टिकाऊ विकास या केवल विकास का प्रदर्शन?
देश की पहचान केवल ऊंची इमारतों, लंबे पुलों या चौड़ी सड़कों से नहीं, बल्कि सुरक्षित, टिकाऊ और भरोसेमंद बनी रहने से बनती है।

देहरादून में राष्ट्रीय राजमार्ग पर प्रेमनगर-नंदा की चौकी के पास एक पुल था जो पिछले साल 15 सितंबर को तेज पानी की वजह से बह गया था। स्थानीय लोगों ने आवाजाही के लिए एक अस्थायी पुल बना लिया था। क्षतिग्रस्त पुल को पीडब्ल्यूडी ने 16 करोड़ की लागत से तैयार किया। इसे 13 जुलाई 2026 को आवागमन के लिए शुरू किया गया। लेकिन 16 दिनों बाद ही इसका अप्रोच रोड 28 जुलाई को धंस गया जिस वजह से इसे बंद कर देना पड़ा। आनन-फानन में इसकी मरम्मत की गई।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे का 14 अप्रैल, 2026 का उद्घाटन किया। तब कहा गया कि इस 213 किलोमीटर लंबे 6-लेन एक्सप्रेसवे के खुलने के बाद से दिल्ली और देहरादून के बीच की यात्रा का समय लगभग 6 घंटे से घटकर महज 2.5 घंटे रह गया है। तीन महीना पूरा होने से पहले पहली ही भारी बारिश के बाद जुलाई 2026 में शामली के पास इसमें इतने बड़े-बड़े गड्ढे उभर आए कि कई गाड़ियां क्षतिग्रस्त भी हो गईं। इसका वीडियो वायरल हुआ, तो तुरंत पैचवर्क कर दिया गया।
प्रधानमंत्री मोदी ने करीब 36,230 करोड़ रुपये की लागत से बने 594 लंबे गंगा एक्सप्रेसवे का उद्घाटन 29 अप्रैल 2026 को किया। दावा किया गया कि इस वजह से यूपी में ‘निवेश की खान’ खुल गई है। इसकी पोल पहली भारी बारिश में ही खुल गई जब यह उन्नाव के पास धंस गई।
एक के बाद एक लगातार हादसे
प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली में प्रगति मैदान सुरंग (इंटीग्रेटेड ट्रांजिट कॉरिडोर) का उद्घाटन 19 जून 2022 को किया था। इसकी अनुमानित लागत 920 करोड़ रुपये से अधिक है जबकि अकेले सुरंग के निर्माण पर लगभग 777 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। इसकी खासियत यह बन गई है कि जरा भी तेज बारिश होती है, तो इसे बंद कर दिया जाता है, मतलब इसे डिजाइन करते समय सोचा ही नहीं गया कि बारिश के दिनों में यह कैसे काम करेगा।
प्रधानमंत्री मोदी ने नौसेना दिवस पर 4 दिसंबर 2023 को महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में सिंधुदुर्ग जिले के मालवन स्थित राजकोट किले में छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा का अनावरण किया था। मूल प्रतिमा के निर्माण पर लगभग 2.44 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। बाद में सरकार ने उसी स्थान पर लगभग 31.75 करोड़ रुपये की लागत से एक भव्य 91 फीट ऊंची नई प्रतिमा बनाई। लेकिन 26 अगस्त 2024 को यह गिर गई।
बिहार में पिछले 5 वर्षों में 26 से अधिक पुल-पुलिया गिरने के मामले दर्ज किए गए हैं। दुखद यह है कि इस तरह की खबर आने पर अब कम ही किसी का ध्यान जाता है। हाल यह है कि बिहार के खगड़िया जिले में अगुवानी और भागलपुर में सुल्तानगंज के बीच बनने वाला पुल निर्माण के दौरान ही तीन बार ढह गया। पहली बार 30 अप्रैल 2022, दूसरी बार 4 जून 2023, और तीसरी बार 17 अगस्त 2024 को। सरकारी रिपोर्टों से अब भी यह साफ नहीं हो पाया है कि इनकी वजह डिजाइन में कमी थी, निर्माण सामग्री दोषपूर्ण थी या निगरानी में गंभीर लापरवाही हुई। अधिकतर घटनाओं के बाद बिहार प्रशासन का तर्क होता है कि छोटे पुल-पुलियों के गिरने की मुख्य वजह तेज बारिश है।
टिकाऊ विकास या केवल विकास का प्रदर्शन
आखिर ऐसा क्यों होता है कि कई हजार करोड़ की संरचनाएं बरसात आते ही ढहने लगती हैं और जानलेवा बन जाती हैं। देश में राजमार्गों का जाल बिछ रहा है, वंदे भारत जैसी ‘महंगी’ रेल सेवाएं शुरू हो रही हैं, नए और चमकीले हवाई अड्डे बन रहे हैं, समुद्र पर लंबे पुल तैयार हो रहे हैं और स्मार्ट शहरों का कथित सपना भी आकार लेने का दावा कर रहा है। सरकारें इन परियोजनाओं को नए भारत की पहचान के रूप में प्रस्तुत करती हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में नई बनी सड़कों का पहली ही बारिश में उखड़ जाना, उद्घाटन के कुछ समय बाद ही पुलों में दरारें आना, निर्माणाधीन पुलों का गिर जाना और सार्वजनिक इमारतों की छतों का ढह जाना एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है- हम टिकाऊ विकास कर रहे हैं या यह सब केवल विकास के प्रदर्शन हैं?
