विष्णु नागर का व्यंग्यः पान साम्राज्य का पतन और गुटखा साम्राज्य का उदय!

किसी ने जरा चूं-चपड़ की तो राजा जिसे आजकल ईडी, सीबीआई, इनकम टैक्स आदि कहते हैं, उनके जरिये उसकी बोलती बंद करवा देता था। आजकल जिन्हें अरबन नक्सल कहते हैं, कुछ को वह भी घोषित करवा देता था। इस प्रकार राज्य में सर्वत्र शांति और अनुशासन का वातावरण रहता था!

फोटोः gettyimages
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विष्णु नागर

एक राजा था। उसे पान खाने का शौक पागलपन की हद तक था। उसके मुंह में एक पान ठूंसते ही सेवक दूसरा पान तश्तरी में लिए उसके सामने हाजिर न हो जाए तो उसे फांसी की सजा तक दे देता था। वह गिड़गिड़ाए और राजा को दया आ जाए तो सजा आजीवन कारावास में बदल जाया करती थी। इसके आगे कोई रियायत नहीं थी!

उसके कई सेवक थे। एक सेवक का काम उसके लिए छांट-छांट कर पान के एवन पत्ते खरीद कर लाना था। दूसरे का उन्हें गंगा जल से अच्छी तरह दस बार धोना था। तीसरे का चूना घोलना और पत्ते लगाना था। चौथे का कत्था तैयार करना था। पांचवे का उस कत्थे को पान पर खूब अच्छी तरह मलना था। छठे का सुपारी खरीद कर लाना और सातवें का उसके बारीक टुकड़े काटना था। आठवें का लौंग-इलायची आदि बाजार से खरीद कर लाना और नवें का बीड़ा बनाना था। दसवें का उस पर वर्क चढ़ाना था। ग्यारहवें का उसे राजा के सामने पेश करके खड़े रहना था। बारहवें का तश्तरी से उठाकर उसके मुंह में पहुँचाना था। चबाने की तकलीफ वह खुद कर लिया करता था।इसके लिए किसी को कष्ट नहीं देता था। इतना अच्छा राजा था वह। ऐसे राजा सदियों में कभी होते हैं!

प्रजा का एक हिस्सा उससे खुश था क्योंकि राजा के पान के कारण बहुतों को रोजगार मिला हुआ था। पान की खेती करने वाले खुश थे। व्यापारी खुश थे। पनवाड़ी खुश थे। जो खुश नहीं थे, चुप थे, इसलिए उन्हें भी खुश माना जाता था। राजा इतना उदार था कि उसने सारे पनवाड़ियों को यह छूट दे रखी थी कि जो चाहे लिखे- 'राजाजी की पसंद की एकमात्र असली दूकान'। उसने सारे पनवाड़ियों के हाथ से बीड़ा ग्रहण करते हुए फोटो खिंचवा रखे थे, जिन्हें वे अपनी दूकान पर लगा सकते थे!

साथ ही राजा ने उन्हीं पनवाड़ी के कपड़ों पर उनका बनाया हुआ पान का बीड़ा थूकते हुए भी तस्वीरें खिंचवा रखी थीं, जो उसके पास सुरक्षित रहती थीं। किसी ने जरा चूं-चपड़ की तो राजा उसकी वह तस्वीर जारी करवा देता था। इसके अलावा जिसे आजकल ईडी, सीबीआई, इनकम टैक्स आदि कहते हैं, उन विभागों के जरिये उसकी बोलती बंद करवा देता था, उसे अंदर करवा देता था। आजकल जिन्हें अरबन नक्सलाइट कहते हैं, कुछ को वह भी घोषित करवा देता था। इस प्रकार राज्य में सर्वत्र शांति और अनुशासन का वातावरण निर्मित रहता था!

राजा को खुश रखने के लिए उसकी उन रानियों ने भी पान खाने शुरु कर दिए थे, जिन्हें सिर्फ जर्दा खाने का शौक था और जिन्हें साड़ियां और गहने पहनने का शौक था, उन्होंने भी। दरबारियों ने पान खाना, रानियों से पहले ही शुरू कर दिया था, जो अमूमन रानियों से भी ज्यादा समझदार होते हैं। जो भी राजदरबार में फरियाद लेकर आता था, उसका आधार कार्ड उसके पान से रचे होंठ और दांत थे। इस प्रकार पान खाना राजभक्ति या राष्ट्रभक्ति का प्रतीक बन चुका था। राजा का नाम पान-राजा पड़ चुका था। उसके राज्य का नाम हो गया था- पान साम्राज्य!

इधर कुछ समय से पान की दूकानें ही नहीं बल्कि पान के मॉल भी खुल गए थे, जहां एक से एक बढ़िया पान मिलते थे। पान की इतनी खेती होने लगी थी कि अनाज, दालें, सब्जियों की जगह पान की खेती ने ले ली थी। राजा हर साल पान का बढ़ा हुआ खरीद मूल्य काफी पहले घोषित कर देता था। इस प्रकार हर साल पान उत्पादकों को लाभदायक मूल्य मिलने लगा था। प्रजा भूख लगने पर पान खाने को मजबूर थी, चोरी से कुछ और बनाया और खाया और किसी को खबर लग गई और राजा तक पहुंच गई तो छह साल की जेल की सजा थी। कपड़े भी पान के बनने लगे थे, जूते भी। पान का नाश्ता, खाना, मिठाइयां, समोसे सब मिलने लगे थे। पान की झोपड़ियों से लेकर महल तक बनने लगे थे। सड़कें पान की बनने लगी थीं। 'पान राजा जिंदाबाद-जिंदाबाद' के नारों से धरा गुंजायमान रहने लगी थी!

एक दिन राजा को मरना ही था मगर यह बात उसे मालूम नहीं थी। किसी में हिम्मत भी नहीं थी कि राजा की भी मृत्यु होती है, इसकी चर्चा उससे क्या, आपस में भी कर सके, फिर भी राजा मर गया। उसका बेटा गद्दी पर बैठा। प्रजा को उम्मीद थी कि राजा का बेटा, राजा की परंपरा को आगे बढ़ाएगा। सच यह था कि उसे अपने बाप की पान खाने की आदत से बहुत चिढ़ थी। वह पिता के रहते ही पान-द्रोही हो चुका था!

उसने सोचा कि एकदम से वह उलटफेर कर देगा तो पता नहीं, उसका अपना क्या हश्र हो। उसने पान उत्पादन को प्रोत्साहन देना धीरे-धीरे और फिर तेजी से बंद कर दिया। गुटखे को प्रोत्साहन देने लगा। पान के विकास की तरह गुटखे का भी चतुर्मुखी विकास हुआ और थूक का भी उतनी ही तेजी से विकास हुआ बल्कि उससे भी अधिक तीव्रता से विकास हुआ। शासन की शैली वही थी, माल नया था, राजा नया था!

इस प्रकार पान- साम्राज्य का पतन उसकी ही संतान के हाथों हुआ और गुटखा साम्राज्य का उदय हुआ। उसके बाद जितने भी राजा हुए, गुटखा वंश के राजा कहलाए। इतिहासकार अवश्य इसे पान-गुटखा साम्राज्य कहते हैं। कहते हैं कि गुटखा किंग अभी भी हैं। गुटखा किंग प्रथम की यह भविष्यवाणी थी कि वह भले मर जाए मगर उसके द्वारा स्थापित गुटखा साम्राज्य अमर रहेगा।विश्लेषक बताते हैं कि वह सही साबित हो रही है। उसकी दूरदृष्टि के बारे में इधर कुछ कविताएं भी सामने आई हैं!

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