मोदी सरकार में गहराता जा रहा है मातृत्व काल में मृत्यु का संकट

मोदी सरकार की ही रिपोर्ट लगातार बताती रही हैं कि डॉ मनमोहन सिंह की सरकार में सामाजिक-आर्थिक विकास मोदी सरकार की तुलना में अधिक था। बस अंतर यह था कि मनमोहन सिंह ने बिना प्रचार किए विकास किया और नरेंद्र मोदी के राज में केवल प्रचार है विकास नहीं है।

मोदी सरकार में गहराता जा रहा है मातृत्व काल में मृत्यु का संकट
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मोदी सरकार में महिला सशक्तीकरण के नारों और दावों के बीच मातृ मृत्यु अनुपात में गिरावट आना बंद हो गया है। संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य के अनुसार वर्ष 2030 तक मातृ मृत्यु दर को 70 से नीचे पहुंचाना है, पर वर्ष 2000 से 2024 के बीच भारत में इसकी कमी की दर के अनुसार 70 का आंकड़ा छूने में भारत को अभी 85 वर्ष और लगेंगे।

संयुक्त राष्ट्र की एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार गरीब देशों को मानवीय सहायता के लिए अमीर देशों द्वारा दी जाने वाली राशि में अभूतपूर्व कटौती का सामना करना पड़ रहा है, इसका सीधा असर महिलाओं के स्वास्थ्य पर देखा जा रहा है। वर्ष 2025 में अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका के साथ ही जर्मनी, फ़्रांस, यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों ने भी ऐसी सहायता राशि में सर्वाधिक कटौती की है, इसके कारण वैश्विक स्तर पर गरीब देशों की 10 लाख से अधिक महिलायें इस मानवीय सहायता और देखभाल के दायरे से बाहर हो गई हैं। दूसरी तरफ दुनिया में युद्ध, गृहयुद्ध और आतंक का दायरा और प्रभाव भी लगातार बढ़ता जा रहा है, इसका भी सर्वाधिक प्रभाव महिलाओं पर पड़ रहा है। महिलाओं में भी गर्भवती महिलाओं पर इसका सबसे अधिक असर पड़ता है, जबकि उन्हें विशेष देखभाल और आहार की जरूरत रहती है।

दुनिया के 53 अशांत देशों में महिलाओं के विकास और सशक्तीकरण के क्षेत्र में कार्यरत 855 गैर-सरकारी संगठनों के सर्वेक्षण के बाद इसमें से 90 प्रतिशत से अधिक संगठनों ने दावा किया कि आर्थिक अभाव में उन्हें कई परियोजनाएं बंद करनी पड़ रही है, 92 प्रतिशत का दावा है कि उनके कार्यक्षेत्र में गरीबी बढ़ती जा रही है, 82 प्रतिशत का दावा है कि बालिकाएं बड़े पैमाने पर शिक्षा से बाहर आ रही हैं और युद्ध के कारण महिलाओं से बलात्कार की घटनाएं दोगुनी से अधिक हो गई हैं। इन संगठनों का दावा है कि आर्थिक प्रतिबंधीं के कारण मातृ मृत्यु दर तेजी से बढ़ रही है। इजरायल ने गाजा पर हमलों के दौरान भी अस्पतालों और सहायता समूहों को निशाना बनाया था, इसका सीधा असर गर्भवती महिलाओं पर पड़ा था और इलाज और देखभाल के अभाव में बड़ी संख्या में गर्भवती महिलाओं की मृत्यु दर्ज की गई थी।

फरवरी 2026 में संयुक्त राष्ट्र की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार युद्ध और अशान्ति वाले क्षेत्रों में मातृ मृत्यु पांच-गुना तक बढ़ जाती है। वर्ष 2023 में वैश्विक स्तर पर कुल मातृ मृत्यु का आंकड़ा 2,60,000 था, जिसमें से 1,60,000 से अधिक मृत्यु अशांत और युद्ध क्षेत्रों में दर्ज की गई थी। एक अध्ययन के अनुसार युद्ध और अशांत क्षेत्रों की दुनिया के कुल शिशुओं  के जन्म में महज 10 प्रतिशत भागीदारी रहती है, पर इन क्षेत्रों का मातृत्व मृत्यु में योगदान 60 प्रतिशत से भी अधिक है। शांत क्षेत्रों में 593 गर्भवती महिलाओं में से गर्भ धारण के दौरान औसतन 1 महिला की मृत्यु होती है, संस्थागत और सामाजिक तौर पर पिछड़े क्षेत्रों में यह दर 79 में एक और युद्ध क्षेत्रों में 51 में 1 रहती है।

फरवरी 2023 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2000 में प्रति एक लाख शिशु-जन्म में 339 गर्भवती महिलाओं की मृत्यु हो जाती थी, यह संख्या वर्ष 2015 तक 227 ही रह गई थी। फिर 2020 में यह संख्या 223 दर्ज की गई, यानि वैश्विक स्तर पर इस क्षेत्र में वर्ष 2000 से 2015 तक बहुत प्रगति हुई पर इसके बाद यह आंकड़ा लगभग स्थिर हो गया। इस क्षेत्र में अब तेजी से काम करने की जरूरत है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य के अनुसार इस संख्या को 70 से नीचे लाना है।

