एक के बाद एक बाज़ियां पलट रहे हैं बिडेन, लेकिन ट्रंप जनादेश और लोकतंत्र को कटघरे में खड़ा करने पर आमादा

अमेरिकी चुनाव परिणाम का सस्पेंस अभी बना रहेगा। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कांटे के मुकाबले वाले कई राज्यों में अदालतों में मामले दायर कर दिए हैं और इस चुनावी रण की स्थिति साफ होने में अगर हफ्ते न भी लगें तो कुछ दिन तो लगेंगे ही।

फोटो : Getty Images
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आशीस रे

अमेरिकी चुनाव परिणाम का सस्पेंस अभी बना रहेगा। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कांटे के मुकाबले वाले कई राज्यों में अदालतों में मामले दायर कर दिए हैं और इस चुनावी रण की स्थिति साफ होने में अगर हफ्ते न भी लगें तो कुछ दिन तो लगेंगे ही।

वैसे, लग यही रहा है कि कानूनी मोर्चा बिना किसी सबूत के खोल दिया गया है और यह बात अमेरिका समेत दुनिया की समझ में भी आ रही है। ऑर्गनाइजेशन फॉर सिक्योरिटी एंड कोऑपरेशन इन यूरोप के माइकल लिंक ने मीडिया से कहा, “सोचे- समझे तरीके से गड़बड़ी के जो आरोप लगाए जा रहे हैं, उससे लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता का भरोसा कम होता है।” स्थिति यह रही कि हथियारबंद ट्रंप समर्थक बड़ी संख्या में एरिजोना में जुट गए। डेट्रॉयटऔर पेंसिलवेनिया में वोटों की गिनती रोकने की मांग की गई। दूसरी ओर, डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जो बिडेन ने शालीनता से कहा कि हर वोट की गिनती होनी चाहिए। काबिले गौर है कि उन्होंने मिशिगन और विस्कोन्सिन में इस बार स्थिति पलट दी जहां पिछली बार डेमोक्रेट उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन पिछड़ गई थीं।

बिडेन ने कहा, “हमें विश्वास है कि हम ही विजेता होंगे।” 77 वर्ष के जो बिडेन अमेरिका के राष्ट्रपति बनने वाले सबसे बुजुर्ग व्यक्ति होंगे। इसके अलावा यह केवल चौथी बार होगा जब दूसरे कार्यकाल के लिए चुनाव का सामना कर रहे व्यक्ति को हार का सामना करना पड़ा हो।

74 वर्षीय डोनाल्ड ट्रंप यकीनन अमेरिका के इतिहास में सबसे अप्रिय राष्ट्रपति रहे हैं। इस पद के लिए पूरी तरह अयोग्य। अहंकारी, शातिर, दुष्ट और अशिष्ट। पिछले चुनाव में जीत की प्रबल दावेदार और उनकी प्रतिद्वंद्वी हिलेरी क्लिंटन के बारे में संघीय जांच ब्यूरो (एफबीआई) के इस कथित खुलासे ने जैसे बाजी ट्रंप के पक्ष में कर दी थी कि विदेश मंत्री रहते हिलेरी ने सरकारी काम के लिए अपने निजी ईमेल आईडी का इस्तेमाल किया था। बाद में बेशक एफबीआई ने कहा कि हिलेरी ने कुछ भी गड़बड़ी नहीं की लेकिन तब तक ट्रंप को इसका फायदा मिल चुका था। कहा जा सकता है कि अपनी अप्रत्याशित जीत के बाद चार साल तक देश और विदेश में ट्रंप की पहचान चीनी दुकान में घुस आए एक बैल-सी रही। ट्रंप हाथ धोकर चीन के पीछे पड़े रहे, फिर भी यह आश्चर्यजनक ही है कि अमेरिकी मतदाताओं ने उन्हें समर्थन देने से अपने पैर पीछे खींच लिए।

