खरी-खरीः मोदी सरकार का ‘नागरिकता कानून’ भारत को एक और विभाजन की ओर धकेलने वाला

केवल समान नागरिक संहिता को छोड़कर बीजेपी ने अपनी सरकार के दूसरे कार्यकाल के पहले छह महीने में तीन तलाक से मुक्ति पा ली है, अनुच्छेद 370 हटा दिया है, मुसलमानों को एनआरसी के रहमोकरम पर छोड़ दिया है और भारत को हिंदू राष्ट्र का रूपाकार दे दिया है।

फोटोः सोशल मीडिया
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ज़फ़र आग़ा

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 10 दिसंबर को लोकसभा में खड़े हुए और उन्होंने घोषणा की कि उनकी पार्टी- बीजेपी, नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2019 (कैब) लाने पर इसलिए विवश हुई क्योंकि ‘विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था’। शाह इस विधेयक के औचित्य के लिए 1947 में भारत के बंटवारे के लिए पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना के तर्क को जाने-अनजाने याद कर सकते हैं। लेकिन वह भारत को एक और विभाजन की ओर तो निश्चित तौर पर धकेल रहे हैं क्योंकि उन्होंने संसद में कैब को पास कराकर भारतीय नागरिकता को जान-बूझकर धर्म आधारित बना दिया।

इस तरह बीजेपी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिंदू राष्ट्र के स्वप्न की आधारशिला रख दी है। आखिर, आजादी से काफी पहले ही उसने ऐसे भारत की परिकल्पना की थी, जहां मुसलमान नागरिकों को दूसरे दर्जे के नागरिक के तौर पर रहना पड़ेगा, उसी तरह से, जैसा कि शाह ने खुद ही कहा भी, कि पाकिस्तान-जैसे इस्लामी देशों ने अपने हिंदू और अन्य अल्पसंख्यकों के साथ किया है। इसलिए, उन्होंने भारत को पाकिस्तान के बराबर रख दिया जहां धर्म, न कि जन्म, नागरिकों के अधिकारों को निश्चित करता है।

लेकिन विभाजन की त्रासदी के बावजूद भारत के संविधान की रचना आधुनिक भारत के आधार पर ऐसे ही नहीं की गई थी। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कहता हैः ‘शासन भारत के राज्यक्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।’ यही कारण है कि जैसे ही संसद ने कैब को पारित किया, देश में तूफान उठ खड़ा हुआ। संविधान विशेषज्ञों, राजनीतिज्ञों और सिविल सोसाइटी के लोगों ने बिल को संविधान विरोधी बताया। सर्वोच्च न्यायालय के कई रिटायर्ड न्यायाधीशों ने संडे नवजीवन से कहा किः यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी इसे ’संविधान पर हमला’ बताया। नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाले हर्ष मंदर ने इसे ’हमारे धर्मनिरपेक्ष मूल्यों पर आक्रमण’ कहा।

अमित शाह ने इन सभी आरापों से इंकार किया है। लेकिन हर भारतीय नागरिक को एनआरसी कोर्टों के सामने दस्तावेज जमा करने होंगे कि वह या उसके पूर्वज 1951 से पहले भारतीय नागरिक थे और उसके दस्तावेजों की जांच धर्म के आधार पर होगी। अगर उसके माता-पिता हिंदू, सिख, बौद्ध या जैन थे/ हैं, तो वह भारत की नागरिकता के योग्य पाया जाएगा, भले ही वह पाकिस्तान, बांग्लादेश (तब के पूर्वी पाकिस्तान) और अफगानिस्तान- जैसे पड़ोसी मुस्लिम देशों से आए हों। लेकिन सिर्फ, अगर वह मुसलमान है और ऐसे दस्तावेज प्रस्तुत करने या प्रमाणित करने में विफल रहता है कि उसके माता-पिता यहां नहीं जन्मे थे, तो नागरिकता के उसके अधिकार छिन जाएंगे।

मतलब, वह किसी अधिकार के बिना वाला व्यक्ति होगा। इसका साफ मतलब है कि भारतीय आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा अपनी नागरिकता खो देने की कगार पर है और इस तरह वह दोयम दर्जे का नागरिक बनने की ओर धकेला जा रहा है। यह हर तरह से, भारत में अन्यों के मुकाबले हिंदुओं के भारी-भरकम बहुमत को श्रेष्ठता देने की तरह है। दूसरे शब्दों में, यह अन्यों के ऊपर हिंदू श्रेष्ठता वाला नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत का न्यू इंडिया या हिंदू राष्ट्र है।