अप्रैल 2025 में यूएन पौपुलेशन फंड की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2023 में वैश्विक स्तर पर 2,60,000 गर्भवती महिलाओं की मृत्यु दर्ज की गई– यह आंकड़ा हरेक दिन के लिए 712 का है, यानि हरेक 2 सेकंड में दुनिया में कहीं ना कहीं एक गर्भवती महिला की मृत्यु हो जाती है। इतनी बड़ी संख्या होने के बाद भी यह संख्या वर्ष 2000 की तुलना में 40 प्रतिशत कम है। कुल मातृ मृत्यु में से 90 प्रतिशत से अधिक गरीब और मध्यम आय-वर्ग के देशों में दर्ज की जाती है। सहारा-अफ्रीका के देशों में दुनिया के कुल मातृ मृत्यु में से 70 प्रतिशत से अधिक मामले दर्ज किए जाते हैं जबकि दक्षिण और मध्य एशिया के देशों के लिए यह आंकड़ा 17 प्रतिशत है। युद्ध और अशान्ति से घिरे 37 देशों में सम्मिलित तौर पर जितनी मातृ मृत्यु होती है, वह पूरी दुनिया में होने वाली ऐसी मृत्यु का 64 प्रतिशत से अधिक है।


स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार अधिकतर मातृ मृत्यु को रोका जा सकता है, पर सामाजिक-आर्थिक कारणों से इस तरफ पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है। हमारे देश में हरेक सामाजिक समस्या की तरह ही मातृ मृत्यु दर के सही आंकड़ों को खोज पाना दुरूह कार्य है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वर्ष 2023 में भारत में प्रति एक लाख शिशुओं के जन्म पर 80 मातृ मौतें दर्ज की जाती हैं। जाहिर है यह आंकड़ा भारत सरकार ने दिया होगा, पर इसका कोई आधार नहीं है, कोई भी सरकारी रिपोर्ट या संसद का वक्तव्य 80 का आंकड़ा नहीं दिखाता है।

मई 2026 में सैम्पल रेजिस्ट्रैशन सिस्टम 2022-2024 के आंकड़े सार्वजनिक किए गए, इसके अनुसार देश में मातृ मृत्यु दर 87 है। 13 मार्च 2026 को लोकसभा में अनस्टार्ड प्रश्न 3474 के जवाब में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय में राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने यह संख्या 88 बताई थी। प्रेस इनफार्मेशन ब्युरो द्वारा 21 मार्च 2025 को प्रकाशित विज्ञप्ति के अनुसार देश में मातृ मृत्यु दर 97 है। नीति आयोग की साइट पर सस्टैनेबल डेवलपमेंट गोल्स के क्षेत्र में भारत की प्रगति दर्शाती सबसे हालिया रिपोर्ट 2023-2024 की है, इसमें आंकड़ा 97 का है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण सांख्यिकी, प्रकाशित करता है। इस श्रंखला में सबसे हालिया प्रकाशन वर्ष 2023 का है, इसमें भी मातृ मृत्यु दर 97 ही बताई गई है। राज्यसभा में अनस्टार्ड प्रश्न के उत्तर में 7 फरवरी 2024 को भी यही संख्या प्रस्तुत की गई थी।  

प्रेस इनफार्मेशन ब्युरो की 7 फरवरी 2024 की एक विज्ञप्ति के अनुसार यूएन-एमएमईआईजी 2020 रिपोर्ट "ट्रेंड्स इन मैटरनल मोर्टलिटी" के अनुसार भारत का मातृ मृत्यु दर (एमएमआर) 2000 में 384 से घटकर 2020 में 103 हो गया है, जबकि वैश्विक एमएमआर 2000 में 339 से घटकर 2020 में 223 हो गया है। वैश्विक एमएमआर में कमी (रिडक्शन) की औसत वार्षिक दर 2000-2020 की अवधि में 2.07 प्रतिशत थी, जबकि भारत के एमएमआर में तीन गुना से अधिक यानि 6.36 प्रतिशत की कमी आई है।

इस तरह के आंकड़ों पर खुश होने का मतलब है कि भारत अपने आप को गरीब अफ्रीकी देशों के समतुल्य मानता है और उनसे ही अपनी तुलना करना चाहता है। वैश्विक स्तर पर कुल मातृ मृत्यु में से 70 प्रतिशत से अधिक अफ्रीकी देशों में होती है, जाहिर है वैश्विक औसत में उनकी बड़ी भागीदारी रहती है। मातृ मृत्यु अनुपात नॉर्वे में 1, इजरायल और ऑस्ट्रेलिया में 2, संयुक्त अरब अमीरात और जापान में 3, स्वीडन, दक्षिण कोरिया और जर्मनी में 4, सऊदी अरब और फ़्रांस में 7, कुवैत, फ़िनलैंड और यूनाइटेड किंगडम में 8, रूस में 9, कनाडा में 12, चीन में 16, अमेरिका में 16, अर्जेन्टीना में 33, मेक्सिको में 42 और ब्राजील में 67 है। लगातार युद्ध की विभीषिका झेल रहे देशों में भी स्थिति भारत से बहुत बेहतर है। मातृ मृत्यु अनुपात लेबेनान में 15, ईरान में 16, फिलिस्तीन में भी 16, यूक्रेन में 15 और सीरिया में 20 है।