दरअसल, इसकी स्वाभाविक वजह है। शेयर बाजार को अर्थव्यवस्था को नापने का पैमाना बनाने की कोशिशों और अर्थव्यवस्था के बुनियादी क्षेत्रों को नजरअंदाज करने का नतीजा है कि दुनिया के सिरमौर देश में रोजगार का जबर्दस्त संकट पैदा हो गया है। ऐसी स्थितियों में कामकाजी तबके और मध्यम वर्ग में असुरक्षा की भावना घर कर गई थी। अमेरिका में विदेशी मूल के लोगों में ज्यादातर हिस्पैनिक और एशियायी हैं। इनकी तादाद 1970 में 5 फीसदी से भी कम थी लेकिन आज ये 20 फीसदी से भी ज्यादा हैं। इस कारण 61 फीसदी गैर-हिस्पैनिक श्वेतों में अपनी आजीविका को लेकर असुरक्षा की भावना आ गई है। इसलिए, चाहे इसे आर्थिक या नस्लवादी पिछड़ापन कह लें, गैर-हिस्पैनिक श्वेतों का एक बड़ा तबका पहले से ही दक्षिणपंथी रुझान वाले देश में लगातार असहिष्णु होता जा रहा है।

@RealDonaldTrump ट्विटर अकाउंट के 8.79 करोड़ फॉलोअर हैं जिनमें स्वाभाविक ही ज्यादातर अमेरिकी हैं। @POTUS अमेरिकी राष्ट्रपति का आधिकारिक हैंडल है जिसके 3.22 करोड़ फॉलोअर हैं। इसमें संदेह नहीं कि बड़ी संख्या ऐसे लोगों की होगी जो इन दोनों को ही फॉलो कर रहे होंगे, इसलिए ये दोनों हैंडल सही तस्वीर नहीं दिखाते। लेकिन इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि 33 करोड़ लोगों के देश में ट्रंप के दुर्भावनापूर्ण संदेश व्यापक रूप से अमेरिकी घरों तक पहुंचे।

प्रशासन की बागडोर अपने हाथ में लेने के बाद से ट्रंप ने उन्हें सुनने, उनपर भरोसा करने वाले लोगों को गुमराह किया। इसके लिए ट्रंप ने रोजाना, और कई बार तो दिन में एक से अधिक बार गलत सूचनाएं दीं। हकीकत यह है कि आज के सोशल मीडिया ने अमेरिका में जनमत को हानिकारक रूप से तोड़ा- मरोड़ा है। 1860 के दशक में भयावह गृह युद्ध के बाद से अमेरिकी समाज कभी भी इतना विभाजित नहीं रहा, लोग साथी नागरिकों के लिए कभी इतने असहिष्णु नहीं रहे।

अमेरिका के राष्ट्रपति पद के चुनाव का फैसला इलेक्टोरल कॉलेज के वोट करते हैं, न कि लोकप्रिय वोट। इलेक्टोरल कॉलेज के वोट अमेरिका के 50 राज्यों से निकाले जाते हैं। 29 इलेक्टोरल वोट वाले स्विंग राज्य फ्लोरिडा में क्यूबा मूल के लोगों को महीनों तक लगातार इस डर के साथ निशाना बनाया जाता रहा कि जो बिडेन के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका साम्यवाद की राह पकड़ लेगा। आशंकाओं के इस माहौल ने मियामी इलाके में क्यूबायी अमेरिकी वोटरों को ट्रंप की ओर झुकाया जिसके कारण उन्हें फ्लोरिडा को अपने पक्ष में करने में मदद मिली।

सीनेट समिति की सुनवाई के दौरान एफबीआई के पूर्व निदेशक जेम्स कॉमी से पूछा गया: “क्या आपको संदेह है कि रूस ने 2016 के चुनावों में हस्तक्षेप का प्रयास किया था?” इस पर कॉमी ने पूरी दृढ़ता के साथ जवाब दिया: “नहीं।” चुनाव पर्यवेक्षक इयोन सांचो को उसी एजेंसी ने चेताया था कि “एक विदेशी ताकत फ्लोरिडा में काम करने वाले एक वेंडर तक अपनी पकड़ बना चुकी है।” एक डॉक्यूमेंट्री में उन्होंने कहा भी कि: “हमें यह पता लगाने में ज्यादा समय नहीं लगा कि वे जीआरयू, यानी रूस की मिलिट्री इंटेलिजेंस सर्विस के बारे में बात कर रहे थे।”