सबसे चिंताजनक बात यह है कि अधिकांश दुर्घटनाओं के बाद कुछ दिनों तक चर्चा होती है, जांच समिति बनती है, कुछ अधिकारियों का तबादला या निलंबन होता है और फिर मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। दोष तय नहीं होता, न किसी बड़ी निर्माण एजेंसी की जवाबदेही सुनिश्चित होती है और न ही ऐसी घटनाओं से सीख लेकर व्यवस्था में व्यापक सुधार दिखाई देता है।
ऐसी घटनाएं केवल इंजीनियरिंग की विफलता नहीं हैं। इनके पीछे कई स्तरों की समस्याएं हैं। पहली समस्या है- समय से पहले परियोजना पूरी करने का राजनीतिक दबाव। आज अधिकांश बड़ी परियोजनाएं चुनावी कैलेंडर से जुड़ जाती हैं। उद्घाटन की तारीख तय हो जाती है और फिर निर्माण एजेंसियों पर समय-सीमा पूरी करने का दबाव बढ़ जाता है। ऐसे में गुणवत्ता परीक्षण, अंतिम निरीक्षण और तकनीकी मानकों के पालन में समझौते की आशंका बढ़ जाती है।
जवाबदेही का अभाव गंभीर समस्या
दूसरी समस्या है सबसे कम बोली-आधारित ठेका प्रणाली। सरकारी खरीद में कम लागत निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन जब प्रतिस्पर्धा केवल सबसे सस्ता ठेका पाने तक सीमित रह जाए तो गुणवत्ता प्रभावित होना स्वाभाविक है। ठेकेदार अधिकतर बाद में लागत की भरपाई घटिया सामग्री, कम गुणवत्ता वाले श्रम या तकनीकी मानकों में कटौती करके करते हैं।
तीसरी और सबसे गंभीर समस्या है जवाबदेही का अभाव। किसी पुल के गिरने, सड़क के धंसने या सरकारी भवन के ढहने के बाद यदि दोषी इंजीनियर, निर्माण एजेंसी या निगरानी संस्था पर कठोर कार्रवाई नहीं होती तो यह संदेश जाता है कि सार्वजनिक धन की बर्बादी की कोई वास्तविक कीमत नहीं चुकानी पड़ेगी। यही कारण है कि गलतियां दोहराई जाती हैं।
विडंबना यह है कि भारत में परियोजनाओं की सफलता का मूल्यांकन अक्सर उनकी लागत, लंबाई या उद्घाटन की तारीख से किया जाता है, न कि उनकी डिजाइन आयु और टिकाऊपन से। यदि किसी पुल की अनुमानित आयु सौ वर्ष है, लेकिन वह एक-दो साल में ही टूटने-गिरने लगे और दस वर्ष में ही ये बड़ी मरम्मत मांगने लगें, तो उसे सफल परियोजना नहीं कहा जा सकता, चाहे उसका उद्घाटन कितने ही भव्य तरीके से हुआ हो।
लागत बढ़ने से बोझ करदाताओं पर
जलवायु परिवर्तन का तर्क भी अक्सर सामने रखा जाता है। निश्चित रूप से अत्यधिक वर्षा, बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाएं बढ़ी हैं। लेकिन यदि विकसित देशों में इन्हीं परिस्थितियों में बने पुल और सड़कें दशकों तक सुरक्षित रह सकती हैं, तो भारत में हर बार प्राकृतिक आपदा को ही दोष नहीं दिया जा सकता। आधुनिक इंजीनियरिंग का उद्देश्य ही बदलती जलवायु को ध्यान में रखकर संरचनाएं तैयार करना है।
इस समस्या का एक सामाजिक पक्ष भी है। जब किसी सड़क के बार-बार मरम्मत की जरूरत होती है, तो उसकी वास्तविक लागत कई गुना बढ़ जाती है। इसका भुगतान अंततः करदाता करता है। दुर्घटनाओं में जान-माल की हानि अलग होती है। खराब आधारभूत संरचना उद्योग, पर्यटन, परिवहन और निवेश- सभी को प्रभावित करती है। इसलिए यह केवल तकनीकी या प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि आर्थिक विकास और नागरिक सुरक्षा का प्रश्न भी है।
समाधान के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत
समाधान भी स्पष्ट हैं, बशर्ते उन्हें लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति हो। हर बड़ी परियोजना का स्वतंत्र तृतीय-पक्ष गुणवत्ता ऑडिट अनिवार्य होना चाहिए। निर्माण पूरा होने के बाद केवल उद्घाटन नहीं, बल्कि विस्तृत सुरक्षा प्रमाणन सार्वजनिक किया जाना चाहिए। दोषी ठेकेदारों और अधिकारियों को ब्लैकलिस्ट करने की व्यवस्था वास्तव में लागू होनी चाहिए। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) तथा अन्य तकनीकी संस्थाओं की रिपोर्टों पर समयबद्ध कार्रवाई हो। साथ ही, परियोजनाओं की पूरी जानकारी- लागत, ठेकेदार, गुणवत्ता परीक्षण और रखरखाव - जनता के लिए ऑनलाइन उपलब्ध होनी चाहिए।
केन्द्र सरकार और राज्यों की सरकारों को विकास की गति और गुणवत्ता- दोनों पर ध्यान देने की जरूरत है। दुनिया में किसी भी देश की पहचान केवल ऊंची इमारतों, लंबे पुलों या चौड़ी सड़कों से नहीं बनती, बल्कि उनसे बनती है जो दशकों तक सुरक्षित, टिकाऊ और भरोसेमंद बनी रहें। देश की वास्तविक ताकत उसके उद्घाटनों में नहीं, बल्कि उन संरचनाओं में होती है जो आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित खड़ी रहती हैं।
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