'रणनीतिक' स्वायत्तता या रणनीतिक अलगाव?

रिश्तों को मजबूत गठबंधनों में बदल पाने में मिली नाकामी का भारत को सच में बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ा है। ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ का उसका दावा खोखला लगता है, और विदेश नीति के मामले में उसका अकेलापन एक कड़वी सच्चाई है

(बाएँ से) सऊदी अरब, पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र के विदेश मंत्री पश्चिम एशिया में जारी युद्ध को समाप्त करने के उपायों पर चर्चा करने के लिए इस्लामाबाद में मिले (Getty Images)
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गुरदीप सिंह सप्पल

कूटनीतिक विफलता का ढोल नहीं पीटा जाता। यह संयुक्त राष्ट्र में चुप्पी के रूप में, बातचीत की मेजों से अनुपस्थिति के रूप में, और उन रिश्तों के धीरे-धीरे ठंडे पड़ने के रूप में जाहिर होती है जिन्हें कभी हल्के में लिया गया होता है। एक समय ऐसा आता है, जब यह नुकसान इस कदर जमा हो चुका होता है कि साफ-साफ दिखाई देने लगता है। भारतीय कूटनीति के मामले में मार्च 2026 इसी कड़वी सच्चाई का एहसास कराने वाला साबित हुआ।

आजादी के बाद, भारत ने खुद को सबसे अहम ‘स्विंग स्टेट्स’ (निर्णायक भूमिका निभाने वाले देशों) में से एक के तौर पर, सभ्यताओं के बीच एक सेतु के तौर पर, और ‘ग्लोबल साउथ’ के स्वाभाविक नेता के तौर पर गढ़ा था। आज, उसकी सीमाओं पर उसका कोई दोस्त नहीं है; मौजूदा दौर के सबसे निर्णायक संघर्ष में वह महज एक दर्शक बनकर रह गया है; जिस महाशक्ति के साथ उसने अपने रिश्ते संवारे थे, उसी ने व्यापार के मामले में उसे दबाव में ले रखा है; और वह ‘ब्रिक्स’ गुट की अध्यक्षता कर रहा है, जिससे उसने साफ तौर पर अपनी राहें अलग कर ली हैं। नरेंद्र मोदी सरकार का, विदेश नीति का मूलमंत्र ‘रणनीतिक स्वायत्तता’, अब ‘रणनीतिक अलगाव’ जैसा ज्यादा नजर आ रहा है।

पाकिस्तान का कूटनीतिक पुनरुत्थान

यह समझने के लिए कि भारत कितना पीछे खिसक गया है, उसके सबसे बड़े विरोधी के सफर पर गौर करें। अभी हाल ही में 2018 में, पाकिस्तान फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की ग्रे लिस्ट में था। तालिबान, अल-कायदा, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े आतंकवादी फ़ंडिंग नेटवर्क को पनाह देने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने उसे सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा होना पड़ा था। उसके अधिकारियों को एक अपमानजनक 34-सूत्रीय कार्य योजना से गुजरना पड़ा था। 2009 में, पाकिस्तान ने ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआईसी) का बहिष्कार कर दिया था- जिसका वह एक संस्थापक सदस्य है, क्योंकि वह भारत के विदेश मंत्री को अबू धाबी में 57 देशों वाले उस संगठन को संबोधित करने से रोक पाने में असमर्थ था। और यह भी नहीं भूलना चाहिए कि 2011 में ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान की मिलिट्री अकादमी के एकदम करीब, एबटाबाद में रहता हुआ पाया गया था।

यह हाल के दिनों का पाकिस्तान था। लेकिन कुछ बदला। 2025 में पहलगाम हमले के बाद, पाकिस्तान को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता हासिल करने के लिए 182 वोट मिले। भारत ने इसके खिलाफ वोट दिया, लेकिन उसके साथ सिर्फ दो ही देश खड़े मिले। ऑपरेशन सिंदूर, जिसे मोदी सरकार ने पाकिस्तान के कूटनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ने के एक मौके के तौर पर पेश करने की कोशिश की थी, के बाद उनके चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में लंच पर आमंत्रित किया। और अब पाकिस्तान ही तुर्की, मिस्र और ओमान के साथ मिलकर अमेरिका-इजरायल-ईरान के बीच चल रहे युद्ध में शत्रुता को समाप्त करने की कोशिश में एक प्रमुख मध्यस्थ की भूमिका में है।


