हास्यास्पद है गरीबी से बाहर आते लोगों का आंकड़ा, सरकारी आंकड़े ही मनोरंजन का विषय बने

बीजेपी को हरेक विपक्षी पार्टी द्वारा जनता को लाभ पहुंचाने वाले और मुफ्त या कटौती के साथ दिए जाने वाली वस्तुएं “मुफ्त की रेवड़ी” और अर्थव्यवस्था पर बोझ नजर आता है, फिर गरीबी रेखा पार कर चुके लोगों को भी मुफ्त अनाज क्या है?

फोटो: सोशल मीडिया
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महेन्द्र पांडे

तेजस्वी यादव ने एक बार प्रधानमंत्री पर तंज कसते हुए कहा था, प्रधानमंत्री हैं, कुछ भी कह सकते हैं। हमारे प्रधानमंत्री जी हरेक भाषण में बस “कुछ भी” ही कहते हैं, और कुछ भी हमेशा तथ्यों से परे होता है। देश का दुर्भाग्य यह है कि यहां की सत्ता, संवैधानिक संस्थाएं और कुछ मामलों में न्यायालय भी मीडिया के साथ पूरी तरह नंगा हो चुका है और इनके कपड़ों के आसार कहीं नजर नहीं आते। अडानी और अम्बानी का मीडिया तो अफवाहों को फैलाने का गढ़ बन चुका है– अभिनेत्री पूनम पाण्डेय की मृत्यु की खबर इसका हालिया उदाहरण है। लगभग डेढ़ दिन इस खबर को लगातार चलाने के बाद सच्चाई सामने आते ही यही मीडिया पूनम पाण्डेय को अपराधी घोषित करने पर तुल गया। जबकि, इस पूरे प्रकरण में पूनम पाण्डेय से अधिक बड़ा अपराधी स्वयं मीडिया है, जिसने इस खबर को रात-दिन प्रचारित किया। सत्ता भी यही कर रही है।

प्रधानमंत्री ने संसद में राहुल गांधी का नाम लिए बगैर उन्हें प्रोडक्ट कहा, और बेशर्म मीडिया ने इस वक्तव्य को भी प्रवचन जैसी शिद्दत से दिखाया। किसी मीडिया में कहीं भी यह नहीं बताया गया कि अगर कांग्रेस एक ही प्रोडक्ट बार-बार लांच करती है, तो बीजेपी कौन से प्रोडक्ट बदल रही है? बीजेपी में भी एक ही प्रोडक्ट ग्राम पंचायत के चुनावों से लेकर संसद के चुनावों तक लांच किया जाता है।

वैसे भी प्रधानमंत्री जी की भाषा पूंजीवादी भाषा है, जिसमें प्रोडक्ट और गारंटी का बहुत महत्व रहता है। पूंजीवाद में प्रोडक्ट का प्रचार अहम रहता है, कई बार तो केवल विज्ञापनों के बल पर कबाड़ और नुकसानदायक प्रोडक्ट भी मुनाफ़ा देते हैं। आज कल नेगेटिव विज्ञापनों का ज़माना है, जिसमें कोई प्रोडक्ट क्यों अच्छा है यह नहीं बताया जाता बल्कि यह बताया जाता है कि बाजार के दूसरे प्रोडक्ट्स में क्या खामियां हैं। हमारे प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, कुछ बडबोले मंत्री और बीजेपी अध्यक्ष – सभी भाषणों में विकास की नदियां बहाते हैं, पर यह विकास, विपक्ष विशेष तौर पर कांग्रेस, पर अनर्गल प्रलाप से शुरू होकर इसी पर ख़त्म हो जाता है। यही बीजेपी के विकास की परिभाषा है। दूसरी तरफ पूरे देश के हरेक गली, हरेक चौराहे, हरेक सड़क, हरेक खम्भे, हरेक दीवार, हरेक अखबार, हरेक टीवी चैनल, हरेक सोशल मीडिया साईट पर बीजेपी का एकलौता प्रोडक्ट लटकता या चिपका नजर आता है। एक ऐसा प्रोडक्ट जिसे 400 सीटों का गुमान तो है, पर डर भी है कि ओझल होते ही जनता भूल जायेगी। अब तो चुनाव भी महज एक बड़ा तमाशा है, क्योकि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को तो अभी से ही पता है कि बीजेपी की कितने सीटें होंगीं, गठबंधन को कितनी सीटें मिलेंगीं और कांग्रेस को कितनी सीटें मिलेंगीं। लगता है, अभी से ही सत्ता ने चुनाव आयोग को ऐसा ही करने का आदेश दे दिया है। चुनावों में बीजेपी क्या करती है और किस तरह जीतती है, इसकी मिसाल तो चण्डीगढ़ मेयर के चुनाव में दुनिया ने देख लिया, जिसे देश के प्रधान न्यायाधीश ने लोकतंत्र की हत्या करार दिया। पर, बेशर्मी की हद तो देखिये, चंडीगढ़ की धांधली के तुरंत बाद झारखंड और बिहार में मदारी का तमाशा शुरू हो गया| इसके बाद भी सत्ता प्रजातंत्र और विकास का राग अलापती है, और नंगा मीडिया इस तमाशे को सत्ता की जीत बताता है।

