फेक न्यूज के गोरखधंधे में सबसे बड़ी बाधा है पारंपरिक मीडिया, तभी तो इस पर हो रहे हमले

फेक न्यूज’ को कोलिन्स डिक्शनरी में जगह पाए लगभग तीन साल हो गए हैं जिसमें इसका मतलब “न्यूज रिपोर्टिंग की आड़ में गलत और सनसनीखेज सूचना देना” बताया गया है। इसका सबसे अहम हिस्सा है ‘न्यूज रिपोर्टिंग की आड़ में’ जो फेक न्यूज की परिभाषा के केंद्र में है।

फोटो : IANS
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नवजीवन डेस्क

फेक न्यूज’ को कोलिन्स डिक्शनरी में जगह पाए लगभग तीन साल हो गए हैं जिसमें इसका मतलब “न्यूज रिपोर्टिंग की आड़ में गलत और सनसनीखेज सूचना देना” बताया गया है। इसका सबसे अहम हिस्सा है ‘न्यूज रिपोर्टिंग की आड़ में’ जो फेक न्यूज की परिभाषा के केंद्र में है। लेकिन हालके समय में किसी भी उस खबर को जो पसंद न आए, उसे यूं ही या सोचे-समझे तरीके से ‘फेक न्यूज’ कह दिया जाता है। कई बार वैसे भी मामलों में जब चैनल के संचार नेटवर्क में बाधा, अनुभव की कमीया कभी- कभार जारी करने से पहले किसी चूक के कारण गलत सूचना के प्रसारित हो जाने को भी इसी चश्मे से देखा जाता है।

हालांकि इस तरह की लापरवाही पूरी ज्ञान व्यवस्था को नष्ट कर सकती है जो सूचना और आंकड़ों के माध्यम से लगातार बदलती रहती है। यहां तक कि सांख्यिकीय आंकड़े जिन्हें सरकारी एजेंसियां ही तैयार करती हैं, पर भी अक्सर सवाल किए जाते हैं और कई बार वे संदिग्ध और गलत भी पाए जाते हैं। जनता में विचार-विमर्श सरकार को फेक न्यूज फैलाने के लिए जिम्मेदार बताते हुए शुरू नहीं होता बल्कि वाद विवाद, आंकड़ा इकट्ठा करने के तौर-तरीके और उसकी व्याख्या जैसे वैचारिक मुद्दों पर केंद्रित होता है। लेकिन अगर कोई गलत सरकारी आंकड़ों को महज इस आधार पर ‘फेक न्यूज’ करार देकर खारिज कर दे कि वह सरकार को पसंद नहीं करता या उसे सरकार की निष्ठा पर संदेह है, तो यह न केवल अनुचित होगा बल्कि उस प्रक्रिया को भी बाधित करेगा जिसके माध्यम से ज्ञान तैयार और समृद्ध होता है। दुनिया भर में तमाम ऐसे उदाहरण हैं जब सूचना पर आपत्ति जताई गई और अंततः उसे गलत भी पाया गया। ये और बात है कि कई बार महीनों, यहां तक कि वर्षों के श्रम साध्य शोध के बाद इन्हें गलत साबित किया जा सका। लेकिन उन्हें ‘फेक न्यूज या फर्जी आंकड़ा’ करार नहीं दिया गया।

फेक न्यूज सिर्फ गलत जानकारी, झूठी सूचना या कभी-कभी भ्रम फैलाने वाली सूचना ही नहीं है। एक छात्र अपनी परीक्षा में कोई गलत जानकारी दे सकता है या फिर किसी राहगीर के रास्ता पूछने पर कोई व्यक्ति गलत दिशा बता सकता है। संसद की बात करें तो कोई भ्रमित करने वाली जानकारी न जाए, इसके लिए संस्थागत तरीके से जांच-पड़ताल की व्यवस्था होती है। यहां अंतर देखिए। जहां एक छात्र को गलत जानकारी देने पर अंक नहीं मिलते हैं लेकिन अगर कोई निजी लाभ के लिए भ्रामक या गलत जानकारी देता है तो उसके खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया जाता है। लोगों को ठगने के लिए गलत सूचनाओं का इस्तेमाल करने पर आईपीसी की धारा 420 के तहत मामला दर्ज किया जाता है। लेकिन यह बात साफ है कि ये फेक न्यूज नहीं हैं।

