साल और सागवान की वह लड़ाई, जो बनी झारखंड को अस्तित्व में लाने वाले आंदोलन की बुनियाद

शिबू सोरेन ने झारखंड आंदोलन के दौरान चेतावनी देते हुए कहा था कि आदिवासी तब तक सागवान के पौधे उजाड़ते रहेंगे जब तक सरकार उनकी खेती की जमीन पर इसका रोपण नहीं रोकेगी। आदिवासियों के लिए साल का पेड़ बहुत अहम होता है और सागवान हमेशा से व्यापारियों की पसंद रहा है।

फोटोः सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

पेड़ या वृक्ष को कई जगह ‘झाड़’ भी कहा जाता है। इस संदर्भ में झारखंड का अर्थ होता है, झाड़ों से आच्छादित क्षेत्र। कुछ इतिहासकारों के अनुसार झारखंड शब्द का प्रयोग पहली बार 400 वर्ष पूर्व 16वीं शताब्दी में किया गया था। आज का झारखंड राज्य, बिहार राज्य के दक्षिण में छोटा-नागपुर पठार का हिस्सा है। तत्कालीन अविभाजित बिहार के इसी झारखंड में सत्तर के दशक में झारखंड आंदोलन काफी प्रसिद्ध हुआ था। बहुत कम लोग जानते होंगे कि यह झारखंड आंदोलन दो प्रकार के झाड़ों के झगड़े से पैदा हुआ था। इनमें से एक झाड़ था- आदिवासियों का प्रिय साल, तो दूसरा था-सागवान, जो व्यापारियों की पसंद का झाड़ था।

आदिवासी, जंगल और खनिज बहुल इस क्षेत्र को बरसों बहुत लूटा गया तथा आदिवासियों पर अत्याचार और शोषण भी हुए। इसी परिस्थिति ने झारखंड आंदोलन को जन्म दिया। आदिवासियों पर अत्याचारऔर शोषण रोकने में तत्कालीन राज्य सरकारें लगभग असफल हो रही थीं। गरीब आदिवासियों पर अत्याचार और शोषण के साथ-साथ 1977 में वन-विकास-निगम ने एक और वज्रपात किया।

इस वज्रवात के तहत वन-विकास-निगम साल के प्राकृतिक वनों को काटकर सागवान लगाना चाहता था। उसका मानना था कि सागवान का झाड़ साल के झाड़ से ज्यादा मूल्यवान है। योजना पर तुरंत अमल कर वन-विकास-निगम ने कई स्थानों पर साल के वन काटकर सागवान का रोपण प्रारंभ कर दिया। सागवान का ज्यादातर रोपण छोटा-नागपुर के ऐसे सिंघभूम जिले में किया गया जहां साल के प्राकृतिक जंगल बहुतायत में थे।

इस क्षेत्र में सागवान रोपण का कार्य पिछले लगभग 100 वर्षों से हो रहा था, लेकिन यह वहीं किया जाता था, जहां साल के वृक्ष प्राकृतिक रूप से समाप्त हो जाते थे। सागवान का यह रोपण सिंघभूम क्षेत्र के आदिवासियों को पसंद नहीं था, परंतु कोई राजनीतिक दबाव नहीं होने के कारण वे इसका विरोध भी नहीं कर पा रहे थे। साल वृक्ष के प्रति आदिवासियों का लगाव इसलिए था, क्योंकि उसकी लकड़ी से खेती के औजार बनते थे, बीजों से तेल निकाला जाता था और विषम परिस्थितियों में फल का गूदा खाकर वे अपना पेट भी भर लेते थे।


बाद में कुछ सामाजिक संगठनों के कई वर्षों के प्रयास से छोटा-नागपुर के आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार से कुछ जागरूकता आई थी। इसी जागरूकता के चलते आदिवासियों ने मिलकर विचार किया कि साल के कटने से उनका जंगल से रिश्ता समाप्त हो जाएगा और आजीविका चलाने में कठिनाई होगी। यह सोचकर उन्होंने दो वर्ष, 1978-79 के दौरान सागवान रोपण का विरोध किया। इस विरोध का कोई सकारात्मक परिणाम नहीं आने पर सिंघभूम के आदिवासियों ने झारखंड-आंदोलन के बैनर तले संघर्ष प्रारंभ कर दिया। यह आंदोलन साल के विरूद्ध सागवान का संघर्ष कहा जाने लगा।

झारखंड-आंदोलन के तहत सागवान के रोपित पौधे और रोपणियां (नर्सरी) नष्ट की गईं और सागवान का समर्थन करने वाले वन विभाग के लोगों को घेरकर बंधक बनाया गया। कई स्थानों पर सरकारी संपतियां भी नष्ट की गईं। सिंघभूम और आसपास के क्षेत्रों में नवंबर1978 से फरवरी 1979 तक पुलिस और आदिवासियों के बीच छह बार संघर्ष हुआ और पुलिस फायरिंग में दस लोग मारे गए। 17 फरवरी, 1979 को इच्छाघत नामक स्थान पर फिर सागवान के पौधे नष्ट किए गए और वन विभाग कार्यालय में आगजनी हुई। स्थिति पर नियंत्रण के लिए पुलिस ने गोली चलाई जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई। आंदोलन के बढ़ते स्वरूप को देखते हुए शासन, प्रशासन ने ज्यादातर स्थानों पर भारी पुलिस बल लगाया।

धीरे-धीरे वर्ष 1980 की शुरुआत में झारखंड-आंदोलन थोड़ा शांत हुआ। इसी बीच हुए चुनाव में कई आंदोलनकारी जीत गए, लेकिन शांति के दौरान भी खेती की जमीन पर सागवान रोपण का विरोध जारी रहा। सितंबर, 1980 में 200 हेक्टेयर में रोपित सागवान के पौधे उखाड़ कर फेंक दिए गए और सिंघभूम के आसपास वन अधिकारियों को घेरा गया। अधिकारियों को छुड़ाने जब पुलिस आई तो फिर तेज संघर्ष हुआ और 16 लोग मारे गए।

इस संघर्ष के फलस्वरूप उस समय की राज्य सरकार ने सावधानी के तौर पर सामाजिक और धार्मिक त्यौहारों को छोड़कर आदिवासियों के पारंपरिक तीर-कमान रखने पर रोक लगी दी। इस रोक पर आंदोलन के प्रमुख नेता शिबू सोरेन (वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के पिता) ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा था कि आदिवासी तब तक सागवान के पौधे उजाड़ते रहेंगे जब तक सरकार उनकी खेती की जमीन पर रोपण कार्य नहीं रोकेगी। इस चेतावनी के बाद सरकार ने कहा कि आदिवासियों के क्षेत्रों में जब कोई भी योजना चलाई जाएगी तो उनके हितों को प्राथमिकता से बचाया जाएगा। सरकार के इस कथन से सागवान रोपण और लकड़ी की नीलामी रोक दी गई।

आदिवासियों का साल के झाड़ के प्रति प्रेम और सरकार का सागवान के प्रति आकर्षण देखकर वहां के तत्कालीन सांसद एके राय ने कहा था कि यदि सरकार अपनी नीतियां नहीं बदलती तो साल का मतलब होगा झारखंड एवं सागवान यानी बिहार। लंबे समय के बाद एके राय का कथन सत्य साबित हुआ, जब 15 नवंबर 2000 को पृथक झारखंड राज्य बनाया गया। वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अब यह जिम्मेदारी है कि वह राज्य में इस प्रकार विकास की योजनाएं बनाएं कि वहां के आदिवासियों के हित सुरक्षित रहें।

(सप्रेस से ओपी जोशी का लेख साभार )

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