उद्धव ठाकरे ने दो साल जितने झंझावत झेले और उन्हें कुशलता से पार किया, वैसा शायद महाराष्ट्र के किसी सीएम ने नहीं किया

राजनीति पेचीदा खेल है और उद्धव ने अब तक जमीन पर अपनी पकड़ बनाए रखी है। जैसा कि राजनीति के बारे में कहा जाता है, सफलता की सड़क लंबी, कठोर और ऊबड़- खाबड़ होगी। यह देखना रोचक होगा कि कई झंझावात झेल चुके उद्धव ठाकरे अपनी पार्टी को किस तरह जिता ले जाते हैं।

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मुझे 1960 में महाराष्ट्र के राज्य बनने के बाद से बने सभी मुख्यमंत्रियों को जानने का मौका और गौरव हासिल है। लेकिन दुर्भाग्यवश, मैंने अपने राज्य के दो लोगों- पहले मुख्यमंत्री वाईबी चव्हाण और दूसरे मुख्यमंत्री एम एस कन्नमवर को कवर नहीं किया है। हालांकि मैं बाद में वाईबी चव्हाण से परिचित हुआ और उनके जीवन के अंतिम समय तक उनके संपर्क में बना रहा। हमारे तीसरे मुख्यमंत्री वी पी नाईक से लेकर वर्तमान 18वें मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे तक- सबसे मेरे अच्छे ताल्लुक रहे और मैंने उन्हें निकट से देखा।

उद्धव के पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों से तुलना करते हुए राज्यमें बदली हुई राजनीतिक परिदृश्य को ध्यान में रखना जरूरी है। 1975 तक कांग्रेस प्रमुख राजनीतिक पार्टी थी। शरद पवार ने 1999 में कांग्रेस छोड़ी और तब से ही उनकी पार्टी एनसीपी राज्य की राजनीति में प्रमुख शक्ति है। राज्य और केन्द्र की राजनीति को नियंत्रित करने की पवार की क्षमता और कुशलता भी एक कारण हो सकता है कि ठाकरे ने बीजेपी से अलग होना और एनसीपी तथा कांग्रेस से हाथ मिलाना स्वीकार किया।

उद्धव ने 2019 विधानसभा चुनावों में सफलतापूर्वक जीत के बाद 25 साल पुराने बीजेपी गठबंधन से अलग होने के कारणों को विस्तार से बताया है। दोनों पार्टियों के बीच क्या निर्णय हुआ था, चूंकि वह सार्वजनिक तौर पर पता नहीं है इसीलिए बीजेपी के बारे में उन्होंने जो कुछ कहा है, वही सबके सामने है। लेकिन उन्होंने ऐसी राजनीतिक शक्तियों के साथ गठबंधन कर सरकार का गठन कर बीजेपी को मात दे दी है जिनके बीच कई मुद्दों पर मतैक्य नहीं है। ठाकरे के साथ शरद पवार की एनसीपी और कांग्रेस सरकार बनाकर लाभ में हैं जबकि विधायकों की सर्वाधिक संख्या होते हुए भी बीजेपी विपक्ष में है।

उद्धव को इससे पहले सरकार चलाने का अनुभव भले ही न रहा हो लेकिन वह शिव सेना का वर्षों से नेतृत्व करते रहे हैं। शिव सेना बृहन्मुंबई महानगरपालिका में सत्तासीन रही है, इसका बजट भी बड़ा होता है। यही नहीं, पांच सितारा होटलों, एयरलाइंस और एयरपोर्ट तथा कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों समेत विभिन्न उद्योगों में ट्रेड यूनियनों पर भी शिव सेना का कब्जा रहा है। उन्होंने अपने पिता की वरिष्ठ राजनेताओं, उद्योगपतियों, बॉलीवुड अभिनेताओं तथा महत्वपूर्ण प्रभावी लोगों से आमद-रफ्त को निकट से देखा है। बालासाहब ठाकरे के निधन के बाद उन्होंने पार्टी का पूरा दायित्व निभाया। अकल्पनीय गठबंधन के हिस्से के तौर पर सरकार चलाने में आने वाली चुनौतियों से निबटने में ये अनुभव उनके काम आए।


ठाकरे ने जितने झंझावात झेले हैं, उतने का महाराष्ट्र के किसी अन्य मुख्यमंत्री ने सामना नहीं किया है। उनके समय में राज्य में सूखा, तूफान, प्रचंड बारिश और कोरोना महामारी-जैसी कई प्रमुख प्राकृतिक आपदाएंआईं लेकिन उन्होंने हर स्थिति का कुशलतापूर्वक सामना किया और कुशल राजनीतिज्ञ के तौर पर उभरे। संकट की इस अवधि के दौरान वह किसी भी तरह के दबाव में नहीं आए, खुद फैसले किए और इनके पीछे के कारणों को लेकर राज्य की जनता को प्रभावी ढंग से बताते भी रहे।

राज्य की राजनीति पेचीदा खेल है और उद्धव ने अब तक जमीन पर अपनी पकड़ बनाए रखी है। वैसे, आने वाले दिनों में होने वाले नगरपालिका और जिला परिषद चुनाव उनके लिए बड़ी परीक्षा हैं। बीएमसी चुनाव जीतना सेना के लिए आवश्यक है। जैसा कि राजनीति के बारे में कहा जाता है, सफलता की सड़क लंबी, कठोर और ऊबड़- खाबड़ होगी। यह देखना रोचक होगा कि कई झंझावात झेल चुके उद्धव ठाकरे अपनी पार्टी को किस तरह जिता ले जाते हैं।

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