सोनम वांगचुक और व्यवस्था की चुप्पी

जेल में गुजर चुका है लद्दाख की रक्षा के लिए जीवन समर्पित करने वाले पर्यावरणविद सोनम वांगचुक का सौ दिन से ज्यादा समय। बड़ा सवाल यह है कि क्या नया साल वार्ता और रिहाई की ओर बढ़ेगा या ज्यादा अराजकता की ओर जाएगा?

सोनम वांगचुक को राजस्थान की जोधपुर जेल में रखा गया है
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हरजिंदर

हिमालय के इस सर्द मौसम में सोनम वांगचुक को लेकर बेचैन चुप्पी है। लद्दाख के जिस नाजुक क्षेत्र की रक्षा के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था, उससे बहुत दूर जोधपुर सेंट्रल जेल में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी एनएसए के तहत बंदी बने हुए उन्हें 100 दिन से ज्यादा का समय गुजर चुका है। 

सितंबर 2025 में जब उन्हें गिरफ्तार किया गया था, दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर राज्यों की राजधानियों तक में खासा हंगामा हुआ था। पर अब सब इसे लगभग भूल चुके हैं। भारत में जहां प्रतिरोध की आवाज लगातार दबती जा रही है, सरकार को चुनौती देने वालों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। ऐसे में भला कौन विरोध की हिम्मत करेगा।

लेह में बढ़ते तनाव के बीच 24 सितंबर को जब सोनम वांगचुक को गिरफ्तार किया गया था, तब लद्दाख की स्वायत्तता और उसे संविधान की छठीं अनुसूची में शामिल करने की मांग पर सोनम वांगचुक की अगुवाई में एक तरफ अनशन चल रहा था तो दूसरी तरफ लेह के नौजवान इन्हीं मांगों को लेकर प्रदर्शन पर निकल पड़े। इस प्रदर्शन के दौरान हिंसा हो गई, जिसे प्रतिक्रिया देते हुए वांगचुक ने तुरंत ही अनशन वापस ले लिया, लेकिन सरकार ने 'शांति-व्यवस्था' के लिए खतरा बताते हुए उन्हें एनएसए के तहत गिरफ्तार कर लिया। 

इसके तुरंत बाद पूरा देश वांगचुक के पीछे खड़ा दिखाई दिया। दिल्ली में छात्रों ने उनकी रिहाई की मांग की, मुंबई और बेंगलुरु में कैंडिल लाइट मार्च निकाले गए। सिनेमा जगत से पर्यावरण कार्यकर्ताओं तक ने इसका विरोध किया। वांगचुक के जीवन पर बनी फिल्म थ्री ईडियट के कारण भी वह चर्चा में थे, जिसमें उनकी भूमिका आमिर खान ने निभाई थी। लेकिन दिसंबर आते-आते सब ठंडा पड़ गया। मीडिया का ध्यान भी दुनिया की दूसरी दुविधाओं की ओर मुड़ गया।

अब सारा जिम्मा वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमों के कंधों पर था। नौकरशाही की सारी परेशानियों से जूझते हुए वह दिल्ली से जोधपुर के बीच दौड़-भाग करती रहती हैं। जेल में आगंतुकों को हफ्ते में दो बार एक-एक घंटे के लिए ही मिलने की इजाजत है। परेशान लेकिन अथक इस काम में जुटी गीतांजलि ने को बताया, "मैं तकरीबन हर बार जाती हूं, सिवाय उसके जब किसी और को उनसे मिलना होता है।"

फिर उन्हें हर तारीख पर सुप्रीम कोर्ट में भी हाजिर होना पड़ता है, जहां वांगचुक की गिरफ्तारी पर चल रही सुनवाई दुखद रूप से धीमी है। वह कहती हैं, "मुझे लगता है कि इस बार तो इस मामले पर आर्ग्यूमेंट शुरू हो जानी चाहिए। अगर नहीं होती तो हमें कुछ बड़ा करना होगा।"


उधर लेह की ऊंचाई वाली बर्फीली घाटी में लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग में लगी संस्था लेह एपेक्स बाॅडी पूरी कोशिश में है कि मुद्दा ठंडा न पड़े। संस्था के सह-अध्यक्ष सेरिंग दोरजे ने फोन पर बताया, "हमारे लिए मुद्दा सिर्फ वांगचुक का नहीं है, 24 सितंबर की हिंसा के लिए दो अन्य कार्यकर्ता भी जेल में हैं। हम तीनों को रिहा कराने की लड़ाई लड़ रहे हैं।"

उनका कहना है कि लद्दाख में इस समय माहौल अच्छा नहीं है- "हर तरफ सुरक्षा बलों की भारी तैनाती है। हमारे आवागमन और जमा होने पर पाबंदी है। एक डर यह भी है कि हम कोशिश करें और फिर हिंसा न हो जाए। इससे लद्दाख की समस्या बढ़ेगी ही। लेकिन हम हमेशा के लिए शांत भी नहीं रह सकते। जल्द ही कुछ तो करना ही होगा।" दोरजे जानबूझकर की जा रही राजनीतिक देरी की ओर भी ध्यान दिलाते हैं। वह कहते हैं, "लद्दाखी नेताओं से बात न करना केन्द्र सरकार की रणनीति लगती है। उसे लगता है दबाव के कारण लोग एक अस्वीकार्य चीज को भी स्वीकार कर लेंगे।"

