विचार

मृणाल पांडे का लेखः बालकनी के गमलों में उगा जुमलों का पर्दा हटेगा तभी बच सकेगा लोकतंत्र

देशहित ही नहीं हमारे अपने हितस्वार्थों का भी तकाजा बनता है कि हम भारत के लोग बालकनी के गमलों में उगाए गए जुमलों को अपने विवेक पर पर्दा न डालने दें। जिस जमीन पर भारतीय लोकतंत्र खड़ा है वही नहीं बची रही, तो बाहरी सजावट का हम क्या करेंगे?

रेखाचित्रः डीडी सेठी

मृणाल पाण्डे

कांग्रेस का घोषणापत्र ताजगी भरा है। खासकर इसलिए कि वह मुख पृष्ठ से आखिरी पन्ने तक देश के ठोस गंभीर संकटः भारत की आत्मा की रक्षा, से जुड़े बुनियादी मुद्दों पर केंद्रित है। यह साबित करता है कि भारत की जनता के साथ खुद कांग्रेस ने भी पिछले पांच सालों में यह भली भांति समझ लिया है कि तानाशाह एकछत्रता तले लोग अधिक राष्ट्रप्रेमी और देश अधिक ताकतवर नहीं बनते। उल्टे राज और समाज सामाजिक और आर्थिक टूट की कगार पर जा खड़े होते हैं। देश की बुनियादी सामाजिक समरसता और आर्थिक स्वास्थ्य की बहाली की दृष्टि से कांग्रेस का घोषणापत्र सही और सामयिक है।

कुछ लोग कहते हैं कि अमूमन मैनिफेस्टो बहुत गौर से नहीं पढ़े जाते। हिंदू-मुस्लिम अलगाव, दलितों-आदिवासियों का आक्रोश और खेती की जो समस्याएं पिछले सालों ने विमोचित की हैं, उनको विदा करने में समय लगेगा। पर, इसीलिए जरूरी है कि घोषणापत्र तैयार करने का काम जोश और ईमानदारी से हो, नाटकीयता से नहीं।

गए बरसों में सरकार ने अपने प्रचार पर मीडिया माध्यमों पर जनता का धन अभूतपूर्व रूप से लुटाया है। पर नतीजा क्या? बार-बार ढपोरशंखी साबित हुए नाटकीय जुमलों और नकली सामंती भंगिमाओं से जनता बेतरह ऊब गई है। आज उनको हर कहीं एक लतीफे की तरह सुनते-सुनाते युवा लेखक और कलाकार जनता को हंसा रहे हैं। बीजेपी के कई बुजुर्गों ने भी चुप्पी त्याग कर शासक दल की बढ़ती असहनशीलता, गैरजवाबदेही और अपारदर्शिता को लेकर हमला बोल दिया है। मितभाषी आडवाणी ने कुछ विनम्रता से, सुमित्रा महाजन ने अस्फुट स्वरों में और यशवंत सिन्हा और मुरली मनोहर जोशी ने खुली कड़वाहट के साथ।

हम पुराने पत्रकार यह भूल नहीं सकते कि आडवाणी और जोशी की इस जोड़ी ने खुद नब्बे के दशक में रथयात्रा और बाबरी मस्जिद ध्वंस से इस सांप्रदायिक कड़वाहट, हिंदुत्व और अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति वैमनस्य के बीज किस तरह छींटे थे। उसी की फसल अगोर कर समृद्ध हुआ आज का बीजेपी नेतृत्व हिंदुत्व के नाम पर चरमपंथिता और वैयक्तिक ताकत का व्यापारी बनता नजर आता है।

