय इलाकों में बढ़ता तापमान और विकिरण समुद्री पारिस्थितिकी को भी बिगाड़ रहा है। उथले पानी में रहने वाले प्लवक, जो समुद्री खाद्य श्रृंखला का आधार हैं, नष्ट हो रहे हैं, जिसका सीधा असर मछलियों की संख्या और मछुआरों की जीविका पर पड़ रहा है। पल्लीकरनै जैसी आर्द्रभूमि का विनाश इस संकट को और गहरा करता है। 165 जलस्रोतों का गायब होना केवल पानी की कमी नहीं है, बल्कि उस स्थानीय शीतलन प्रणाली का अंत है जो तापमान को नियंत्रित रखती थी।
इस तरह से जब एक बार पारिस्थितिक तंत्र की सहने की क्षमता समाप्त हो जाती है, तो उसे पुनर्जीवित करना लगभग असंभव होता है। ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम जैसी सरकारी पहलें कार्यान्वयन के स्तर पर लड़खड़ा रही हैं। इस भयावह स्थिति से निपटने के लिए हमें युद्ध स्तर पर काम करने की जरूरत है। जैसे हम तापमान मापते हैं, वैसे ही प्रत्येक शहर में यूवी इंडेक्स की रीयल-टाइम जानकारी देने वाली व्यवस्था होनी चाहिए। शहरों में कंक्रीट के विस्तार को रोककर घने वनों का विकास करना होगा जो प्राकृतिक रूप से ओजोन के प्रभाव को कम कर सकें। दक्षिण भारत के राज्यों को विशेष सुरक्षा कानून लाने चाहिए, जिसके तहत दोपहर के समय खुले में शारीरिक श्रम को प्रतिबंधित किया जाए।
दक्षिण भारत आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है। कर्नाटक की सिलिकॉन वैली से लेकर तमिलनाडु के तटों और केरला के शांत बैकवाटर तक, गर्मी और विकिरण का यह जाल हम सबकी सामूहिक विफलता का परिणाम है। यदि हमने अपनी विकास योजनाओं में प्रकृति के संरक्षण, जल निकायों की रक्षा और प्रदूषण नियंत्रण को प्राथमिकता नहीं दी, तो आने वाले समय में दक्षिण की यह गौरवशाली धरती इंसानी निवास के लिए अत्यंत कठिन हो जाएगी। यह समय केवल चिंता करने का नहीं, बल्कि कठोर और त्वरित नीतिगत बदलावों का है ताकि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित और रहने योग्य पर्यावरण सौंप सकें।
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