आकार पटेल का लेख: दंगों की भारत में परिभाषा और इसमें सरकारी मशीनरी की सहमति और भागीदारी

भारत में दंगा शब्द के वह अर्थ नहीं समझे जाते हैं, जो दुनिया मानती है। यहां जब नागरिकों के खिलाफ दूसरे नागरिक सुनियोजित तरीके से संगठित हिंसा करते हैं, तो आमतौर पर सरकार इससे किनारा कर लेती है या फिर सरकारी मशीनरी भी सक्रिय रूप से इसमें हिस्सा लेती है।

उत्तर पूर्वी दिल्ली में 2020 में हुए दंगों के बाद इलाके में गश्त करती पुलिस (फोटो : Getty Images)
उत्तर पूर्वी दिल्ली में 2020 में हुए दंगों के बाद इलाके में गश्त करती पुलिस (फोटो : Getty Images)
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आकार पटेल

एक भीड़ द्वारा हिंसक तौर पर शांति भंग करने को दंगा शब्द से परिभाषित किया जाता है। पूरी दुनिया में आमतौर पर इस शब्द को लोग समाज की गुस्साई भीड़ द्वारा सरकार के खिलाफ किए गए कृत्य के तौर पर समझते हैं। मसलन, 1968 के पैरिस दंगे जो छात्रों द्वारा पूंजीवाद और उपनिवेशवाद के खिलाफ भड़के थे। या फिर, लॉस एंजेल्स के 1992 के दंगे जो रॉडनी किंग की मौत के जिम्मेदार पुलिस अफसर की रिहाई के बाद शुरु हुए थे।

इंग्लैंड के शहर-शहर में 2011 में पुलिस की घातक फायरिंग में नार्क डुग्गन नाम के व्यक्ति की मौत के बाद दंगे भड़के थे, जिसमें 5 लोगों की मौत हुई थी और 3000 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इस साल फ्रांस में जो दंगे हुए उनका कारण भी 17 वर्षीय एक लड़के की पुलिस के हाथों मौत से भड़के थे। इन दंगों में 3 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें से दो लोग जिंदा जल गए थे।

लेकिन भारत में इस शब्द के वह अर्थ नहीं समझे जाते हैं, जब नागरिकों के खिलाफ दूसरे नागरिक सुनियोजित तरीके से संगठित हिंसा करते हैं। हिंसा के ऐसे मामलों में सरकार तब तक किनारा किए रहती है जब तक कि हिंसा अपने आप ही नहीं थम जाती, बहुसंख्यक समुदाय खुद को एक हथियार के तौर पर प्रदर्शित कर खुद का जोश नहीं कम कर लेता, बलात्कार, लूट और हत्या की वारदातें नहीं रुक जातीं। कई बार सरकारी मशीनरी भी सक्रिय रूप से हिंसा में उसी भाव से हिस्सा लेती है जिस उत्तेजना से भीड़ भरी हुई होती है। ऐसी तमाम मिसालें हमारे सामने बिखरी पड़ी हैं।

ऐसे राज्य जिन्हें हम सबसे अच्छे शासित राज्य मानते हैं उनमें भी ऐसी हिंसा से होने वाले नुकसान को रोकने की क्षमता नहीं दिखती और इस मोर्चे पर वे मुख्यमंत्री भी नाकाम ही साबित हुए हैं जिन्हें सबसे सक्षम और काबिल माना जाता है। और,सच यह भी है कि बहुत से लोग इस हिंसा को सही मानते हैं, इनमें वह लोग भी शामिल हैं जो राज्य का नेतृत्व कर रहे हैं।


कुछ बरस पहले इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री से सवाल पूछा गया था कि, “मुजफ्फरनदर के दंगे आपसे पहले वाली सरकार के शासन में हुए थे, लेकिन जिन 44 मामलों में फैसला आया उनमें से 43 में आरोपी दोषमुक्त कर दिए गए। ऐसे में आपकी सरकारी अपील क्यों नहीं दाखिल कर रही है?”

इस पर मुख्यमंत्री का जवाब था, “मुजफ्फरनगर दंगों में चार्जशीट पूर्व सरकार ने दायर की थी थी। ये (दंगे) पूर्वाग्रह की नीतियों और सरकार की नाकामी का नतीजा था, जिनके दौर में पूरा समाज, जाति, मान्यता और धर्म के आधार पर विभाजित हो गया। हमारी सरकार के दौर में ऐसा नहीं है। अपील के सवाल पर, हम जो जरूरी होगा वह कदम उठाएंगे। अगर कोई जरूरत नहीं है, तो फिर हम अनावश्यक रूप से अदालत के मामले में दखल दें।?”