पूंजीवाद का एक और शब्द है, गारंटी। किसी प्रोडक्ट को खरीदते ही सबसे पहले हम उसकी गारंटी पर ही ध्यान देते हैं। बीजेपी का एकलौता प्रोडक्ट भी गारंटियों का सरताज है एक मांगों पचीस मिलेंगीं, पर सिर्फ पोस्टरों में – हकीकत में जो मिलना है वह केवल अडानी और अम्बानी को ही मिलेगा। जनता को तो सिर्फ 5 किलो फ्री अनाज मिलेगा। यह योजना अपने आप में देश का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार हो सकता है क्योंकि इसमें लाभार्थियों की कोई योग्यता निर्धारित नहीं की गयी है – कम से कम सरकारी और प्रधानमंत्री के वक्तव्य से तो यही समझ में आता है। अत्यधिक गरीब आबादी के नाम पर शुरू की गयी इस योजना को अगले पांच वर्ष तक बढाया गया है। हाल में ही प्रधानमंत्री ने कहा कि पिछले 9 वर्षो के दौरान 25 करोड़ अत्यधिक गरीब लोग गरीबी रेखा से ऊपर पहुंच गए, पर उन्हें भी अनाज मिलता रहेगा। बीजेपी को हरेक विपक्षी पार्टी द्वारा जनता को लाभ पहुंचाने वाले और मुफ्त या कटौती के साथ दिए जाने वाली वस्तुएं “मुफ्त की रेवड़ी” और अर्थव्यवस्था पर बोझ नजर आता है, फिर गरीबी रेखा पार कर चुके लोगों को भी मुफ्त अनाज क्या है?

वर्ष 2014 से देश में एक नई परिपाटी शुरू की गयी है – चुनाव से ठीक पहले प्रधानमंत्री सरकारी खर्चे पर सभी राज्यों का दौरा करते हैं और तमाम परियोजनाओं को हरी झंडी दिखाते हैं, जिसे नंगी मीडिया “सौगात” बताती है। इसके बाद प्रधानमंत्री जी बीजेपी के स्टार प्रचारक वाला भाषण देते हैं। वैसे प्रधानमंत्री और गृह मंत्री अब संसद में भी स्टार प्रचारक वाला ही भाषण देते हैं। जब यह कार्यक्रम ख़त्म होते है और चुनाव आयोग को हरी झंडी दिखाई जाती है तब चुनावों की घोषणा की जाती है। इसके साथ ही चुनावों की घोषणा से पहले सरकारी स्तर पर किसी राज्य में बड़े दुष्प्रचार के साथ कुछ बिल पास किये जाते हैं – जैसे अभी उत्तराखंड में सामान नागरिक संहिता का बिल पास कराया गया है। जिस देश में सामान्य जनता तो क्या सभी दलों के विधायकों और सांसदों को भी समान अधिकार नहीं दिए गए है, वहां अडानी-अम्बानी का मीडिया इस बिल को ऐतिहासिक बता रहा है। दूसरी तरफ आदित्यनाथ अयोध्या के बाद अब काशी और मथुरा का मुद्दा लगातार उठाकर सामाजिक ध्रुवीकरण कर रहे हैं – यही बीजेपी का विकास है।