ब्रह्मांड कैसे काम करता है, इसका पता लगाने के तमाम वैज्ञानिक अनुसंधान के दौरान कल्पनीय- अकल्पनीय तमाम बातें सामने आती हैं जिनमें से तमाम अंततः गलत, भ्रामक या फिर महज अनुमान साबित होती हैं। जैसे-जैसे प्रौद्योगिकीय प्रगति होती है, नई-नई खोज की जाती है और तब पता चलता है कि तमाम पुरानी मान्यताएं तो गलत और अपर्याप्त तथ्यों पर आधारित थीं। शोधकर्ताओं की नई पीढ़ी नए निष्कर्षों की रोशनी में सूचनाओं और यहां तक कि सुलझे हुए तथ्यों की भी जांच-पड़ताल करती रहती है। लंबे अरसे से दुनिया भर में इलेक्ट्रॉनिक सामानों के नकली उत्पादक उत्पाद की उत्पत्ति और मानकों के बारे में भ्रामक आंकड़े देते रहे हैं। इस तरह की धोखाधड़ी में सच कम ही होता है लेकिन फिर भी, यह भी फेक न्यूज नहीं है।

अब सवाल उठता है कि फिर फेक न्यूज आखिर है क्या? सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि फेक न्यूज केवल झूठी जानकारी देने के लिए नहीं तैयार किया जाता है। कई बार एक ईमानदार न्यूज रिपोर्टर भी गलत जानकारी दे सकता है। ठीक वैसे ही, जैसे कि एक छात्र कभी-कभी परीक्षा में गलत या झूठी जानकारी दे जाता है। इसलिए जब किसी गलत सूचना को किसी खास उद्देश्य के साथ दिया जाता है तो वह फेक न्यूज कहलाता है। फेक न्यूज के लिए जरूरी है कि सोचते-समझते हुए धोखे की मंशा स्पष्टतः अंतर्निहित हो। एक गहन अध्ययन में रिनी रेजिना का तर्क है कि फेक न्यूज ‘का तात्पर्य यह है कि इस तरह के छलावे का लक्ष्य वे लोग नहीं जिन तक सबसे पहले इसे पहुंचाया जा रहा है बल्कि उससे कहीं बड़ा समुदाय होता है; फेक न्यूज होता ही इसलिए है कि इसे ज्यादा से ज्यादा साझा किया जाए।’ इसे हर हाल में ‘खबर बना देने की मंशा होती है’। पत्रकार सभी उपलब्ध सूचनाओं से सुसंगत आख्यान बनाने का काम करते हैं। गलत या झूठी जानकारी अक्सर किसी घटना को बदशक्ल कर देती है इसलिए ज्यादातर लोग जो इस पेशे में हैं, वे सही जानकारी इकट्ठा करने की पुरजोर कोशिश करते हैं। अगर उनकी खबर में कोई गलत जानकारी आ जाती है और उन्हें इस बात का पता चलता है तो वे जितनी जल्दी हो सके, अपनी खबर से उस गलत जानकारी को निकालने की कोशिश करते हैं।