दरअसल, ऐसी हिंसा की जड़ में एक अंतर्निहित भावना है जो हमारे समाज के एक बड़े हिस्से में निरंतर मौजूद रहती है और जिसे राजनीति के माध्यम से भड़काया जाता है। फिर कोई बाहरी उकसावा इसमें आग लगा देता है: 1984 में एक हत्या, 1992 में बर्बरता का एक कार्य या 2002 में एक ट्रेन पर हुई एक घटना।

हमारे यहां होने वाले दंगों और दूसरे देशों में होने वाले दंगों में दूसरा अंतर सहजता और तत्परता का है। ऊपर दिए गए उदाहरणों में जो घटनाएं हैं उनसे दंगों की आशंका नहीं थी। भारत में, हम अच्छी तरह जानते हैं कि जानबूझकर किसी मुद्दे पर तापमान बढ़ाने के क्या परिणाम होंगे।

मवेशी परिवहन, गोमांस रखने, अंतरधार्मिक विवाह, तलाक का अपराधीकरण, या श्रीनगर में लागू नियमों जैसे केंद्र और बीजेपी शासित राज्यों द्वारा बनाए गए कानून या फिर असम में एनआरसी जैसी अप्रिय, भयावह और भ्रमित करने वाली कवायद को इन्हीं सब संदर्भ में देखा जाना चाहिए। इस किस्म के कदमों से मुद्दे निरंतर गर्म रहते हैं।


हाल के वर्षों में भारतीय अखबारों में लिखे गए लेखों को विक्टर क्लेम्परर की डायरी की तरह पढ़ने की जरूरत है। क्लेम्परर एक शिक्षाविद, भाषाओं के विद्यार्थी थे जिन्होंने 1930 के दशक में जर्मनी द्वारा उन पर और उन जैसे लोगों के साथ जो सुलूक किया था, उसका लेखा-जोखा रखा है। इस मोर्चे पर रोजाना कुछ न कुछ ऐसा ही हो रहा है, भले ही अर्थव्यवस्था कहीं की कहीं चली जा रही है या मणिपुर हिंसा में जल रहा है या लद्दाख में सीमा पर तनाव बरकरार है।

काशी विश्वनाथ मंदिर में इस माह जो कुछ हुआ उससे नतीजे भी वैसे ही होंगे जैसे कि अयोध्या के मामले में हुए थे। अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुना दिया था, जिस पर राजनीति में एक संपत्ति के विवाद के रूप में चर्चा नहीं हुई और सुप्रीम कोर्ट ने इसे इसी चश्मे से देखा। इसे एक पांच सदी पुरानी इमारत के खिलाफ बदले और प्रतिशोध की कार्यवाही के तौर पर पेश किया गया। बाबर ने 1526 में इब्राहीम लोदी को हराया था और 47 वर्ष की उम्र में उसकी मौत आगरा में एक ऐसी इमारत में हो गई थी जो पहले बनाई गई थी। तो फिर पहले से बनी इमारत किस तरह किसी और कितने पहले से बनी इमारत पर बन गई?

उत्तर प्रदेश के बागपत से बीजेपी सांसद सत्यपाल सिंह, जब वह आईपीएस अफसर थे तो उन्होंने एक लेख लिखा था। (यह लेख ‘प्रूविंग द हिस्ट्री ऑफ राम’ शीर्षक से रीडिफ पर 14 अप्रैल 2008 में प्रकाशित हुआ था। इसमें उन्होंने कहा था कि भगवान राम 8,69,108 वर्ष पहले हुए थे। अर्थात, मानवों की उत्पत्ति से 5,00,000 साल पहले। यह भी जाहिर है तब माना जाएगा जब किसी कोई विकासवाद के सिद्धांत को मान ले, क्योंकि उस समय देश की शिक्षा की अगुवाई कर रहे सत्यपाल सिंह ने तो इसे मामले से ही इनकार कर दिया था। सत्यपाल सिंह मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में मानव संसाधन विकास मंत्री थे।

यह देखना भी रोचक होगा कि काशी के मुद्दे को अदालती तौर पर सुलझाने के बाद दुनिया उसे कैसे देखेगी और एक बार सर्वे पूरा होने के बाद पैदा परिस्थितियों को हम कैसे नियंत्रित कर पाएंगे। यह मान लेना थोड़ी ज्यादती होगी कि सरकार को इस सबके प्रभावों की फिक्र है और वह संभावना या आशंका के आधार पर अपनी तैयारियां कर रही है।

और अंत में, वापस आते हैं कि भारत में दंगों को कैसे परिभाषित किया जाता है कि जब बहुसंख्यक संगठित तौर पर अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा आयोजित करते हैं। जब अल्पसंख्यक इसका जवाब देते हैं, और हम मणिपुर में ये सब देख ही रहे हैं, तो हिंसा को एक अलग श्रेणी में मान लिया जाता है और भारत में इसे एक अन्य नाम दे दिया जाता है।

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