बीजेपी का थिंक-टैंक बौद्धिक स्तर पर बहुत कमजोर है। इसका नजारा आप जल्दी ही देश की इकॉनमी के वाइट पेपर में देखने वाले हैं, जिसमें एनडीए के दौर की अर्थव्यवस्था और तथाकथित धांधलियों को बताया जाएगा। प्रधानमंत्री वर्ष 2014 से ही पिछली सरकार की अर्थव्यवस्था पर अनर्गल प्रलाप करते रहे हैं, उनके अनुसार उस समय की अर्थव्यवस्था के बारे में सच्चाई बताते ही देश की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाती। दूसरी तरफ वर्ल्ड बैंक, आईएमएफ, एशियाई डेवलपमेंट बैंक, भारतीय रिज़र्व बैंक या वर्ल्ड इकनोमिक फोरम जैसी किसी की उस दौर की कोई रिपोर्ट नहीं है जो प्रधानमंत्री के इन दावों की पुष्टि करता हो। मोदी सरकार तो शुरू से ही अपनी आर्थिक नीतियों का और पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का डंका पीट रही है, फिर इस तथाकथित वाइट पेपर को लाने में 10 साल क्यों लग गए? इस रिपोर्ट में ऐसी क्या लीपापोती करनी है जिसमें एक दशक लग गए। कहा जाता है कि कभी कभी दाल में कुछ काला नहीं बल्कि पूरी दाल ही काली हो जाती है।

मनमोहन सिंह सरकार के दौर में भले ही 5 ख़रब वाली अर्थव्यवस्था या तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के ख़्वाब नहीं दिखाए गए, पर उस दौर में सामान्य जनता तक आर्थिक लाभ उतना ही पहुंचा था, जितना मोदी सरकार चीख-चीख कर और पोस्टरों और मीडिया के माध्यम से प्रचारित कर रही है। सबसे बड़ा अंतर यह है कि मनमोहन सिंह सरकार के आंकड़ो पर भरोसा किया जा सकता है जबकि इस सरकार के आंकड़े समय और परिस्थितियों के अनुसार हरेक भाषण में बदल जाते है।

यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम (यूएनडीपी) की एक रिपोर्ट है, ग्लोबल मल्टीडाईमेंशनल पावर्टी इंडेक्स 2023। इस रिपोर्ट को सरकार भी बकवास या झूठा नहीं बता सकती है, क्योंकि इसका सन्दर्भ नीति आयोग की अनेक रिपोर्ट में है, और इसी के आधार पर नीति आयोग ने इंडिया नेशनल मल्टीडाईमेंशनल पावर्टी इंडेक्स तैयार किया है। यूएनडीपी की रिपोर्ट के अनुसार भारत ने बहुआयामी गरीबी को दूर करने के क्षेत्र में बहुत बेहतर कार्य किया है, जिसके कारण वर्ष 2005-2006 से 2019-2021 के बीच के 15 वर्षों में 41.5 करोड़ व्यक्ति गरीबी रेखा से ऊपर पहुँच गए। इसी के आधार पर नीति आयोग ने बताया था कि 2015-2016 से 2019-2021 के 5 वर्षों में 13.5 करोड़ व्यक्ति गरीबी रेखा से बाहर आये। यदि आप अभी तक एक स्वतंत्र विश्लेषक सोच रखते हैं तब इन आंकड़ों से समझ सकते हैं कि वर्ष 2005-2006 से 2015-2016 के बीच 28 करोड़ लोग गरीबी रेखा पार कर गए थे, और लगभग इस पूरे दौर में मनमोहन सिंह की सरकार थी, जिसकी अनर्गल आलोचना मोदी सरकार की गारंटी है। यदि 5 वर्षों में 13.5 करोड़, जो मोदी सरकार की गारंटी है, की तुलना में मनमोहन सिंह सरकार के 10 वर्षों के दौरान गरीबी रेखा से बाहर आने की गति अधिक तेज थी। देश की मीडिया इतनी नंगी है कि उसे ना तो ये रिपोर्ट दिखते हैं और ना ही आंकड़े, उसे तो बस गारंटियां और रेवड़ियां दिखती हैं।

