राजपथ के दायरे में बदलाव का फैसला एक व्यक्ति के अंगूठे के नीचे सब कुछ करने की कुटिल चाल है

जादूगरी वाले चमकदार हैट से इस बार जो खरगोश निकला, वह ये है कि1950 के बाद जो भी बना, उसे जमींदोज कर दो। उन्हें लोगों की याददाश्त से मिटा दो। उनकी जगह 2024 तक कुछ चीजें बना दो। ये साल इसलिए चुना गया, क्योंकि उसी साल इस जादूगर के धरती पर आए 75 साल हो जाएंगे।

फोटोः सोशल मीडिया
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सुहेल हाशमी

भारत आर्थिक संकट में इतना गहरे डूब गया है कि जिन्हें आंकड़ों की बाजीगरी की कला में मास्टरी हो गई है और जिनकी राजनीतिक ट्रेनिंग सच्चाई के साथ अव्वल दर्जे तक छेड़छाड़ करने की है, वे भी निर्माण कार्य के जरिये भारी-भरकम विकास के मोहरे के चिरपरिचित तरीके पर निर्भर हो गए हैं।

जादूगरी वाले चमकदार हैट से इस बार जो खरगोश निकाला गया है, वह यह है कि1950 के बाद जो कुछ भी निर्माण किया गया है, उसे जमींदोज कर दो, उन्हें लोगों की याददाश्त से मिटा दो और उनकी जगह 2024 तक कुछ चीजें बना दो। 2024 का साल इसलिए चुना गया है, क्योंकि उस साल यह जो जादूगर है, उसे धरती पर आए 75 साल हो जाएंगे और यही वह साल है जो दिल्ली को स्मार्ट सिटी बनने की राजकीय घोषणा वाला होगा। साल 2024 चुनने की एक अन्य वजह यह है कि यही वह साल है जब वर्तमान सत्ताधीश अगले पांच साल के लिए फिर से चुने जाने की आशा करेंगे, ताकि वे जो कुछ अभी कर रहे हैं और जो वे आगे करने वाले हैं, उसे जारी रख सकें।

यह जानना रोचक है कि वह सब कुछ जो देश में अभी हो रहा है, वह कैसे किसी साल से या इस जादूगर के जीवन की वर्षगांठ के परिचय से जोड़ दिया गया है। यह भी उल्लेख करने योग्य है कि चंद्रमा के अंधेरे वाले हिस्से पर चंद्रयान-2 की लैंडिंग जिस दिन होनी थी, वह इस सरकार के 100 दिन पूरे होने का मौका था और चूंकि यह लैंडिंग योजना के अनुरूप नहीं हुई, वह भविष्य सूचक मुहावरा अन्यत्र बोला गया कि यह तो महज ट्रेलर है और पूरी फिल्म अभी बाकी है। इसीलिए इस बात में दम लगता है कि दिल्ली में राजपथ और इसके आसपास के भवनों को जमींदोज करने/उन्हें फिर से बनाने/उनमें कुछ नया जोड़ने की घोषणा, दरअसल, 17 सितंबर को इस जादूगर के जन्मदिन के मौके पर की जानी थी।

यह घोषणा निर्धारित समय से पहले इसलिए करनी पड़ी क्योंकि चंद्रयान-2 की लैंडिंग से जो उत्साह का ज्वार पैदा किया जाना था, वह हो नहीं पाया। विज्ञान की वेशभूषा धारण करने वाली टेक्नोलॉजी चमत्कार करने में विफल रही और इसलिए एक अलग मोड़ दिए जाने की जरूरत पड़ गई- एक नए तमाशे को पैदा करना या कम-से-कम उसका वायदा करना जरूरी था। कौन-से भवन में क्या कुछ नया जोड़ा जाएगा और किन्हें बिलकुल जमींदोज कर दिया जाएगा, इस बारे में नजरिया साफ नहीं है और इसे शायद इस बात से समझा जा सकता है कि इन सबके बारे में आधा-अधूरा दस्तावेज जारी कर दिया गया। यह भी संभावना है कि अस्पष्टता जान-बूझकर रखी गई हैः वे ढहाने का काम पहले शुरू करेंगे क्योंकि वे अब भी यह नहीं जानते हैं कि वह बनाना क्या चाहते हैं। वह ऐसा ही शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्रों में भी कर रहे हैं और इसीलिए यह भी उनके ‘युगांतकारी कदमों’ में से एक है।

