मृणाल पांडे का लेख: कानपुर कांड और महामारी में कानून के रखवालों पर सनातन सवाल, आखिर इनका रखवाला कौन?

कोई व्यक्ति पुलिस की वर्दी पहनकर बाहर आता है, तो उससे उम्मीद बनती है कि अब वह जाति, धर्म या इलाकाई कबीलावादी आग्रहों से परे रहेगा। होता इसके उलट है क्योंकि हमारी राजनीति में कबीलावादी आग्रह लगातार बढ़ रहे हैं।

फोटो: सोशल मीडिया
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मृणाल पाण्डे

संवैधानिक लोकतंत्र का मतलब क्या है? एक ऐसा लोकतंत्र जहां जनता की चुनी विधायिका संविधान में उल्लिखित अधिकारों और कर्तव्यों की पृष्ठभूमि में कानून का पालन सबके लिए एक जैसा जरूरी बनाए। भय बिनु होय न प्रीति के अनुसार, कानून किताबों तक ही सिमटा न रहे बल्कि जमीन पर लागू होता और दिखता भी रहे, इसी के लिए दंड विधान के हथियार से लैस सरकारी पुलिस बल की संकल्पना भी गई। औपनिवेशिक भारत में पुलिस थाने जनता की जरूरतों से नहीं उपजे थे बल्कि विदेशी हुक्मरानों की ताकत के प्रतीक की बतौर कायम किए गए थे। इसलिए यातना देकर सच (या झूठ) उगलवाना पुलिसिया प्रणाली का एक भाग बन गया जो अब तक त्यागा नहीं गया है। इस तरह अंग्रेज हमको जाते-जाते एक सुसंगत न्याय प्रणाली और पुख्ता अदालतें भले दे गए हों, पर जनता के प्रति खुद को जवाबदेह मानने वाली ईमानदार पुलिस हमको उनसे विरासत में नहीं मिली। पर आजादी के 70 बरसों में हर रंग की सरकारें आईं और गईं, हम फिर भी पुलिस को अधिक न्याय प्रिय, अधिक ईमानदार और जनता के प्रति जवाबदेह क्यों नहीं बना पाए?

हाल में उत्तर प्रदेश के एक दुर्दांत अपराधी विकास दुबे और उसके लोगों द्वारा आठ पुलिस वालों की सरेआम हत्या करके फरार हो जाना दिखाता है कि हमारे यहां अपराधियों के दिल में पुलिस का भय लगभग मिट चला है। जो ब्योरे प्रकाश में आए हैं, वे दिखा रहे हैं कि एक जमाने में जहां पुलिस अपने मुखबिरों के नेटवर्क की मदद से अपराधियों की पकड़-धकड़ करती थी, अब पुलिस के कई थानों के अधिकारी खुद बड़े अपराधियों के मुखबिर बनकर उनको अपने इलाके की पुलिस द्वारा दबिश की पूर्व सूचना पहुंचा कर फरार होने में मदद कर रहे हैं। पूछने पर पुराने बड़े अफसर भी इसकी तसदीक करते हैं कि पिछले कुछ दशकों से देश के लगभग हर राज्य में जनता के लिए पुलिस बार-बार न्यायपालक की बजाय उत्पीड़क की भूमिका में सामने आने लगी है।

