मृणाल पाण्डे का लेख: कुछ सवाल अनदेखे अनजाने, इंटरनेट की बाबत   

जब घोड़ा अस्तबल से भाग निकला, तो सरकारें पूछ रही हैं कि कौन सी मेगा कंपनी ने कितना निजी डाटा चोरी छिपे दुहा और किस तरह? और किस-किस ने उसे खरीद कर किस तरह के कामों के लिये इस्तेमाल कर कितना पैसा माया?

फोटो : सोशल मीडिया
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मृणाल पाण्डे

अंग्रेज़ी का एक शब्द है : ईडियट ! मतलब बेवकूफ ! यह लफ्ज़ ग्रीक भाषा से अंग्रेज़ी की मार्फत हमारे यहाँ आया है | इसका मूल मतलब था गणराज्य का एक ऐसा आम नागरिक जिस बेचारे की ज्ञान और सूचना तक पहुँच न हो। इस परिभाषा के अनुसार विश्वव्यापी नेट की मुफ्त की ज्ञानगंगा में दशक से अधिक समय से नहाते आये हममें से अधिकतर खुद को फन्ने खाँ समझते आये लोग ईडियट हैं। यानी न तो वे इंटरनेट की मूल अल्गोरिद्मिक भाषा से वाकिफ हैं, और न ही उसके फितरतन शैतानी सह उत्पाद, सोशल मीडिया की नित नई तिकड़मबाज़ी (अनदेखे अनजान देशों में रजिस्टर कराये गये केंद्रों से फेसबुक जैसे साझा मंचों पर छोड़ी जा रही फेक न्यूज़,गोपनीय सरकारी - गैरसरकारी डाटा की चोरी और ई- बैंक अकाउंटों के हैकिंग से किये फर्ज़ीवाडों) से।वजह है कि हमने इस माध्यम का इस्तेमाल करते समय इसकी संभावनाओं को ले कर कई तरह के ज़रूरी सवाल नहीं पूछे और न ही फेसबुक अमेज़न या अन्य कंपनियों की चुपचाप सेटिंग्स बदलने के साथ बदलती कार्यप्रणाली या नीयत की बाबत जानकारियाँ हासिल कीं।

इस सदी के अंत में जब इन कंपनियों ने हमको कई तरह के रोचक ज्ञान इंजन और उनको गतिशील बनाने वाले एप्स फोकट में थमाये, तो हममें से अधिकतर ने रातोंरात अपने निजी डाटा के इस्तेमाल की इजाज़त इन कंपनियों को दे दी। और, खुद मुफ्त की जानकारियों और आभासी मीडिया विश्व को धड़ल्ले से इस्तेमाल करते रहे। अमरीका में 2011 में ही फेसबुक की कुछ गतिविधियों को छलमय बताते हुए उनको कमर्शियल प्रयोग के लिये चुपचाप उपलब्ध कराने की बाबत कुछ ग्राहकों ने फेडरल ट्रेड कमीशन से शिकायतें की थीं, पर दुनिया के शेष यूज़र्स ने इसका खास नोटिस नहीं लिया।

अब खबर आ रही है कि फेसबुक ने एक खास एप मुफ्त में बांट कर एक सूचना प्रतियोगिता ऐसी कराई, जिसके तहत 354 यूज़र्स ने आसानी से साढ़े पाँच लाख अन्य भारतीय यूज़र्स का डाटा कंपनी को मुहैया करा दिया। यह डाटा उसने अन्य लोगों के अलावा केंब्रिज एनालिटिका नामक कंपनी को बेचा, जिसने स्वीकार किया कि उसने भी मुनाफा लेकर उन तमाम निजी जानकारियों को कई राजनैतिक दलों को उपलब्ध कराया है। और यह काम भारत ही नहीं, यूरोप में भी किये जाने की खबर है। जर्मनी में सिर्फ 35 यूज़र्स ने एक लाख से अधिक लोगों का निजी डाटा कंपनी को दिया, जिसे उसने विज्ञापन कंपनियों और राजनैतिक ग्राहकों को बेचा। जर्मनी ने यूरोपीय साझा संघ में इसके खिलाफ गुहार लगा भी दी है। म्यांमार की खबर है कि वहाँ भी सोशल साइट्स और फेसबुक का यूज़र्स ने राजनैतिक और जातीय दुर्भावना फैलाने के लिए प्रयोग कर रोहिंग्या अल्पसंख्यकों का नरसंहार करा दिया।

और अब, जबकि घोड़ा अस्तबल से भाग निकला है, सरकारें उस पर ताला डालने की योजनायें बनाती हुई पूछ रही हैं कि कौन सी मेगा कंपनी ने कितना निजी डाटा चोरी छिपे दुहा और किस तरह? और किस किस ने उसे उससे खरीद कर किस तरह के कामों के लिये इस्तेमाल कर कितना मुनाफा कमाया? दिक्कत यह भी है कि इस बिंदु तक आते आते यह सब कंपनियां विश्व अर्थव्यवस्था की ताकतवर हस्तियां बन गईंं और उनके शेयर औंधे मुँह गिरने का मतलब है विश्वबाज़ारों में हडकंप !