भारत के पड़ोसी देशों में बांग्लादेश, नेपाल, म्यांमार, पाकिस्तान और अफगानिस्तान को छोड़कर सभी देश हमसे बेहतर हैं। मातृ मृत्यु अनुपात चीन में 16, श्रीलंका में 18 और भूटान में 47 है। बांग्लादेश में यह अनुपात 115, नेपाल में 142, पाकिस्तान में 155, म्यांमार में 185 और अफगानिस्तान में 521 है। सबसे बुरी स्थिति नाइजीरिया की है, यहां का आंकड़ा 993 है, इसके बाद चाड में 748, दक्षिणी सूडान में 692, सेंट्रल अफ्रीकी रिपब्लिक में भी 692 और लाइबेरिया में 628 है।

मातृ मृत्यु तब होती है जब एक महिला गर्भवती होती है या गर्भपात के 42 दिनों के भीतर, गर्भावस्था या उसके प्रबंधन से संबंधित किसी भी कारण (आकस्मिक या अप्रत्याशित कारणों को छोड़कर) से मृत्यु होती है। महिलाओं और नवजात शिशुओं की भलाई सुनिश्चित करने और वैश्विक स्वास्थ्य लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए मातृ मृत्यु दर पर ध्यान देना आवश्यक है। मातृ मृत्यु (प्रसवकालीन मृत्यु) दर के प्रमुख संकेतकों में से एक मातृ मृत्यु अनुपात (एमएमआर) है, जिसे एक निश्चित समय अवधि के दौरान प्रति 100,000 जीवित बच्चों के जन्म पर मातृ मृत्यु की संख्या के रूप में परिभाषित किया जाता है।


देश की बीजेपी सरकार में हरेक सामाजिक-आर्थिक उपलबद्धि केवल सत्ता के प्रचार तंत्र में नजर आती है, जमीनी स्तर पर हम विकास नहीं कर रहे बल्कि पहले से पिछड़ते जा रहे हैं। मोदी सरकार की ही रिपोर्ट लगातार बताती रही हैं कि डॉ मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में सामाजिक-आर्थिक विकास मोदी सरकार की तुलना में अधिक था। बस अंतर यह था कि डॉ मनमोहन सिंह ने बिना प्रचार किए विकास किया और नरेंद्र मोदी के राज में केवल प्रचार है विकास नहीं है। मातृ मृत्यु दर के संदर्भ में ऐसा ही है।

वर्ष 2016 में अनस्टार्ड प्रश्न 1100 के उत्तर में लोकसभा में बताया गया था कि वर्ष 2007 से 2013 के बीच मातृ मृत्यु अनुपात 212 से घटकर 167 तक पहुंच गया था, यह पूरा दौर डॉ मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री काल का था। इन आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2007 से 2013 के बीच मातृ मृत्यु अनुपात में हरेक वर्ष औसतन 6 अंकों की गिरावट दर्ज की गई। दूसरी तरफ वर्ष 2014 से 2024 तक मोदी राज है और यह गिरावट महज 4 अंकों की ही रह गई। वर्ष 2020 से 2024 के बीच तो मातृ मृत्यु दर में प्रति वर्ष गिरावट महज 0.2 अंकों की ही है – इस दर से संयुक्त राष्ट्र के वर्ष 2030 के सतत विकास लक्ष्य, 70, तक पहुंचने में भारत को अभी 85 वर्ष और लगेंगे।

हमारे देश के राज्यों में भी मातृ मृत्यु दर के आंकड़ों में बहुत अंतर है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार जब देश का औसत 97 था, तब केरल के लिए यह संख्या 19 थी, महाराष्ट्र में 33, तेलंगाना में 43, आंध्र प्रदेश में 45, तमिलनाडु में 54, झारखंड में 56, गुजरात में 57 और कर्नाटक में 69 थी। दूसरी तरफ लंबे समय से बीजेपी के शासन में रहे असम, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के लिए मातृ मृत्यु दर के आंकड़े क्रमशः 195, 173 और 167 हैं।

देश में मातृ मृत्यु दर की समस्या गंभीर है पर यह कोई राजनैतिक मुद्दा नहीं है। देश की संसद में भी शायद की कभी इससे संबंधित सवाल पूछे जाते हैं। प्रधानमंत्री मोदी की कार्यशैली में सबसे प्रमुख है– जहां असफल रहते हैं वहां भरपूर प्रचार और नारेबाजी करते हैं। महिला सशक्तीकरण, लखपति दीदी, लाड़ली बहना और जननी सुरक्षा के नारे बढ़ते जाते हैं और मातृ मृत्यु अनुपात जैसे मुद्दे पूरी तरह नजरों से ओझल कर दिए जाए हैं – विकसित भारत का पूरा आधार इसी प्लेबुक पर टिका है।

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