मोदी सरकार में अत्यधिक गरीबी के आंकड़े ही एक मनोरजन का विषय बन गए हैं। 3 जनवरी 2024 को उत्तर प्रदेश में विकसित भारत संकल्प यात्रा में हिस्सा लेते हुए मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने मोदी जी को विकास का मसीहा बताते हुए पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा था कि पिछले साढ़े नौ वर्षों के दौरान देश में 13 करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी से मुक्त हो गए हैं। 7 फरवरी 2024 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने भाषण में बताया था कि पिछले 9 वर्षों में गरीबी की रेखा को पार करने वालों की सख्या 13.5 करोड़ है। इसी बीच में 15 जनवरी 2024 को प्रेस इनफार्मेशन ब्यूरो ने एक प्रेस रिलीज़ कर जानकारी दी कि पिछले 9 वर्षों में 24.82 लोगों ने अत्यधिक गरीबी की सीमा को पार कर लिया है। अब तो, पूरी दिल्ली में इसके पोस्टर भी लग गए हैं| पीआईबी के प्रेस रिलीज़ का स्त्रोत नीति आयोग का एक डिस्कशन पेपर, मल्टीडाईमेंशनल पावर्टी इन इंडिया सिंस 2005-2006, है।

नीति आयोग की इस रिपोर्ट को इसके सदस्य प्रोफ़ेसर रमेश चन्द और वरिष्ठ सलाहकार डॉ योगेश सूरी ने तैयार किया है। इस रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर यह भी लिखा है कि “यह इसके लेखकों के निजी विचार हैं”। जाहिर है, इस रिपोर्ट का कोई महत्व नहीं है क्योंकि आज के दौर में सरकार से जुड़े हरेक अधिकारी के निजी विचार केवल अपने आका को खुश करना है। यह रिपोर्ट भी इसी नीयत से बनाई गयी है और गरीबी जैसे गंभीर विषय पर इससे फूहड़ कोई रिपोर्ट हो ही नहीं सकती। इस रिपोर्ट में सुविधानुसार कहीं भी आबादी का प्रतिशत तो कहीं आबादी की संख्या का समावेश किया गया है। इस रिपोर्ट को लिखने वालों की मानसिक स्थिति का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इसमें टेबल 1 का शीर्षक है – स्टेटवाइज पावर्टी एस्टिमेट्स इन लास्ट 9 इयर्स (2013-14 टू 2022-23) – और यह टेबल वर्ष 2005-06 के आंकड़े भी बताती है।

इस रिपोर्ट के अनुसार पिछले 9 वर्षों के दौरान 24.8 करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी से बाहर आ चुके हैं। लेखको के निजी विचारों वाले रिपोर्ट के आंकड़ों से इतना तो स्पष्ट है कि मनमोहन सिंह सरकार कम से कम गरीबी उन्मूलन के सन्दर्भ में मोदी सरकार से बेहतर थी, जिसने 10 वर्षों में 28 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से बाहर निकाला था। मनमोहन सिंह सरकार कम से कम समाज के आख़िरी वर्ग तक पहुँचती थी। दूसरा तथ्य यह है कि 5 वर्षों में 13.5 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से बाहर करने वाली मोदी सरकार 9 वर्षों में 24.8 करोड़ लोगों को अत्यधिक गरीबी से बाहर निकाल पाई – यानि पिछले 9 वर्षों में सबसे अंतिम आदमी तक पहुँचने के दावों और प्रचार के बाद भी कम से कम इस क्षेत्र में कोई तेजी नहीं आई। इस रिपोर्ट में माना गया है कि देश की आबादी 2005-2006 के बाद से बढ़ी ही नहीं है।

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