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया बर्कले के प्रोफेसर फिलिप स्टार्क ने चुनाव प्रणाली पर गलत इरादे से किए गए साइबर हमले का मुकाबला करने का एक उपाय निकाला है। इसे वह “इंटेलिजेंट इंक्रीमेंटल रिकाउंट” कहते हैं। वोटिंग पर पैनी निगाह रखने के बाद उन्होंने कहा: “जॉर्जिया, टेक्सास और ओहियो में इलेक्ट्रॉनिक समस्याएं आईं। जॉर्जिया की संवेदनशील टच-स्क्रीन वोटिंग मशीनें निर्धारित करेंगी कि कौन-सी पार्टी सीनेट को नियंत्रित करेगी और संभवतः कौन बनने जा रहा है राष्ट्रपति।”

वैसे, अमेरिका में ऐसे मौके कई बार आए हैं जब जीत-हार का फैसला तमाम उधेड़बुन और संशय के बाद हुआ। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद 1960 में ऐसा मौका आया जब रिचर्ड निक्सन पर डेमोक्रेट जॉन कैनेडी की जीत भी बहुत करीबी रही थी। हालांकि वह अंततः इलेक्टोरल वोट के आधार पर बहुमत हासिल करने में सफल रहे जबकि लोकप्रिय वोट में उनका मार्जिन केवल 0.2% था। तत्कालीन उपराष्ट्रपति ने परिणाम को चुनौती देने की सोची लेकिन बाद में यह इरादा छोड़ दिया। 2000 में रिपब्लिकन जॉर्ज बुश अल गोर से 266 वोट से पिछड़ रहे थे और केवल फ्लोरिडा का नतीजा आने वाला था। विवादास्पद पुनर्गणना के बाद बुश 537 वोटों या डाले गए वोटों की तुलना में केवल 0.009% से जीत दर्ज करने में कामयाब रहे।

अल गोर के भाई जेब फ्लोरिडा के गवर्नर थे; और यह आरोप लगाया गया था कि चुनाव अधिकारियों ने डेमोक्रेटिक मतदाताओं को अपना वोट डालने से रोकने की साजिश रची थी। गोर ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट जाने की हद तक का मन बना लिया था लेकिन बाद में राष्ट्रीय हित में उन्होंने यह इरादा छोड़ दिया। तब यह कशमकश पांच सप्ताह तक चला था। बुश तब 271 इलेक्टोरल वोट हासिल कर सके जबकि सरकार बनाने के लिए 270 वोटों की जरूरत थी। यह भी गौर करने वाली बात है कि बुश लोकप्रिय वोट में 0.5% से पिछड़ रहे थे।

अमेरिकी चुनाव के नियम हारने वाले उम्मीदवार को यह अधिकार देते हैं कि अगर हार-जीत का अंतर डाले गए कुल वोटों के 1 फीसदी से कम हो तो वह वोटों की दोबारा गिनती की मांग कर सकता है। ऐसे कई राज्य हैं जहां बिडेन की जीत का अंतर मतदान के 1 फीसदी से कम ही है। लिहाजा, देखने वाली बात यह भी होगी कि आगे क्या होता है। हालांकि ट्रंप हफ्तों से कानूनी कार्रवाई की बात कहते रहे हैं लेकिन उनके आरोप हवा-हवाई रहे हैं और उनके पक्ष में किसी तरह का कोई सबूत नहीं दिया गया। न्यूयॉर्क के पूर्व मेयर और वकील रूडी गुलियानी के नेतृत्व में यह खेल चल रहा है, लेकिन लगता नहीं कि अदालत में इससे ट्रंप को कोई फायदा मिलने जा रहा है।

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