हर मेज और मंच से नदारद 

यह युद्ध वैश्विक मामलों में भारत की स्व-घोषित केंद्रीय स्थिति और उसके ‘विश्वगुरु’ होने के दावों के लिए सबसे क्रूर अग्निपरीक्षा बन गया है। ईरान के साथ भारत के हज़ारों साल पुराने सभ्यतागत रिश्ते हैं। उसने ‘इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर’ के जरिये मध्य एशिया तक पहुंचने के लिए चाबहार बंदरगाह में बड़ा निवेश किया था। अमेरिकी पाबंदियां लगने से पहले, ईरान के कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार भारत ही था। और इस सबके बावजूद, जब अमेरिका और इसराइल ने ईरान के खिलाफ अपना सैन्य अभियान शुरू किया, तो भारत न तो चिंता जताने वाली आवाजों में शामिल था, न ही उन देशों में जिन्होंने ‘सीजफायर’ (युद्धविराम) शब्द बोलने की हिम्मत की, और अब न ही वह मध्यस्थों में शामिल है। सरकार ने इसे ‘सोची-समझी चुप्पी’ कहा, लेकिन दुनिया ने इसे एक ग्राहक देश की जी-हुज़ूरी के तौर पर देखा।

यह इस तरह की पहली अनुपस्थिति नहीं है। अगस्त 2021 में जब अमेरिकी सेना अफगानिस्तान से पीछे हटी, नई दिल्ली को उसके बाद हुई बातचीत से पूरी तरह बाहर रखा गया। भारत ने पिछले कुछ सालों में युद्ध से तबाह अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में 3 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश किया था और काबुल में अपनी मजबूत राजनयिक मौजूदगी बनाए रखी थी। दूसरी ओर, पाकिस्तान युद्ध के पूरे बीस सालों के दौरान तालिबान को पनाह देता रहा, पाला-पोसा और उनके साथ बातचीत के रास्ते खुले रखे। फिर भी, बातचीत की मेज पर रूस और चीन के साथ पाकिस्तान मौजूद था; भारत नहीं।

पेंडुलम बनी विदेश नीति

एक महाशक्ति बनने की चाह रखने वाले देश के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि किसी-न-किसी सिद्धांत के लिए खड़ा रहे। इसके साझेदार और विरोधी- दोनों ही इसकी स्थिति और प्रतिबद्धताओं को समझने में सक्षम होने  चाहिए, ताकि वे उसी के अनुसार अपनी-अपनी स्थितियां तय कर सकें। पिछले लगभग पांच वर्षों के दौरान, भारत की विदेश नीति अस्पष्ट ही नहीं, एक पेंडुलम की तरह इधर-उधर डगमगाती भी रही है।

2020 की गलवान झड़प के बाद, मोदी सरकार ने चीनी ऐप्स और टेलीकॉम कंपनियों पर बैन लगा दिया था, लेकिन जब आर्थिक दबाव बढ़ा, तो उसने चुपचाप उनमें से कई बैन हटा लिए। उसने चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए एक रणनीतिक कदम के तौर पर ‘क्वाड’ समूह (जिसमें अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं) को अपनाया, लेकिन जब इस समूह ने सुरक्षा के मामले में ज्यादा सख्त रुख अपनाया, तो सरकार ने अपनी असहजता जाहिर कर दी। यूक्रेन पर हमले के बाद, उसने रूसी कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता और बढ़ा दी और पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों की सरेआम अनदेखी की, लेकिन बाद में ट्रंप की ‘टैरिफ ब्लैकमेलिंग’ के आगे घुटने टेक दिए। अब उसने ‘ब्रिक्स’ समूह को भी निराश किया है, जिसकी अध्यक्षता वह खुद कर रहा है।

इसका नतीजा यह हुआ कि आज हमारी विदेश नीति पर न तो कोई सहयोगी पूरी तरह भरोसा करता है और न ही कोई विरोधी उससे सचमुच खौफ खाता है। वॉशिंगटन बिना कोई मदद दिए, अपनी बात मनवा लेता है। मॉस्को तेल तो देता है, लेकिन सुरक्षा नहीं। बीजिंग सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना हुआ है और उसका व्यापार अधिशेष (ट्रेड सरप्लस) भी बहुत ज्यादा है, लेकिन भारत के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष में वह सक्रिय रूप से पाकिस्तान के साथ खड़ा होता है। और सऊदी अरब, जिसे सरकार मुस्लिम जगत में मोदी की एक सफलता की कहानी के तौर पर पेश करती है, ने गाज़ा पर भारत की चुप्पी के बाद, सितंबर 2025 में इस्लामाबाद के साथ एक रक्षा संधि पर हस्ताक्षर कर दिए।


'नेबरहुड फर्स्ट' से 'होस्टाइल नेबरहुड' तक

एक दशक से भी पहले औपचारिक रूप से सामने आई भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ (पड़ोसी पहले) नीति का मकसद भारत को इस क्षेत्र का एक अनिवार्य भागीदार बनाना था। लेकिन इसके बजाय, इसने एक ऐसा दक्षिण एशिया दिया है, जिसमें भारत एक ही समय पर सबसे बड़ी शक्ति भी है और सर्वाधिक अविश्वास का पात्र भी।