बीजेपी इस पर तब से काम कर रही है जब से नरेंद्र मोदी अभी मई में भारी बहुमत के साथ जीतकर वापस सत्ता में आए। अब, बीजेपी को हिंदुत्व पर आधारित अपने कोर एजेंडे को पूरा करने के लिए अपने सहयोगी दलों पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं रह गई है। बीजेपी राज्यसभा में बहुमत में नहीं है, लेकिन अमित शाह ने वहां भी बहुमत हासिल करने का जरिया खोज लिया है। अपने को बीजेपी के चाणक्य कहलाना पसंद करने वाले शाह जान गए हैं कि राज्यसभा में समर्थन करने या फिर वोटिंग के समय अनुपस्थित रहने के लिए विभिन्न दलों के सांसदों के साथ किस तरह साम, दाम, दंड, भेद का उपयोग किया जाए।

उन्होंने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने- जैसे हिंदुत्व केंद्रित बिल के समय भी ऐसा ही किया था। इस बार भी उन्होंने यही किया है। समान नागरिक संहिता को छोड़कर बीजेपी ने अपनी सरकार के दूसरे कार्यकाल के छह महीने में तीन तलाक से मुक्ति पा ली है, अनुच्छेद 370 हटा दिया है, मुसलमानों को एनआरसी के रहमोकरम पर छोड़ दिया है और भारत को हिंदू राष्ट्र का रूपाकार दे दिया है।

लेकिन बीजेपी वैसे मुद्दों को लेकर इतनी जल्दी में क्यों है जो भारत को विभाजन- जैसी स्थिति की ओर धकेल रहे हैं। सीपीआई (एम) महासचिव सीताराम येचुरी इसे इस तरह सही ही देखते हैं किः “क्योंकि बीजेपी विभाजनकारी राजनीति पर फलती-फूलती है”। येचुरी गलत भी नहीं हैं। नरेंद्र मोदी के राजनीतिक ग्राफ को देखें, तो आप पाएंगे कि मोदी का राजनीतिक उदय विभाजनकारी राजनीति की ही देन है। मोदी ने 2002 गुजरात दंगों में हिंदुओं के शत्रुओं के तौर पर गुजराती मुसलमानों को नेस्तनाबूत कर दिया, इस तरह अपने को हिंदी हृदय सम्राट कहलाना पसंद करने लगे और तीन बार गुजरात चुनावों में जीत कर भी आए। मोदी 2014 में राष्ट्रीय राजनीति में आए और अपने को ऐसे नेता के तौर पर प्रोजेक्ट किया जो ‘मुसलमानों को ठीक कर देने’ के अलावा तुरत-फुरत विकास भी कर सकता है। प्रधानमंत्री के तौर पर दूसरी बार भी उनकी वापसी इस वजह से हो पाई क्योंकि उन्होंने ‘मुस्लिम’ पाकिस्तान को बालाकोट के जरिये ‘दुरुस्त’ कर दिया।

अब मोदी और बीजेपी- दोनों को तीसरे टर्म की चाहत है। दोनों को नए विभाजनकारी एजेंडे की जरूरत है जो उनकी सत्ता में वापसी करा सके। विशेष दर्जा छीनकर उन्होंने ‘मुस्लिम’ कश्मीर पर ‘फतह’ कर ली है, मुस्लिम पर्सनल कानून के जरिये तीन तलाक के मुसलमानों के अधिकार को छीन लिया है और कैब के जरिये भारतीय मुसलमानों को वस्तुतः कुचल दिया है। चुनावों का अगला दौर जीतने के लिए कैब, सचमुच, बीजेपी का मुख्य हथियार है, क्योंकि एनआरसी की प्रक्रिया हर शहर-हर गांव में मुहल्ले और बस्ती के स्तर तक हिंदू-मुसलमान विद्वेष पैदा कर सकता है। इसमें नरेंद्र मोदी को भारत के प्रमुख हिस्सों में हिंदू हृदय सम्राट फिर बना देने की अपार संभावनाएं हैं। कैब आने वाले दिनों में विभिन्न विधानसभा चुनावों और फिर, 2024 आम चुनावों में बीजेपी का गहना होने की संभावना है।

