किसान आंदोलन के साथ समाज सुधार कार्य भी हो, आजादी की लड़ाई से मिलती है सीख, जब बड़े स्तर पर ऐसे काम हुए

स्वतंत्रता सेनानियों ने भलीभांति समझ लिया था कि आजादी का आंदोलन तो लंबा चलेगा, कभी उभार आएगा तो कभी उतार भी आ सकता है। ऐसे में कम सक्रियता के समय में भी रचनात्मक कार्यों से लोगों का उत्साह बना रहता था और साथ ही अनेक सार्थक कार्य भी होते रहते थे।

फोटोः GettyImages
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भारत डोगरा

जब देश में कोई बड़ा आंदोलन होता है तो लोगों में ऐसा नया उत्साह और उमंग आता है कि जिनके वेग में समाज-सुधार के अनेक कार्य भी तेजी से आगे बढ़ सकते हैं। जो कार्य पहले कठिन लगते थे वे जन साधारण में आए उत्साह और पवित्र भावों के कारण अधिक आसान हो जाते हैं।

आजादी की लड़ाई के समय यह बहुत खूब देखा गया था। जो मुख्य लड़ाई थी वह तो आजादी प्राप्त करने के लिए थी, पर इसके कारण जो पवित्र भावनाएं और उत्साह-उमंग उत्पन्न हो गए थे, उसके कारण समाज-सुधार की भी महान संभावनाएं उत्पन्न हो गई थी। इस स्थिति को महात्मा गांधी और अनेक अन्य स्वतंत्रता सेनानियों ने भली-भांति समझा।

अतः आजादी की मुख्य लड़ाई के साथ अनेक अन्य रचनात्मक कार्यों की योजना बनाई गई, जैसे- शराब और नशे के विरुद्ध बहुत व्यापक कार्यक्रम, खादी, सभी धर्मों में आपसी सद्भावना और एकता का प्रसार, सभी तरह के भेदभाव और छुआछूत को दूर करना, महिला-जागृति, स्वच्छता अभियान आदि। इन सभी रचनात्मक कार्यों से समाज को बहुत लाभ मिला। इनके माध्यम से बहुत से नए लोग भी आजादी की लड़ाई से जुड़े। जिन दिनों आजादी का कोई बड़ा आंदोलन नहीं चल रहा होता था, उन दिनों के लिए भी लोगों को सार्थक कार्य मिले।

स्वतंत्रता सेनानियों ने भली-भांति समझ लिया था कि आजादी का आंदोलन तो लंबा चलेगा, कभी उभार आएगा तो कभी कुछ उतार भी आ सकता है। कम सक्रियता के समय में भी रचनात्मक कार्य निरंतरता से चल सकते थे। इस तरह पूरे आंदोलन में निरंतरता आई। हर समय लगता था कि कुछ न कुछ सक्रियता है। लोगों का उत्साह बना रहता था। साथ में अनेक सार्थक कार्य भी होते रहते थे। इतना ही नहीं शराब और नशे को छोड़ने के आंदोलन जैसे सार्थक कार्यों के दौरान आंदोलन का नैतिक बल बहुत बढ़ जाता था।

किसान आंदोलन को भी आजादी के आंदोलन से सीखना चाहिए। इस आंदोलन के साथ-साथ लोगों में जो उत्साह आ रहा है, उनका नैतिक बल बढ़ा रहा है, उसका सार्थक उपयोग समाज-सुधार के कार्यों को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए करना चाहिए। शराब और हर तरह के नशे के दुष्परिणामों का प्रचार व्यापक स्तर पर होना चाहिए। जो लोग शराब का सेवन करते हैं, उन्हें प्रेरित करना चाहिए कि वे अपनी इच्छा से शराब को छोड़ दें। इसके लिए उन्हें परिवार और मित्रों द्वारा प्रोत्साहित करना चाहिए।

इसके साथ गांव वासियों को बढ़ती संख्या में ऐसे मांग-पत्र पर हस्ताक्षर करने चाहिए कि हमारे गांव से या उसके आसपास से शराब का ठेका हटा दिया जाए और इस मांग पत्र को सरकार को भेज देना चाहिए। साथ ही गांव वासियों को मीटिंग कर यह शपथ लेनी चाहिए कि हमारे गांव में किसी भी तरह की कोई भी महिला विरोधी हिंसा घर या बाहर में नहीं होगी।

समाज-सुधार का तीसरा प्रमुख मुद्दा यह होना चाहिए कि गांव में धर्म, जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव को समाप्त किया जाएगा और पूरे गांव-समुदाय की आपसी एकता को बढ़ाया जाएगा। जो तत्व तरह-तरह की फूट डालने की कोशिश करते रहते हैं, उन्हें नियंत्रित कर ऐसे कुप्रयासों पर रोक लगाई जाएगी।