मालदीव ने मई 2024 में अपने ‘इंडिया आउट’ अभियान पर आधारित एक स्पष्ट चुनावी जनादेश के बाद भारतीय सैन्यकर्मियों को देश से निकाल दिया। भारत का सबसे भरोसेमंद साझेदार, भूटान अब खामोशी से अपनी नीतियों में बदलाव करना शुरू कर चुका है। उसने बीजिंग के साथ मिलकर चीनी नव वर्ष का उत्सव आयोजित किया, जिसमें उसके शाही परिवार के सदस्य भी शामिल हुए; बीजिंग को संकेत देते हुए तिब्बत को आधिकारिक तौर पर ‘शिज़ांग’ के नाम से संबोधित किया; और अब वह नई दिल्ली को दरकिनार करते हुए चीन के साथ सीधे सीमा वार्ता में जुटा है। उत्तरी भूटान की निर्जन जकारलुंग और मेनचुमा घाटियों में चीनी बस्तियां बस गई हैं, और भारत इस वास्तविकता को बदल पाने में असमर्थ रहा है। ‘चिकन नेक’ नाम से चर्चित सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के मुख्य भूभाग से जोड़ता है; यह कॉरिडोर ऊंची-ऊंची पहाड़ियों के सामने पूरी तरह से खुला हुआ है, जहां चीनी बुनियादी ढांचा लगातार आगे बढ़ता जा रहा है।

बांग्लादेश एक भरोसेमंद साझीदार से बदलकर अब एक खुला विरोधी बन चुका है। मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने तो अपने देश को चीन के लिए भारत के चारों ओर से जमीन से घिरे (लैंडलॉक्ड) पूर्वोत्तर राज्यों तक पहुंचने का एक प्रवेश द्वार बनाने का प्रस्ताव भी दे दिया था। भारत ने इस उकसावे का जवाब व्यापार मार्गों पर प्रतिबंध लगाकर दिया, जिससे अनुमानित तौर पर 770 मिलियन डॉलर के व्यापार पर असर पड़ेगा। इस कदम से भारतीय प्रभाव तो बहाल नहीं हुआ, असंतोष जरूर थोड़ा और बढ़ा दिया है।

नेपाल में, राजनैतिक हस्तियों की एक नई पीढ़ी ने सत्ता संभाली है, जिनके नई दिल्ली से कोई वंशानुगत रिश्ते नहीं हैं और न ही उस असंतुलन के प्रति वे उतने धैर्यवान हैं, जो हमेशा से इस रिश्ते की पहचान रही है। 

म्यांमार में, भारत ने एक ऐसे सैनिक शासन पर दांव लगाया, जिसका अब देश के कुल भूभाग के मुश्किल से तीस प्रतिशत हिस्से पर ही नियंत्रण शेष  है। सीमावर्ती क्षेत्रों पर तेजी से अपना वर्चस्व स्थापित कर रही प्रतिरोधक ताकतों के साथ भारत में किसी प्रकार का कोई रिश्ता नहीं बनाया है। चीन न सिर्फ वह खाली जगह भरने में सफल रहा है जिसे भारत ने छोड़ा था, बल्कि उसने सक्रिय रूप से उसका लाभ भी उठाया है


विरासत में मिली साख की बर्बादी 

मोदी सरकार 2023 में अपनी जी20 अध्यक्षता की सफलता पर इतराती है। इसमें कोई शक नहीं कि अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्य के तौर पर शामिल करना एक उल्लेखनीय पहल थी। मोदी सरकार के शुरुआती वर्षों में खाड़ी देशों के साथ हुई साझेदारियां वास्तविक, व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण और कूटनीतिक रूप से फलदायी थीं। यूरोपीय संघ और ब्रिटेन, न्यूजीलैंड और कुछ अन्य देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते किए गए हैं। 

लेकिन इनमें से ज्यादातर ‘उपलब्धियां’ या तो यूपीए काल से विरासत में मिली थीं या फिर पूर्व की पहलों को आगे बढ़ाकर हासिल की गई थीं। कुछ उपलब्धियां ढांचागत होने के बजाय ज्यादातर नाम-शोहरत से जुड़ी थीं; वे न तो टिकाऊ गठबंधनों में बदल पाईं, न ही पक्के वादों में और न ही संकट का सामना कर सकने वाले रिश्तों में।

भारत की जी20 ‘सफलता’ सीधे तौर पर मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान हुई वृद्धि का नतीजा है। एफटीए भी उसी रास्ते पर चल रहे हैं जिस पर यूपीए-काल के एफटीए जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, आसियान और दस से ज्यादा दूसरे खास देशों के साथ चले थे। मोदी सरकार को अपना पहला एफटीए साइन करने में आठ साल लग गए, और यूरोपीय संघ तथा ब्रिटेन के साथ डील पक्की करने के लिए ट्रंप के टैरिफ वाले नखरों की ज़रूरत पड़ी!

इन रिश्तों को मज़बूत गठबंधनों में बदलने में मिली नाकामी का भारत को सच में बड़ा ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा है। ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ का उसका दावा खोखला लगता है, और विदेश नीति के मामले में उसका अकेलापन एक कड़वी सच्चाई है।

(गुरदीप सिंह सप्पल कांग्रेस कार्यसमिति के स्थायी आमंत्रित सदस्य हैं )

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