यह सब तो बीजेपी के लिए अच्छा-अच्छा है। लेकिन राजनीतिक तौर पर कहें, तो कैब अच्छा नहीं है। न तो यह राष्ट्रीय हित में है, न लंबे समय तक के लिए बीजेपी के हित में। इसके साथ पहली दुर्घटना नरेंद्र मोदी के साथ ही होने की आशंका है जिनके साये तले अमित शाह हिंदू हृदय सम्राट के तौर पर उभर रहे हैं। तीन तलाक बिल हो या अनुच्छेद 370 हटाने का बिल हो या फिर, इस वक्त का कैब हो, अमित शाह ने न सिर्फ इन कानूनों को पेश किया बल्कि इन सभी सुधारात्मक कानूनों के लिए बीजेपी-भक्तों के बीच ढेरों प्रशंसा भी पाई। एक हिंदू नेता के तौर पर नरेंद्र मोदी की तुलना में अब अमित शाह के पास अधिक प्रमाण पत्र हैं- शाह ही भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का पूरा प्रयत्न कर रहे हैं। कौन जानता है कि अगले दौर में शाह खुद को मोदी की तुलना में बेहतर हिंदू नेता के तौर पर तैयार कर रहे हों। दशकों से बीजेपी बीट कवर कर रहे एक वरिष्ठ पत्रकार कहते भी हैं, “शाह अब निश्चित ही मोदी के लिए रिस्क बन गए हैं।”

कैब ने बीजेपी-विरोधी विपक्ष को आपस में और निकट ला दिया है। श्रीमती सोनिया गांधी से लेकर शरद पवार, ममता बनर्जी, सीताराम येचुरी तक- सभी बड़े विपक्षी नेता न सिर्फ कैब का विरोध कर रहे हैं, वे यह भी कह रहे हैं कि विपक्ष के लिए हाथ मिलाकर काम करने का यही अवसर है। शरद पवार ने कहा भी हैः “मैं बीजेपी के खिलाफ बनने वाले किसी भी फ्रंट में शामिल होने के लिए तैयार हूं।” अब ये कैब बीजेपी के खिलाफ विपक्षी फ्रंट बनाने का निश्चित तौर पर मौका देगा।

दूसरी बात, संसद में कैब का समर्थन करने वाली क्षेत्रीय पार्टियां और बीजेपी के सहयोगी दल नए नागरिक कानून के साथ असहज हैं। लोकसभा में इस बिल का समर्थन करने पर अगले ही दिन जनता दल (यूनाइटेड) में असहमति के स्वर उभरने लगे; अकाली दल में भी बीजेपी से अलग होने का अदर ही अंदर दबाव है; अनुच्छेद 370 हटाने और कई अन्य मुद्दों पर संसद के अंदर बीजेपी का समर्थन करने वाली तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के नेता मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने कैब के मुद्दे पर बीजेपी से दूरी बना ली। इसलिए, भले ही अभी न दिख रहा हो, आने वाले दिनों में बीजेपी के कई सहयोगी भी उससे अलग हो सकते हैं।

लगभग पूरा पूर्वी भारत और पूर्वोत्तर कैब के खिलाफ उबल रहा है। ममता ने नए नागरिकता कानूनों के खिलाफ निरंतर संघर्ष की घोषणा की है और इसी कारण उपचुनावों में उनकी पार्टी- तृणमूल कांग्रेस, की बंगाल में जीत भी हुई है। असम और पूर्वोत्तर राज्यों के लोग इस कानून के विरोध में सड़कों पर आ गए हैं। बीजेपी के सहयोगी असम गण परिषद में फूट पड़ गई है जबकि छात्र संगठन- आसू, इस कानून के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन कर रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर देखें, तो यह कानून देश को धार्मिक आधार पर विभाजित करने के बीज बो रहा है, जिससे लंबे समय तक घाव होता रहेगा। पूर्वोत्तर और दक्षिण क्षेत्र की पार्टियों और वहां की जनता को ऐसे कानून पर गंभीर आपत्तियां हैं, जो नागरिकता- जैसे संवेदनशील मुद्दे पर राज्यों के ऊपर केंद्र को वरीयता देते हैं। त्रिपुरा के एक सांसद ने कहा भी किः “बीजेपी अभी नहीं समझ रही है कि इसने राष्ट्रीय एकता पर किस तरह खतरा पैदा किया है। जल्दी ही इस मुद्दे पर उसे विवादग्रस्त पूर्वोत्तर से जूझना होगा।”

अमित शाह ने भले ही संसद से नए नागरिकता कानून को पास करा लिया हो और भारत को संघ के हिंदू राष्ट्र के सपने के करीब ला दिया हो, लेकिन मोदी-शाह टीम ने ऐसी पिटारी का ढक्कन खोल दिया है, जिससे करीब 20 करोड़ मुसलमान बिल्कुल हाशिये पर चले गए हैं और साथ ही साथ इस वजह से राष्ट्रीय एकता में दरारें आ गई हैं। अब राष्ट्रीय राजनीति किस दिशा में जाएगी, इसकी कल्पना कोई भी कर सकता है। कैब ने भारत को खतरनाक राजनीतिक विमर्श में डाल दिया है जहां से उसे वापस लाना बहुत ही मुश्किल होगा।

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