यह सही है कि राजनीतिक सरपरस्ती के दबाव से कई बार जानकारी होते हुए भी पुलिस को ज्ञात अपराधियों की तरफ तोता-चश्मी अख्तियार करनी पड़ती है। पर इसकी वसूली वह कस कर आम जनसे क्यों करती है? जनता, खास कर औरतों, दलितों और अल्पसंख्यकों को आज अपनी पुलिस खौफ का पर्याय नजर आती है। उधर जीवन में (और फिल्मों में भी) राजनीतिक संरक्षण प्राप्त अपराधी पुलिस या विधायक जी से कई बार करीबी दोस्तों की तरह बरताव करते दिखते हैं। इस विभाजित मानसिकता की ही वजह से अधिकतर थाने हैवानियत के गढ़ बन गए हैं। यकीन न हो तो आम लोगों से पूछिए जिनको हमारी जेल के तीन महीनों की बजाय थानों में पूछताछ के तीन दिन और अदालती चक्कर इतने भयावह लगते हैं कि अधिकतर कमजोर वर्गों के लोग रपटें दर्ज कराने के लिए थाना-कचहरी जाने से झिझकते हैं। नेशनल कैंपेन अगेन्स्ट टॉर्चर संस्था के अनुसार, 2019 में पुलिस हिरासत में 1,723 मौतें हुईं। इनमें से 125 मामलों के अध्ययन से उनका निष्कर्ष है कि अधिकतर (94 फीसदी) मौतें उत्पीड़न से हुई लगती हैं।

कभी सबकी खबर देने और सबकी खबर लेने का दावा करता रहा मुख्यधारा मीडिया इन दिनों या तो गोदी मीडिया बनकर सुरक्षित बन गया है या फिर छंटनियों से बेतरह असुरक्षित है। दोनों स्थितियों में विशुद्ध खोजी रपटें देने से वह बचता रहता है जब तक कि वे विपक्ष के खिलाफ न हों। विधायक के सरेआम कत्ल (ताजा मामला बागपत का है) जैसी स्टोरी भी जब मीडिया में उभरती है, तो कुछ घंटों के लिए पुलिस सुधारों पर हमारे खबरिया चैनलों और संपादकीय पन्नों में कई (1977-81 तक बैठी पुलिस कमीशन या 99 की रिबेरो कमिटी या 2000 की पद्मना भैया कमिटी या 2006 की प्रकाश सिंह कमिटी के) प्रस्तावित पुलिस सुधारों के लंबित रहने और पुलिस के राजनीतिकरण पर चर्चे गरम होते हैं। फिर बातचीत किसी और मुद्दे पर मोड़ दी जाती है। सोशल मीडिया और गैर सरकारी जनसेवी संस्थाओं में लाख खोट हों, उनका बड़े से बड़ा आलोचक भी यह मानता है कि वे आज जनता को (और अखबारों को भी) मुख्यधारा के बहुसंख्य गोदी मीडिया की तुलना में जान पर खेल कर भी प्रशासकीय अन्याय, भ्रष्टाचार और अत्याचार के सचित्र जमीनी ब्योरे लगातार देती रहती हैं। नतीजतन हाल के महीनों में, खासकर जब से महामारी निरोधक-2005 का कानून और सख्त बनाया गया है, मीडिया कर्मियों पर पुलिस का कोप बार-बार कई राज्यों में कहर बनकर टूट रहा है। जानने के हक और उस पर मंडराते खतरों पर शोध कर रही दिल्ली की संस्था (राइट्स एंड रिस्क एनालिसिस) का आकलन अभी एक प्रतिष्ठित डिजिटल खबरिया पोर्टल पर छपा है। उसके अनुसार, तालाबंदी यानी 25 मार्च से 31 मई के बीच पत्रकारों के खिलाफ 22 प्राथमिकियां दर्ज कराई गईं। 55 पत्रकारों को या तो अपनी खबरों को लेकर कानूनी नोटिस मिला है या उनसे पुलिस ने पूछताछ की है और 10 को हिरासत में लिया गया। विडंबना यह कि लगभग सारी रपटें व्यवस्था की खामियों को उजागर कर रही थीं जिनका खुद सरकार और स्थानीय प्रशासन को संज्ञान लेकर समुचित कार्रवाई करनी चाहिए थी। अगर वे गलत साबित हों तो बहुत अच्छा लेकिन अगर सच हैं तो उनसे कई सामान्य लोगों पर खतरा बनता है। एक रपट तालाबंदी के दौरान अभयारण्य में वन तस्करी बढ़ने पर थी। दो मामलों में पत्रकारों के फेसबुक के वीडियो पर प्राथमिकी दर्ज हुई जो तालाबंदी के दौरान जिलों में राशन व्यवस्था की गड़बड़ियों पर थे। एक पत्रकार ने सरकारी हस्पतालों में कोविड के सुरक्षा उपकरणों पर सवाल उठाए तो उससे स्पेशल टास्क फोर्स ने पूछताछ की। स्थानीय मुसहरों द्वारा तालाबंदी के दौरान भुखमरी की रपट पर मालिक और पत्रकार- दोनों को सराहना की बजाय जिले के डीएम की तरफ से कारण बताओ नोटिस आ गया।