लेकिन जो कुछ हो रहा है, वह तमाशा भर नहीं है। यह उसका एक हिस्सा है, क्योंकि बड़ी चीजें होने की अनुभूति बनाए रखना अपने स्वामी की छवि से भक्तों को भरमाए रखने के लिए जरूरी है। देश की आधारशिला रखने वालों ने जो चीजें बनाईं, उन्हें तहस-नहस करने की योजना को जारी रखना जरूरी है। राजपथ और इसके आसपास की सभी चीजों का पुनर्निर्माण और उनके नक्शे में बदलाव की योजना, दरअसल, इस स्वामी के सत्ता में आने से पहले से संबद्ध सभी चीजों को जनता के दिलोदिमाग से मिटाने की प्रक्रिया का अंग है।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की याद को तथाकथित स्वच्छता अभियान के नाम पर कचरे के हर डिब्बे पर सिर्फ चश्मे तक समेट देना शुरुआत भर थी, नेहरू जैकेट का मोदी जैकेट के रूप में नाम बदलना अगला कदम था, और उसके बाद तो विरासत को तहस-नहस करने के लिए कई कदम उठाए गए। खास तौर पर हर उस चीज को लेकर जिनसे पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की याद जुड़ी हुई हो। जेएनयू को दो वजहों से क्रमबद्ध तरीके से निशाना बनाया गया- इसका नाम और तर्क तथा विचार-विमर्श की इसकी संस्कृति, अकादमिक श्रेष्ठता की इसकी परंपरा और लोकतंत्र तथा असहमति के प्रति इसका सम्मान।

अभी जो सत्ता में है, उन्हें इन बातों से घृणा है क्योंकि वे पंडित नेहरू से संबद्ध हर चीज के लिए नफरत से भरे हैं। प्रगति मैदान में भी जो पहली चीज ढहाई गई, वह थी स्थायी नेहरू पेवेलियन और अब नेहरू मेमोरियल म्यूजियम को सभी प्रधानमंत्रियों के म्यूजियम के तौर पर बदला जा रहा है। यह विचार कि नई इमारतें न्यू इंडिया की रचना करेंगी, उतना ही खोखला है जितना यह दावा कि पिछले 70 साल में कुछ भी नहीं हुआ और भारत ने जो कुछ प्रगति हासिल की, वह पिछले 5 साल में हुई। कहा गया है कि संसद भवन ने अपनी उपयोगिता खो दी है और सदस्यों के लिए और जगह की जरूरत है। पहली लोकसभा में 489 सदस्य थे। अब निर्वाचित सदस्यों की संख्या बढ़कर 543 हो गई है। प्रसंगवश, पिछली लोकसभा में औसत उपस्थिति 80 प्रतिशत थी, मतलब लगभग 456 सदस्य नियमित तौर पर उपस्थित हो रहे थे। उपस्थिति को भूल भी जाएं, तब भी यहां सदस्यों के बैठने में कोई दिक्कत नहीं हुई है।

यह भी कहा जा रहा है कि यह भवन पुराना है। ये लोग वास्तव में जानते भी हैं कि पुराने का मतलब क्या होता है? ब्रिटिश संसद ऐसे भवनों के कॉम्प्लेक्स में है जो 13वीं शताब्दी या उससे पहले के हैं। अभी जो इमारत है, उसका निर्माण 1870 में पूरा हुआ। फ्रांस की नेशनल एसेंबली के भवन का निर्माण 1728 में पूरा हुआ। अमेरिका में हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट की बैठकें जहां होती हैं, वे 1859 से हो रही हैं।

अभी अपना जो संसद भवन है, उसे पहले नेशनल एसेंबली बिल्डिंग कहा जाता था और उसका उद्घाटन महज 92 साल पहले, 1927 में हुआ था। कहा गया है कि तंग हो गए नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक, सेंट्रल सेक्रेटेरियट परिसर और यत्र-तत्र बिखरे उद्योग, कृषि, एचआरडी, रेलवे, हाउसिंग आदि के मंत्रालयों को ऐसे मेगा कॉम्प्लेक्स में ले जाया जाएगा जहां 70,000 केंद्रीय कर्मचारी एक छत के नीचे रहेंगे। आप ऐसे समय में इससे बड़ी नाकामयाबी की कल्पना नहीं कर सकते हैं कि जब सत्ता के विकेंद्रीकरण की जरूरत हो और ऐसी मांग भी की जा रही हो, तो हम ऐसा विचार ला रहे हैं जहां हर चीज केंद्रीकृत होने जा रही हो। हर चीज एक आदमी के अंगूठे के नीचे हो।

हमने पूर्वी किदवई नगर की नाकामयाबी से कुछ भी नहीं सीखा है। यहां हजारों आवासीय इकाइयां और सैंकड़ों दफ्तर और दुकानें एक साथ हैं और वहां न तो पार्किंग की जगह है, न सुगम ट्रैफिक के लिए रास्ता। यहां पानी की सप्लाई और ड्रेनेज के लिए भी अपर्याप्त जगह है। यहां ये व्यवस्थाएं करने से पहले आवंटन रोकने के लिए कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा।

राजपथ और इसके आसपास के इलाकों का रीमॉडेल करने की योजना आपदा को आमंत्रण देना है। यह ऐसे भवनों को जमींदोज करने की योजना है जिन्हें आधुनिक भारत बनाने वालों ने बनवाया था।

(लेखक भाषा, संस्कृति और इतिहास के विशेषज्ञ हैं)

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