गांव का बहुत सा पैसा रिश्वत के रूप में बर्बाद होता है। गांवों में मीटिंग कर सामूहिक निर्णय लेना चाहिए कि गांव से रिश्वत वसूलने का विरोध मिलकर किया जाएगा और भ्रष्टाचार पर रोक लगाई जाएगी। गांव के विकास कार्यों के लिए जो धन आता है, वह सही ढंग से, ईमानदारी से, सही उद्देश्य के लिए खर्च किया जाए, इसके लिए गांववासी प्रयास करेंगे। इसके लिए आरटीआई, सूचना तकनीक, सामाजिक अंकेक्षण या सोशल ऑडिट का उपयोग करेंगे, जनसुनवाईयों का आयोजन करेंगे ताकि सबकी उपस्थिति में, पारदर्शी तौर-तरीकों से, सच्चाई सामने आ जाए। जिन्होंने गलती की है, गांव के विकास का पैसा हड़पा है, उन्हें गलती सुधारने का एक अवसर भी दिया जाएगा।

गांव में आपसी कलह से, गुटबाजी से कभी-कभी बड़े झगड़े हो जाते हैं, मुकदमेबाजी हो जाती है। कभी-कभी तो एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी में भी झगड़ा चलता रहता है। इसमें सबका नुकसान ही है। अतः दोनों पक्षों को राजी करना चाहिए कि वे गांव के समझदार व्यक्तियों, बुजुर्गों की सहायता से अपने विवाद को सुलझा लें और मुकदमेबाजी, मनमुटाव, हिंसा से अपने को और अपने परिवारों को बचा लें।

दहेज-प्रथा का अभिशाप अभी तक चल रहा है। विवाह-शादियों जैसे अवसरों पर होने वाली अन्य फिजूलखर्चियां भी बढ़ती ही जाती हैं। इन्हें नियंत्रित करना बहुत जरूरी है, अन्यथा इनका बोझ किसानों पर बहुत भारी पड़ेगा। ‘सादा जीवन उच्च विचार’ के सिद्धांत को नए सिरे से प्रतिष्ठित करना, फिजूलखर्ची और उपभोक्तावाद, झूठी शान-शौकत के दिखावे से बचना और अपने अच्छे कार्यों से ही अपनी पहचान बनाना कितना महत्त्वपूर्ण है, यह संदेश समाज में निरंतरता से पंहुचना चाहिए।

महात्मा गांधी के खादी और स्वदेशी के सिद्धान्तों का जो मूल उद्देश्य है, वह आज भी सार्थक है। मूल संदेश यह है कि जिन वस्तुओं का उत्पादन स्थानीय स्तर पर भलीभांति संभव है, उसे हम स्थानीय आत्मनिर्भरता बना कर ही प्राप्त करें। इस तरह स्थानीय स्तर पर बेहतर स्वास्थ्य और गुणवत्ता के उत्पाद भी मिल सकेंगे। पर आज झूठी शान-शौकत की दौड़ में इस सिद्धान्त को प्रायः भुला दिया गया है। यदि आज भी रचनात्मकता से इसे अपनाया जाए तो बहुत से नए रोजगारों का सृजन स्थानीय स्तर पर हो सकता है और खेती से अधिक न्यायसंगत आजीविका प्राप्त करने के साथ ग्रामीण उद्यमियों, युवाओं और महिलाओं को अपने घर के पास ही नए विविध तरह के रोजगार भी मिल सकते हैं।

अध्ययन की प्रवृत्ति भी टीवी और यू-ट्यूब-नैटफ्लिक्स के दौर में कम होती जा रही है। अच्छा साहित्य गांववासियों को मिलता रहे, इसके लिए लाईब्रेरियों की स्थापना और संचालन बहुत आवश्यक है। इसमें सभी आयु-वर्गों के लिए, शिक्षा के विभिन्न स्तरों के अनुकूल सभी के लिए श्रेष्ठ साहित्य उपलब्ध होना चाहिए।

कुछ समय पहले एक गांव के युवाओं ने कहा कि वे लाईब्रेरी और खेल-कूद की सामग्री लेना चाहते हैं और इसके लिए जरूरी धन-राशि कोई दे नहीं रहा है। तब गांव की मीटिंग बुलाई गई और यह हिसाब लगाया गया कि प्रति परिवार शराब-सिगरेट, गुटके आदि पर प्रति वर्ष कितना खर्च होता है। वह जोड़ा गया तो गांववासी स्वयं हैरान रह गए, क्योंकि यह तो एक नहीं कई गांवों में लाईब्रेरियां और खेल-कूद का सामान खरीदने से भी अधिक राशि थी।

इस तरह बुरी आदतों को छोड़कर न केवल अपनी और अपने परिवार की स्वास्थ्य की स्थिति और आर्थिक स्थिति को बेहतर किया जा सकता है, अपितु इस तरह जो बचत होती है, उसके एक भाग को पूरे गांव की भलाई के कार्यों में और किसानों और मजदूरों के आंदोलनों की सहायता के लिए भी दिया जा सकता है।

दूर की बात जाने दें, हाल के समय की ही बात करें तो भी देश में शराब और नशे के विरोध, भेदभाव और महिला हिंसा के विरोध के अनेक सार्थक प्रयास होते रहे हैं। अब किसान आंदोलन के कारण ऐसा माहौल अनेक गांवों में बनता जा रहा है कि लोग इन समाज-सुधार प्रयासों के लिए अधिक उत्साह से तैयार हो सकते हैं। अतः इस अवसर का समुचित उपयोग करते हुए किसान आंदोलन और अन्य समझदार व्यक्तियों को चाहिए कि वे विशेषकर महिलाओं और युवाओं के नेत्तृत्व में इन समाज-सुधार प्रयासों को तेजी से आगे बढ़ाएं।

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