लेह एपेक्स बाॅडी और कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस ने एक महीने पहले अपने प्रस्ताव का मसौदा केन्द्र को सौंपा था जिसमें कहा गया था कि या तो लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाए या फिर उसे विधानसभा वाला केन्द्र शासित प्रदेश बनाया जाए। वह बताते हैं, "हमें यह आश्वासन दिया गया था कि बातचीत कुछ ही दिनों में शुरू होगी। हमें उम्मीद थी कि संसद के सत्र और लद्दाख के परंपरागत पार्व लोसर के बाद वार्ता शुरू होगी। सत्र और पर्व दोनों ही गुजर गए, कुछ नहीं हुआ। यह जानबूझ कर किया जा रहा है।"

इस बार लोसर में हमेशा वाला उत्साह नहीं था- समारोह के बजाय औपचारिकता थी। लोगों के मिजाज की असहजता को भांपते हुए लद्दाख बुद्विष्ट एसोसिएशन ने इसे चुपचाप ही मनाने का फैसला किया। वह रौनक जो इस पर्व की पहचान थीं, इस बार नदारद थी। जब तक समस्या का समाधान नहीं हो जाता, माहौल शायद ऐसा ही रहे।

सोनम वांगचुक की कहानी एक आदर्श के सत्ता से टकराने की कथा है। इस दुर्गम क्षेत्र के एक गांव उलीटोक्पो में 1966 में पैदा हुए वांगचुक इलाके की जरूरतों के हिसाब से पहले इंजीनियर बने, फिर शिक्षक और फिर समाज सुधारक बन गए। हिमालयी क्षेत्र में परंपरागत स्कूली शिक्षा की व्यवस्था से उनका मोहभंग हुआ तो 1988 में उन्होंने स्टूडेंट्स एजूकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख नाम की संस्था की नींव रखी। उन्होंने लोगों की पानी की समस्या को हल करने के लिए कृत्रिम ग्लेशियर 'बर्फीले स्तूप' बनाने का तरीका खोजा जिसके लिए उन्हें 2018 में रेमोन मैगसेसे सम्मान मिला। इसके बाद पूरी दुनिया में उनकी ख्याति हुई और संयुक्त राष्ट्र ने भी उनकी तारीफ की। वह पर्यावरण बदलाव की सबसे प्रामाणिक आवाज भी बन गए। 


लद्दाख को 2019 में जब जम्मू कश्मीर से अलग किया गया, तो उनकी राजनीतिक सक्रियता शुरू हुई। सांस्कृतिक क्षरण, अबाध पर्यटन, खनन का डर और आबादी की चिंताओं वाला यह इलाका बिना विधायिका वाला एक केन्द्र शासित प्रदेश भर बनकर रह गया। इस क्षेत्र की जमीनों और संसाधनों को सांविधानिक संरक्षण मिले, इसके लिए सातवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की वांगचुक सबसे प्रमुख आवाज बन गए। इस मसले पर वह बौद्ध बहुल लेह और मुस्लिम बहुत कारगिल को भी एक साथ लाने में कामयाब रहे।

सरकार ने इन चिंताओं के लिए वार्ता के बजाय दमन का रास्ता अपनाया। अहिंसा और गांधीवादी तरीकों को अपनाने वाले वांगचुक के खिलाफ एनएसए लगाने ने कई सवाल खड़े कर दिए। इस कानून के तहत किसी को भी 'शांति व्यवस्था' के नाम पर एक साल के लिए बिना मुकदमा चलाए जेल में डाला जा सकता है। 

वांगचुक के साथ जो हुआ, उसे हम देश के लोकतांत्रिक क्षितिज संकुचित होते जाने के संदर्भ में भी देख सकते हैं। 2020-21 का किसानों का धरना जन प्रतिरोध का शिखर था। उसके बाद से देशद्रोह के मामले चलाने से लेकर निवारक जेल और इंटरनेट बंद करने तक के कदम आम हो चुके हैं। लेह में सितंबर में जो हिंसा हुई और जिसमें चार लोगों की जान गई एवं कई घायल हुए, उसके पीछे 2019 का पुनर्गठन का वादा पूरा न होने की कुंठा थी। लेकिन इसके लिए वांगचुक को जिस तरह गिरफ्तार किया गया, वह भारत की लोकतांत्रिक सेहत के ज्यादा गहरे संकट को दर्शाता है। एक ऐसा राष्ट्र जहां सांविधानिक अधिकार की मांग करने पर एक सुधारक को जेल में डाल दिया जाता है और कुछ ही समय में लोगों का ध्यान स्वंत्रता पर लगे इस आघात से हट जाता है।

2026 की शुरुआत में बड़ा सवाल यह है कि क्या नया साल वार्ता और रिहाई की ओर बढ़ेगा या ज्यादा अराजकता की ओर जाएगा? गीतांजलि अंगमो कहती हैं- "हमें अभी भी उम्मीद है कि अदालत में न्याय होगा। उम्मीद टूटी तो लद्दाख के लोग इसे कभी न भूल सकेंगे।"

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