रथयात्रा के काल में चार दशक से हिंदुस्तान की सत्ता में बहुसंख्यकों की ही शीर्ष भागीदारी रही थी। उनको तो आश्वस्त और उदार होना चाहिए था, दीन या पराजय बोध से भरा नहीं। पर तब पराजय बोध को गहराते हुए देश में घूम-घूम कर प्रचारित किया गया कि कांग्रेस की तुष्टीकरण नीति की वजह से हिंदू हितों की रक्षा नहीं हुई है। लिहाजा भारत के सारे पुराने अतिक्रमणों का इलाज अयोध्या में बाबरी मस्जिद की जगह एक भव्य राम मंदिर बना कर किया जाना चाहिए।

इस दर्शन को गुजरात की प्रयोगशाला में तैयार 2002 के नुस्खों से और तराशा गया और 2014 में बीजेपी को पूर्ण बहुमत भी मिल गया। पर बीजेपी के पास इस दीनता और प्रतिशोध भावना को बेचने से इतर न तब कोई बड़ा राष्ट्रीय सपना था, न अब है।

इन चुनावों में वंशवाद को कांग्रेस की इकलौती विरासत बताते हुए बीजेपी उन पर तीखे प्रहार कर रही है। साथ ही वह राष्ट्रीय राजनीति से वंशवाद की समाप्ति को अपनी महान उपलब्धि बता रही है। लेकिन उनका यह दावा तो उनके अकाली दल या शिवसेना जैसे साथी और खुद उनके कई बड़े नेता नकार रहे हैं जो हर तरह के जुगाड़ से अपने वंशधरों को हर कहीं चुनाव में उतार रहे हैं।

दरअसल कश्मीर से तमिलनाडु तक की राजनीति गवाह है कि भारत की जनता ने वंशवाद को नहीं नकारा। मुफ्ती और अब्दुल्ला परिवार से लेकर बादल, सिंधिया, डीएमके, एआईडीएमके के मुखिया, रेड्डी या ओडिशा के पटनायक परिवार वंशवाद आधारित भवन नहीं तो क्या हैं? और क्या यह सच नहीं कि सत्ता में आकर अगर नए गठजोड़ वंशवाद से मुक्त होते हुए भी न्याय संगत शासन देने में नाकाबिल साबित हुए, तो मतदाता चुपचाप (अन्य वंश मुक्त विकल्प मौजूद रहते हुए भी) सीधे वंशवासी शासक को वापिस बुलाने को मतदानी रुक्का भेज देते हैं। इसे सनक मानें या कुछ भी।

वंशवाद अगर हर युग में एक जिताऊ नुस्खा न रहा होता, तो दक्षिण के घाघ नेता के कामराज को क्या पड़ी थी कि नेहरू की मौत के डेढ़ बरस बाद वह कश्मीरी ब्राह्मण इंदिरा का राजतिलक करवा देते जबकि क्षितिज पर दिग्गज यशवंतराव चव्हाण, सिद्धार्थ शंकर रे और ब्रह्मानंद रेड्डी वाली एक अनुभवी परिपक्व कांग्रेस खड़ी थी? क्या वजह थी कि 77 में इमरजेंसी की कटु स्मृतियां तक निगलकर भारत के मतदाता इंदिरा कांग्रेस को पुन: जिताकर सत्ता में ले आए?

नई सदी में भी बीजेपी, लोकदल आदि द्वारा वंशवाद की घोर निंदा, इटली और गांधी परिवार की बहू को पानी पी-पी कर कोसने के बावजूद जनता ने 2004 में सोनियानीत कांग्रेस को फिर से जिताना भ्रष्टाचार या वंशवाद का अनुमोदन नहीं माना। जिन चंद संपादकों को (जो सचमुच के संपादक थे, मनीजरी आदेश या सरकारी हैंडआउट्स का दयनीय दैनिक इंतजार करते क्लर्क नहीं), इन घटनाओं का मतलब समझ आ रहा था, वे बार-बार लिख रहे थे कि कामराज प्लान या नव निर्माण आंदोलन या एनडीए को सत्ता मिलना भारतीय मतदाता द्वारा कांग्रेस को हिंद महासागर में फेंक कर ‘मुख्यधारा को भगवा करो’ की इच्छा नहीं दिखाता।