पर इन आर्थिक सवालों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक और नैतिक सवाल हैं। सोशल मीडिया की बढ़ती पकड़ और पुराने मीडिया की नेट सूचना तकनीकी पर निर्भरता के चलते लोकतंत्र की बुनियाद यानी सोच विचार और फैसला लेने की आज़ादी क्या अब वैसी रह सकती है जैसी हुआ करती थी ? कई देशों से प्रमाण मिल रहे हैं कि करोड़ों ग्राहकों की जीवनशैली, पसंद नापसंद और उनकी रुझान को कंपनियां आज इस दामी डाटा की मदद से पूरी तरह कैलकुलेट करने के बाद उनको इस तरह से तटबंध बना कर खास चैनलों में बहने को मजबूर कर सकती हैं जो ग्राहकों की जानकारी के बिना उनको खास उत्पादों, सूचनाओं की तरफ हाँक चलें | जब जब हम एप डाउन लोड करते हैं, हमसे तरह तरह की स्वीकृतियां मांगी जाती हैं, जिन पर हम बटन दबा कर स्वीकृति दे देते हैं, बिना समझे कि हम कहीं अपनी निजता और अभिव्यक्ति के हक तो कुर्बान करने नहीं जा रहे ?

पुराने राजनेता और मीडियाकार खुद को मानव स्वभाव, पेड न्यूज़ या चुनावी चंदों की अंतर्कथाओं और वोटबैंकों के निर्माण का भारी ज्ञाता मानते, बताते आये हैं, पर हममें से भी अधिकतर आज फेक न्यूज़ और असल न्यूज़ में साफ साफ भेद करने के क्षेत्र में ईडियट ही साबित हुए हैं।

अभी कल तक भारत को स्मार्ट नेशन बनाने, कागज़ी कैश को खत्म कर ई-मनी को करंसी बनाने का सपना बेचने वाले हमारे जो राजनेता तथा भारतीय सिलिकॉन वैली के महामहिम व मुगल ज़ुकरबर्ग या गेट्स की आगमनी पर पलक पाँवड़े बिछा रहे थे, आज फेसबुक के राज़ खुलने और भारतीय बैंकों से लिये लोन ई-बैंकिंग की मार्फत बड़े हीरा व्यापारियों, कार्पोरेट्स द्वारा सात समंदर पार भेज दिये जाने के ब्योरों से पूरी तरह सकते में हैं।

जिन 18 बरस के छात्रों का वोट बैंक उनमें से कई नेता तरह तरह के जोशीले भाषणों से न्योत पोस रहे थे वे भी नेट से लीक कराये गये सी बी एस ई के पेपर देशभर में बेचे जाने की घटना के बाद अचानक पा रहे हैं कि स्मार्ट दुनिया के स्मार्ट नये खतरों का कोई भरोसेमंद तोड़ इस समय उनके पास नहीं है, सिवा इसके कि छात्रों को बेतरह नाराज़ करते हुए वह पेपर दोबारा परीक्षा के लिये बनवाये जायें | तब भी समय पर साइटें खुल जायेंगी, कनेक्टिविटी अचानक दम न तोड़ देगी इसका कोई भरोसा नहीं |

अंतिम बात नई पीढ़ी की बाबत, जो ज़ुकरबर्ग की बनाई फेसबुक की दुनिया में गढ़ी गई दोस्तियों, चित्रों, साझा सेल्फियों और लाइक्स को ही असली मानवीय दोस्तियों, रिश्तों और आपसी सामुदायिक बतकही का पर्याय बनाती जा रही है। वे इसे भले ही कूल मानें, लेकिन समझदार वयस्क लोगों के लिये युवा पीढ़ी के बड़े और शिक्षित समूह के बीच मानवीय दायरों का इस तरह सिकुडना और मित्रता या वार्तालाप का निजी और अंतरंग के बजाय मशीनी और छिछोरा बन कर रह जाना, बच्चों और लोकतंत्र की बाबत चिंता का सबब बनना चाहिये।

अगर आनेवाले समय में कृत्रिम बुद्धि (आर्टिफिशल इंटेलिजेंस) पूरी तरह इस क्षेत्र को चलाने लगे तो बात और है, पर वह कल हमने नहीं देखा। आज की तारीख में निजी या राष्ट्रीय जीवन में अल्गोरिद्म से बनी, निकली और भेजी जा रही सूचना कभी भी गहरे ज्ञान का विकल्प नहीं बन सकती, क्योंकि जीवन अनेक रंगों और परतों से बनता है। क्या फेसबुक पर पंद्रह सौ दोस्त किसी के निजी जीवन की खुशी या अवसाद उस तरह बांट सकते हैं, जैसे पंद्रह मानवीय मित्र और रिश्तेदार ? फेक न्यूज़ से दंगे करवा कर और किसी का नाम, बदनाम कर क्या अनंतकाल तक चुनाव जीते जा सकते हैं ? जनता को उल्लू बनाया जा सकता है ? हम नेट इडियट्स अभी भी इन सवालों को लेकर विचलित नहीं हुए, नहीं चेते तो बहुत देर हो जायेगी |

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