‘विश्वगुरु’ भारत की सन्नाटे भरी चुप्पी

पश्चिम एशिया संकट पर पीएम मोदी का संसद में बयान एक नेता का संबोधन नहीं था।

‘विश्वगुरु’ भारत की सन्नाटे भरी चुप्पी
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योगेंद्र यादव

और कुछ भी हो, यह विश्वगुरु के प्रधानमंत्री का तो नहीं था। अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का डंका बजाने वाला या कम-से-कम ऐसा गुरूर रखने वाला शख्स भी नहीं था। सच कहें तो यह राजनेता ही नहीं था, और न ही रंगमंच पर डायलॉग बोलता अभिनेता।

अगर पश्चिम एशिया के संकट पर संसद में प्रधानमंत्री का बयान सुना हो, तो आप उस शख्स को पहचान नहीं पाएंगे जिसे पिछले ग्यारह बरस में न जाने किस-किस मंच से सुना होगा। हुंकार, ललकार, फुंकार - सब गायब था। बस सरकार की बोझिल भाषा थी। बुझा हुआ चेहरा था। फीकी आंखें थीं। लिखे हुए भाषण को शब्दशः पढ़ने की चिंता थी, कहीं कोई शब्द इधर से उधर न हो जाए, कहीं वॉशिंगटन से फोन न आ जाए। न जुमले, न ताली पिटाऊ डायलॉग और न कोई चुटकी। मेज थपथपाने वाले भी बीच-बीच में एक थपकी देकर रस्म अदायगी कर रहे थे। इस भाषण को आप एक मैनेजर की रिपोर्ट कह सकते हैं, या फिर मुनीम की बही, या फिर रंगमंच से किनारे कर दिए गए अभिनेता का नेपथ्य में दिया एकालाप। यह एक नेता का संबोधन नहीं था।

होता भी कैसे। पश्चिम एशिया के नवीनतम प्रकरण ने प्रधानमंत्री को कुछ कहने लायक नहीं छोड़ा है। अमेरिका की तमाम लल्लो-चप्पो के बावजूद ट्रंप मोदी जी को घास डालने को तैयार नहीं हैं। ट्रेड डील पर घुटने टेकने के बाद भी ऊपर से भारत के खिलाफ जांच शुरू करवा दी है। सुनते हैं अमेरिका ने ईरान से मध्यस्थता के लिए पाकिस्तान को चुना है, भारत का कहीं कोई नाम नहीं है। युद्ध से दो दिन पहले गले में इजरायली मेडल बंधवाने के बावजूद इजरायल की तरफ से मोदी जी का कहीं कोई नाम नहीं है। भारत में इजरायल को झप्पी मारने को आतुर जमात भले ही खड़ी कर दी गई हो, इजरायल में भारत प्रेम की कोई लहर नहीं है।

नए दोस्त बने नहीं, पुराने जरूर छूट गए। दशकों तक भारत को अपने दोस्तों में गिनने वाला ईरान अब भारत को अपने प्रतिद्वंद्वी खेमे में गिनता है। दोष ईरान का नहीं है। संसद में अपने बयान में प्रधानमंत्री ने बिना नाम लिए ईरान को निशाने पर लिया- व्यावसायिक जहाजों और ऊर्जा स्रोतों को निशाना बनाने पर चिंता जताई। लेकिन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष एक शब्द भी अमेरिका और इजरायल द्वारा किए बेवजह और गैर कानूनी हमले पर नहीं बोला।


जाहिर है होर्मुज खाड़ी में जिन देशों को जहाज निकालने की अनुमति है, उनमें भारत का नाम नहीं है। सुनते हैं जब मोदी जी ने ईरान के राष्ट्रपति को इस बाबत फोन किया, तो उन्होंने संकट की इस घड़ी में भारत सरकार द्वारा किए गए बर्ताव की सूची गिनवा दी। रूस भी अब रूठा हुआ दिख रहा है। पहले भारत सरकार ने ट्रंप के आदेश पर रूस का तेल खरीदना बंद कर दिया। खाड़ी संकट आने पर फिर रूस की याद आई तो अब रूस ने मुंह फेर लिया। कहा, अब दोस्त वाला रेट नहीं लगेगा, बाजार का प्रीमियम वाला रेट देना पड़ेगा। कोई सत्तर साल पुरानी दोस्ती में गांठ पड़ गई।

युद्ध के मैदान के बाहर अंतरराष्ट्रीय मंच को देखें, तो वहां भी भारत कहीं नजर नहीं आता। जब पूरी दुनिया किसी संकट से जूझ रही हो, उस वक्त विश्वपटल पर नेतृत्व की जरूरत होती है, सच्चे नेता की पहचान होती है। जब स्वेज नहर के मुद्दे पर ब्रिटेन और फ्रांस ने मिस्र पर हमला किया था, तब एक आर्थिक और सामरिक तौर पर कमजोर भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने खुलकर मिस्र के समर्थन में जुबान खोलने की हिम्मत दिखाई थी, साम्राज्यवादी ताकतों की गुंडागर्दी के खिलाफ भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जनमत खड़ा किया था।

तब नेहरू की पहचान विश्वपटल पर एक नेता के रूप में बनी थी, भारत का सिर ऊंचा हुआ था। आज दुनिया वह सच सुनने के लिए स्पेन के प्रधानमंत्री के बयान सुनती है, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की ओर देखती है, श्रीलंका के प्रधानमंत्री की सराहना करती है। भारत की तरफ कोई नहीं देख रहा। विश्वगुरु और दुनिया में डंका बजने जैसे चुटकुले पर अब हंसने का मन भी नहीं करता।

जब बोलना जरूरी हो और कहने को कुछ न हो, तो इधर-उधर की बात करनी पड़ती है। प्रधानमंत्री की भी यही मजबूरी थी। मानवता के हित की अमूर्त बात, युद्ध शुरू करने वालों का नाम लिए बिना शांति की वकालत, सभी पक्षों से तनाव कम करने का खोखला आग्रह। दुनिया के संकट में अपनी संवेदनशीलता और सतर्कता के छोटे दावे, मानो भारत की चिंता का दायरा अब केवल खाड़ी में फंसे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और तेल की उपलब्धि तक तक सीमित रह गया है।


उसका ब्यौरा देने में भी सच से किफायत की - यह तो बताया कि भारत के पास तेल का कितना रिजर्व है, लेकिन यह नहीं बताया कि यह सिर्फ एक हफ्ते लायक है। यह नहीं बताया कि चीन ने तीन महीने का रिजर्व बनाया और हमने तीन हफ्ते का भी नहीं। तेल में एथनॉल डालने का श्रेय तो लिया, लेकिन यह नहीं बताया की पिछले दस वर्ष में देश में तेल खोजने वाली कंपनी ओएनजीसी का भट्ठा किसने बैठाया।

जब पूरी दुनिया के सामने बड़ा संकट हो, और एक नेता देश की सर्वोच्च पंचायत में अपने छोटे फायदे के छोटे ब्यौरे पेश करे, तो उससे सिर्फ उसका कद छोटा नहीं होता। उससे पूरे देश का माथा नीचा होता है।

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