जनता 2014 में कांग्रेस को शायद फिर सबक सिखाते हुए कुछ साल तक उसे वनवास दे रही थी कि वह अपना ईमानदार विरेचन करे और अगर उसका पश्चाताप जनता को माकूल लगा तो वह देखेगी। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के दुर्ग कांग्रेस को देकर उसने आंशिक क्षमा दान दिया भी है। इन विधानसभा चुनावों में साफ हो गया है कि जनता कांग्रेस के विकल्प की बतौर रीढ़ विहीन केंचुए भी नहीं चाहती और न ही देश तोड़ने वाला सांप्रदायिक चेहरे वाला बहुसंख्यवाद।

इस नजरिए से देखें तो लगता है कि इन चुनावों में असली सवाल राहुल गांधी या महागठजोड़ के किसी अन्य नेता को ताकत सौंपने का उतना नहीं, जितना कि यह, कि लोकतंत्र में आस्था रखने वाली जनता के लिए किस तरह पुरानी भरोसेमंद समावेशी अखिल भारतीयता वापिस लौटे? कैसे विधायिका ही नहीं, सेना और लोकतंत्र के जानबूझ कर क्षतिग्रस्त बनाए जा रहे शेष पायोंः न्यायपालिका, कार्यपालिका, और मीडिया को उनका सही आकार, स्वायत्तता और कामकाज की क्षमता वापिस लौटे?

भारत के एक रहने की बुनियादी शर्त है संविधान पर आधारित लोकतंत्र। गए बरसों में अलोकतांत्रिक तरीके से सत्ता केंद्र में कुछ ही हाथों में सिमट कर रह गई है। और मीडिया की मालिकी कुछ बड़े कॉरपोरेट घरानों के पास चली गई है। इससे जनता की नजरों में स्वायत्तता और सेकुलरवाद ही नष्ट नहीं हुए, विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया हर कहीं स्वतंत्र, निडर निर्णय क्षमता कुंद पड़ी है। कई मौकों पर असहमत शत्रुघ्न सिन्हा तंग हो कर पार्टी छोड़ गए। पुराने सिपहसालार मंत्री यशवंत सिन्हा भी पहले ही पार्टी छोड़ चुके हैं। और अरुण शौरी खरी-खरी सुनाने से चूक नहीं रहे और चुनौती दे रहे हैं कि हिम्मत हो तो मुझे हटाओ।

अगर हम को इस बार राज के लिए प्रस्तुत लोकतांत्रिक भारत और राज करने लायक सरकार चाहिए, तो वह ऐसी पार्टी और नेता के तत्वावधान में ही संभव है जो आग में घी डालने की बजाय ठोस जमीनी मुद्दों पर ठंडे दिमाग से चर्चा का माहौल बनाए। दस-बीस लाख समृद्ध लोगों का भारत, जो नारे लगाता टीवी पर प्रधानमंत्री के प्रचारपूर्ण विदेशी दौरों को बीआर चोपड़ा की फिल्म की तरह देख रहा था, अब चारेक साल बाद बैंकों की बदहाली, आर्थिक मंदी और पानी और पर्यावरण का प्रदूषण खुद अपनी दहलीज पर आ जाने से बेहाल है।

कांग्रेस का घोषणापत्र उनको यह याद दिलाकर कोई गलत नहीं कह रहा, कि धर्म, अर्थ, काम या मोक्ष की साधना फोकट में या सिर्फअपने लिए ही करना अंत में विनाशकारी होता है। देश हित ही नहीं हमारे अपने हितस्वार्थों का भी तकाजा बनता है कि हम भारत के लोग बालकनी के गमलों में उगाए गए जुमलों को अपने विवेक पर पर्दा न डालने दें। जिस जमीन पर भारतीय लोकतंत्र खड़ा है वही नहीं बची रही, तो बाहरी सजावट का हम क्या करेंगे?

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