इन बातों के उजास में विकास दुबे जैसे 50 से अधिक मामलों के आरोपी द्वारा की गई आठ पुलिस कर्मियों की नृशंस हत्या का मामला जैसे-जैसे बढ़ रहा है, बरसों से चली आई उसकी नाना राजनीतिक दलों, स्थानीय पुलिस और प्रशासन से नजदीकियां और जनता की उपेक्षा भी सामने ला रहा है। कोई व्यक्ति पुलिस की वर्दी पहनकर बाहर आता है, तो उससे उम्मीद बनती है कि अब वह जाति, धर्म या इलाकाई कबीलावादी आग्रहों से परे रहेगा। होता इसके उलट है क्योंकि हमारी राजनीति में कबीलावादी आग्रह लगातार बढ़ रहे हैं। चूंकि भर्ती से लेकर प्रोन्नति तक सब कुछ जाति, धर्म और सत्तारूढ़ दल के इलाकाई सरोकारों से तय होता है, इसलिए जो लोग सत्तारूढ़ दल के आग्रहों से बाहर हैं, उनको कमतर नागरिक मानकर उनसे दुर्व्यवहार करने की एक अलिखित खुली छूट वर्दीधारियों को मिल जाती है।

यहां पर पुलिस की भीतरी दारुण दशा पर भी लिखना ही होगा। आखिर, कोविड के दौरान इसी बल ने मानवीयता और करुणा की मिसालें भी दी हैं और फ्रंटफुट पर काम करते हुए उनमें से कई शहीद भी हुए हैं। इसलिए उनको दोष देकर यह फाइल बंद नहीं की जा सकती। दो मान्य जनसेवी संस्थाओं- कॉमन कॉज और लोकनीति द्वारा जारी रपट के अनुसार, 2012- 16 के बीच देश के कुल पुलिस बलों के 6.4 हिस्से को सेवा अवधि के दौरान दोबारा ट्रेनिंग मिल पाई थी। कोविड के बीच भी शुरू में जब उनको मुहल्लों की पहरेदारी दी गई तो अधिकतर को न तो जरूरी रक्षा उपकरण दिए गए और न ही रोग की बाबत जानकारी कि संक्रमण से खुद वे किस तरह बचें।

रखवालों की रखवाली के कुछ मान्य नियम-कायदे हर लोकतंत्र के विधान में बनाए गए हैं। हर बदलाव के साथ उनमें और उसी के साथ-साथ उनको लागू कराने वालों में समय-समय पर तरमीम करते रहना भी प्रशासन का एक बुनियादी उसूल है। कोविड की शुरुआती दौर की चूक में इसी वजह से कई पुलिसवाले काल कवलित हुए। इससे पहले रेप और समलैंगिकता के कानूनों में वक्त के मुताबिक बदलाव लाते हुए भी सभी सरकारी सशस्त्रबलों को कानून की सही जानकारी और कामकाज की व्यावहारिक शैली की बाबत लगातार समयानुसार प्रशिक्षण मिले और उनके कामकाज करने के तरीकों ही नहीं, उनकी मानसिक दशा की भी प्रोफेशनल पड़ताल भी हो। यह सनातन सवाल है। रोमन कवि जुवेनाल ने सदियों पहले पूछा था- कानून के रखवालों की रखवाली कौन कानून करता है?

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