फेक न्यूज को जान-बूझकर साझा करने का मूलकारण पैसे बनाना होता है। दुनिया भर में छद्म लोगों और संगठनों ने झूठी खबरों और सूचनाओं को फैलाने वालों की पहचान छिपाने के लिए जटिल सुरक्षा तंत्र बनाने में खासा निवेश कर रखा है। ऐसे छद्म प्लेटफॉर्म अक्सर उस जगह से हजारों किलोमीटर दूर पाए जाते हैं जहां से वह झूठी खबर जुड़ी होती है। अमेरिका में 2016 के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान फेक न्यूज पोर्टल पूर्वी यूरोप या मैसेडोनिया के गांवों से संचालित किए जा रहे थे। इसका उद्देश्य एक झूठा आख्यान तैयार करके लोगों को झांसा देना था। उसके बाद पाठकों और दर्शकों के उस वर्ग जिसमें वह फेक न्यूज पहुंचाई गई, को उन ‘फेक न्यूज’ में भरोसा करने वाले समुदाय में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया जाता था।

हालांकि फर्जी खबरों के प्रसार में सबसे बड़ी बाधा पारंपरिक मीडिया है। चूंकि पारंपरिक मीडिया चाहे वह प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल ही क्यों न हो, विश्वसनीयता के मानदंडों का ध्यान रखते हैं। फर्जी खबर फैलाने वाले इस पारंपरिक मीडिया की ही नकल करते हुए पारंपरिक मुख्यधारा के मीडिया के प्रति पाठकों और दर्शकों के भरोसे को ही खत्म करने की कोशिश करते हैं। फर्जी खबरों का प्रसार निर्बाध रूप से हो सके, इसकी पहली जरूरत है कि पारंपरिक मीडिया की विश्वसनीयता को ही खत्म कर दिया जाए।

यानी एक फेक न्यूज स्टोरी वह है जिसमें पारंपरिक मीडिया की रिपोर्टिंग के तरीके की नकल करते हुए दुनिया में होने वाली घटनाओं को दिखाया जाता है लेकिन इसे तैयार करने वालों को पता होता है कि यह गलत है और इसे इस सोच के साथ प्रसारित किया जाता है कि इसे व्यापक रूप से फैलाया जाएगा और इस तरह उसे पढ़ने-देखने वाले बड़े वर्ग को झांसे में रखा जाता है।

ऐसे देशों में जहां बड़े समुदाय में शिक्षा की कमी हो या इसकी गुणवत्ता संदिग्ध हो, वहां विश्वास बनाने की प्रक्रिया शायद ही कभी मजबूत होती है। ऐसे मामलों में खबरें न केवल ’विश्वास बनाने’ की एक प्रत्यक्ष स्रोत के रूप में काम करती हैं बल्कि यह मानते हुए कि चीजें सही दिशा में ही बढ़ेंगी, लोगों तक ज्ञान के पहुंचाने का और सच को बताने का भी माध्यम बनती हैं। फेक न्यूज के जरिये जान-बूझकर इस प्रक्रिया को बाधित करने की कोशिश की जाती है और लोगों को झांसे में रखकर एक अलग ही झूठी तस्वीर पर विश्वास करने को प्रेरित किया जाता है। ऐसा करके कोशिश यह की जाती है कि उस गलत आख्यान पर भरोसा करने वालों की संख्या में इजाफा हो।

एक ऐसे समाज में जहां न केवल धन और आय के मामले में व्यापक असमानता हो बल्कि ज्ञान तक पहुंच के साधन भी सीमित हों, गरीब और वंचित लोग ही इस तरह के फेक न्यूज का लक्ष्य और आसान शिकार होते हैं। इसे दुनिया के कट्टरपंथी इलाकों के मामले में देखा जा सकता है जहां मान्यताएं अडिग विश्वास प्रणाली की बुनियाद बन गई हैं, भले इससे मानवता ही खतरे में पड़ती हो।

इसलिए जरूरी यह है कि ‘फेक न्यूज मीडिया’ और पारंपरिक मीडिया के बीच के अंतर को बनाए रखा जाए। हमें यह बात याद रखनी होगी कि नकली समाचारों के खेल में लगे लोग फेक न्यूज की वैधता स्थापित करने के लिए इसी अंतर को खत्म करना चाहते हैं।

इस लेख के लेखक जेएनयू के एसोसिएट प्रोफेसर राकेश बटाबियाल हैं

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Published: 05 Feb 2021, 4:02 PM